माहवारी के दौरान पेड लीव : क्या लड़कियां उठा पाएंगी इसका फायदा ?

Anusha MishraAnusha Mishra   5 Jan 2018 3:43 PM GMT

माहवारी के दौरान पेड लीव : क्या लड़कियां उठा पाएंगी इसका फायदा ?महिलाओं के संबसे गंभीर मुद्दे पर सीनियर कॉपी एडिटर अनुषा मिश्रा के मन की बात।

ऐसा माना जाता है कि रिपोर्टर हर मुद्दे पर खुलकर बात कर लेते हैं लेकिन ऐसे कई मुद्दे हैं जिनपर खुलकर बात करना और उन बातों को अपने ऊपर लागू करना रिपोर्टर्स के लिए भी आसान नहीं होता। माहवारी के दौरान पेड लीव का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बीच पढ़िए कि आख़िर इस सोशल टैबू से बाहर निकलकर बात करना एक महिला रिपोर्टर के लिए कितना मुश्किल है...

कभी पेट तो कभी कमर में असहनीय दर्द, जी मिचलाना, घबराहट होना, थकान महसूस होना, भूख न लगना, किसी काम में मन न लगना। पीरियड‍्स में ये हाल लगभग हर लड़की का होता है। किसी को तकलीफ ज़्यादा होती है तो किसी को कम लेकिन इसके बावजूद लड़कियां काम में लगी रहती हैं। दर्द की दवाएं खाकर, तकलीफ सहकर काम करती रहती हैं। घर में या ऑफिस में हर जगह।

काम करते वक्त कई बार ऐसा महसूस होता है कि अब नहीं हो पाएगा। बस एक बिस्तर मिल जाए तो कुछ देर के लिए ही सही आराम कर लूं। घर में तो ये आराम मिल जाता है लेकिन ऑफिस में ये सुविधा भी नहीं। इसीलिए माहवारी के दौरान पेड लीव का मुद्दा अक्सर उठता रहता है। हाल ही में एक बार ये मुद्दा फिर उठा जब अरुणाचल प्रदेश के लोकसभा सदस्य निनोंग इरिंग ने संसद में एक निजी सदस्य विधेयक पेश किया जिसमें सार्वजनिक व निजी क्षेत्र से जुड़ी कामकाजी महिलाओं को हर महीने मासिक धर्म के दौरान दो दिनों का वैतनिक अवकाश देने का प्रस्ताव है।

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हालांकि दुनिया के कई देश ऐसे हैं जहां माहवारी के दौरान पेड लीव मिलती है लेकिन भारत में कुछ गिनी चुनी कंपनी ही ऐसी हैं जहां ये सुविधा मिलती है और जहां ये सुविधा मिलती भी वहां की लड़कियां भी इसका फायदा नहीं उठा पातीं। हम चाहें कितना भी ये कह लें कि अब वक्त बदल रहा है। घर से दूर रहने वाली लड़कियां, ऑफिस जाने वाली लड़कियां अब मुखर हो गई हैं, हर मुद्दे पर खुल कर बात करने लगी हैं लेकिन हक़ीकत इससे बहुत अलग है। ज़्यादातर लड़कियों के अंदर वो झिझक, वो शर्म अभी भी बाकी है जो कई बार अपने अधिकार भी छिन जाने देती है। मैं आज भले ही माहवारी जैसे मुद्दे पर पहले से ज़्यादा खुलकर बात करने लगी हूं लेकिन उस मुखरता की हममें अभी भी नहीं है, जिसकी ज़रूरत है। मैं ऐसा क्यों कह रही हूं इससे जुड़ी एक घटना का ज़िक्र करती हूं।

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बात 28 मई 2017 की है। उस दिन विश्व माहवारी स्वच्छता दिवस था। गाँव कनेक्शन ने उत्तर प्रदेश के 25 ज़िलों के 200 गाँवों में लड़कियों व महिलाओं को जागरूक करने के लिए एक कैम्पेन चलाई थी, जहां डॉक्टर्स के जरिए महिलाओं को माहवारी के दौरान बरती जाने वाली स्वच्छता के बारे में बताया जा रहा था, साथ ही मुफ्त सैनिटरी नैपकिन भी बांटे जा रहे थे। हमारे रिपोर्टर उन गाँवों से इस कैम्पेन की ख़बरें भेज रहे थे। मैं लखनऊ में डेस्क पर काम कर रही थी, उन ख़बरों को वेबसाइट पर पब्लिश करना मेरी ज़िम्मेदारी थी।

उस वक्त हमारे एसोसिएट एडिटर मेरे पास आए और मुझसे कैम्पेन के बारे में जानकारी लेने लगे। अचानक मैंने उनसे कहा कि सर, आपको नहीं लगता कि हमें अपने ऑफिस में काम करने वाली लड़कियों के लिए भी आज एक पहल करनी चाहिए। उन्होंने पूछा - क्या? मैंने कहा कि आज से आप आदेश दे दीजिए कि ऑफिस की सभी लड़कियां माहवारी के दौरान एक दिन की पेड लीव ले सकती हैं। उन्होंने बोला - ठीक है। आज के बाद ऑफिस की हर लड़की को ये सुविधा मिलेगी। लेकिन सच्चाई ये है कि इस बात को बीते 8 महीने हो चुके हैं लेकिन ऑफिस की किसी भी लड़की ने पीरियड्स में लीव नहीं ली। ऐसा नहीं है कि मैनेजमेंट को कोई दिक्कत थी। दरअसल, हम में से किसी लड़की के अंदर इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि हम ये बोल पाते कि हमें एक दिन की छुट्टी चाहिए क्योंकि हम पीरियड‍्स में हैं। जबकि मैंने खुद इस बारे में अपने सीनियर से बात की थी लेकिन फिर भी मैं छुट्टी नहीं मांग पाई।

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मेरे जैसी तमाम लड़कियां माहवारी के दौरान दर्द से गुज़रती हैं लेकिन अपनी झिझक की वजह से खुलकर नहीं बोल पातीं कि उन्हें क्या तकलीफ है। कुछ लड़कियां छुट्टी लेती भी हैं लेकिन ये बोलकर नहीं कि उन्हें पीरियड्स हो रहे हैं। वे कभी सिर दर्द, तो कभी पेट दर्द का बहाना बनाकर छुट्टी लेती हैं। हालांकि माहवारी के दौरान पेड लीव मिलने की ये लड़ाई ज़रूरी है और इसे सरकारी व गैर सरकारी सभी संस्थाओं में समान रूप से लागू भी होना चाहिए, लेकिन अगर अपनी शर्म और झिझक के कारण महिलाओं ने इस छुट्टी के लिए अप्लाई ही नहीं किया तो इसका कोई फायदा नहीं होगा। इसलिए ज़रूरी हैक कि महिलाएं अपनी इस समस्या को लेकर झिझक को ख़त्म करें।

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