रिपोर्टर कोना

इसीलिए तो कहते हैं... भगवान किसी को अस्पताल न भेजें

दोपहर के एक बज चुके थे। स्वास्थ्य खराब होने के कारण मेडिकल लीव पर था। सुबह से आलस मेरे मन और तन पर भारी था। आलस्य भगाने के लिए कड़ाके की ठंड में नहाने की हिम्मत हिम्मत वाला आदमी ही कर सकता है। चूंकि मैं गर्म पानी से नहाता नहीं, टंकी के ठंडे पानी से नहाने के बाद अभी अपने दांत किटकिटा ही रहा था कि मैसेंजर की घंटी बजती है।

लॉक खोलने के बाद मैसेजे देखा "भैया, आपका नंबर मेरे पास नहीं है, मुझे इस नंबर पर तुरंत फोन करिये। पापा का बाराबंकी में एक्सीडेंट हो गया है। उन्हें बाराबंकी से लखनऊ के ट्रामा सेंटर भेजा गया है।"

कंपकंपी रुक चुकी थी। ये मैसेजे मेरे पापा के फूफा रामप्रसाद शुक्ला के बड़े बेटे विशाल का मुंबई से था। विशाल के दिये नंबर पर मैंने फोन किया। रोते हुए विशाल ने मुझे बताया कि पापा का सुबह 9 बजे बाराबंकी में एक्सीडेंट हो गया है। वो कार से थे। उन्हें लखनऊ के ट्रामा सेंटर भेजा गया है। आप जल्दी ट्रामा सेंटर जाइये, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। मैंने विशाल को समझाया कि मैं पहुंचकर तुमको फोन करता हूं।

कपड़े पहनते-पहनते मैंने मित्र शिव को फोन किया था। ट्रॉमा सेंटर का नाम सुनते ही मेरे मन में डर बैठ गया था। मैं सोच रहा था कि ट्रामा सेंटर मतलब कुछ गंभीर है। ट्रामा सेंटर जाने के लिए मुझे एक साथी की जरूरत थी। शिव ने बताया कि वे इलाहाबाद में हैं। उन्हें पूरी बात बताये बिना मैंने फोन काट दिया। इसके बाद मैंने दूसरे मित्र आशुतोष को फोन किया। वे खुद बीमार थे, उनसे भी मैंने पूरी बात किये बिना फोन काट दिया।

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अब तक मैं कपड़े पहन चुका था। मुझे ध्यान आया कि फूफा का एक पुराना नंबर मेरे पास है। फोन में चेक किया तो बड़े फूफा के नाम से एक नंबर मेरे मोबाइल में सेव था। उस पर मैंने तुरंत फोन किया। फोन उठ भी गया। फोन उठाने वाले आदमी ने बताया कि ये फोन दुर्घटना स्थल पर उसे पड़ा मिला। मैंने उससे और जानकारी लेने की कोशिश की। उसने बताया कि एक आदमी को बहुत चोट आयी है। इसके अलावा पांच और लोग गंभीर रूप से घायल हैं।

बाराबंकी में प्राथमिक इलाज के बाद सभी को लखनऊ के ट्रामा सेंटर भेजा गया है। इतना सुनकर मैंने फोन काट दिया। अब तक मैं अपने रूम गोमती नगर, विनय खंड चार से निकल चुका था। रास्ते में ही मैंने सबसे पहले पापा को फोन लगाया और पूरी घटना की जानकारी दी। पापा ने कहा कि तुम पहले अस्पताल पहुंचों और देखो कि किसे चोट आयी है और तुरंत मुझे फोन करना।

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कुछ देर पैदल चलने के दौरान ही मैंने ओला की गाड़ी को बुला लिया था। गाड़ी पांच मिनट में आ भी गयी। किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज के ट्रॉमा सेंटर तक पहुंचने में लगभग 25 मिनट का समय लगा। भागकर अंदर पहुंचा। वहीं के एक स्टाफ से बाराबंकी से रेफर होकर आए लोगों की जानकारी ली तो उसने इशारे से बताया कि कुछ घायल वहां हैं। ग्राउंड फ्लोर के इमरजेंसी वार्ड में ढेर सारे लोगों का इलाज चल रहा था। सभी गंभीर रूप से घायल थे।

मैंने तेज आवाज में पूछा कि बाराबंकी से आये घायल लोग कहां हैं। तब सज्जन ने बताया कि आप कौन हैं। मैंने बताया कि मैं रामप्रसाद शुक्ला से मिलने आया हूं। उन्होंने मुझसे उनका रिश्ता पूछा, तो मैंने उन्हें बताया कि रामप्रसाद शुक्ला मेरे फूफा हैं। 50-55 साल के वे सज्जन फूफा के साथ घायल हुए अन्य लोगों के रिश्तेदार थे। वे मुझे फूफा के बेड के पास ले गये।

फूफा बेहोश थे। 5-6 नली उनके आसपास लिपटी थी। एक आदमी गुब्बारे नुमा बॉल तेजी से दबा रहा था। उससे निकली एक नली फूफा के मुंह में लगी थी। तभी डॉक्टर साहब आये। उनसे मैंने पूछा कि इनकी स्थिति क्या है। डॉक्टर ने बताया कि बहुत गंभीर चोट है। सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड के बाद ही हम कुछ कह पाएंगे। ये सुनने के बाद मैं तुरंत बाहर आया और पापा को फोन किया। पापा को जैसे ही बताया कि फूफा बहुत गंभीर है तो वे रोने लगे। मैंने पहली बार पापा को रोते हुए सुना। सब कहते हैं कि उनका दिल बहुत कड़ा है।

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वे चुप हुए और मुझसे बोले कि वहां तुम्हारे सिवाय और कोई नहीं है। हम लोगों को भदोही से लखनऊ तक आने में बहुत समय लग जाएगा। तुम अपनी पूरी कोशिश करो। मैंने ठीक है, कहकर फोन काट दिया। फूफा जी को लेकर सीटी स्कैन और अल्ट्रसाउंड कराने ले गया। मेरे साथ अब अस्पताल का स्टाफ था। पूरी जांच में लगभग एक घंटा लग जाता है। रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर ने कहा कि इनकी बचने की उम्मीद बहुत कम है। अभी आप इनको लेकर पहले तल पर चलिए।

पहले तल पर ट्रामा सेंटर का इमरजेंसी ऑपरेशन कक्ष था। वहां उनको लेकर पहुंचा। इस बीच विशाल का मुंबई से फोन आया। उसने मुझसे पूछा कि भैया मैं आ जाऊं, विशाल को क्या पता कि पापा की क्या स्थिति है। मैंने कुछ कहने से पहले फोन काट दिया। उस समय किसी से बात करने की स्थिति में नहीं था। इलाज में लापरवाही न हो इसके लिए मैंने अखबार के मेडिकल रिपोर्टर दीपांशु को फोन किया। उसने मुझे मदद का आश्वासन दिया। तब तक शाम के 7 बज चुके थे। डॉक्टर फिर आये। उन्होंने मेरा नाम लेकर मुझे बुलाया।

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डॉक्टर ने बताया कि दीपांशु का फोन आया था। उन्होंने मुझे बताया कि पेशेंट की बचने की उम्मीद बहुत कम है। आप उनके घर वालों को बुला लीजिए। ये कहकर वो चले गये। मैंने तुरंत विशाल को फोन किया और वास्तविकता से रू-ब-रू कराया। विशाल ने कहा भैया मैं आ रहा हूं। 10 बजे की फ्लाइट है। वाया दिल्ली सुबह तक पहुंच जाऊंगा। इसके बाद बुआ को फोन किया। वे अपने भतीजे कृष्णा के साथ निकल चुकी थीं। उनकी बस प्रतापगढ़ में पहुंची थी।

इधर मैं बैलून को लगातार दबाये जा रहा था। वहां के माहौल के बारे मैं आपको क्या बताऊं। कोई सामान्य व्यक्ति और दिल का कमजोर आदमी वहां पांच मिनट तक नहीं रुक सकता। बावजूद इसके मुझे वहां खड़े हुए 2 घंटे बीत चुके थे। 9 बजे फिर एक डॉक्टरों की टीम आती है। उनके लीडर ने मुझसे कहा कि इनके बचने की उम्मीद बहुत कम है। मतलब एक प्रतिशत से भी कम। ऑपरेशन करना पड़ेगा। आंत फट गयी है। पेट में रक्त स्त्राव हो रहा है। पहले आप इनके घर वालों से बात कर लीजिये। मैं धर्मसंकट से घिर गया था। मेरा सिर एक दम भारी हो गया था। मैं सोच रहा था कि डॉक्टर बोल दें कि ये ठीक हो जायेंगे, और मैं घर चला जाऊं।

मैंने फिर पापा को फोन किया। पापा ने कहा कि बचने की जरा भी उम्मीद है तो ऑपरेशन करवाओ। विशाल ने भी सहमति जताई। बतौर रिश्तेदार मैंने फार्म भर दिया। ऑपरेशन के लिए दो यूनिट ब्लड की आश्यकता थी। इसके लिए मैंने फेसबुक का सहारा लिया।

अब तब रात के दस बज चुके थे। मौसम विभाग के अनुसार वो 6 जनवरी की रात इस सीजन की सबसे सर्द रात थी। मैं और मेरे एक साथी ट्रामा सेंटर के बगल स्थित शताब्दी में ब्लड देने जाते हैं। क्योंकि अब ऐसा नियम है कि ब्लड के बदले ही ब्लड मिलेगा। दोनों लोगों ने ब्लड दिया। ब्लड देने के बदले अस्पताल प्रबंधन की ओर से हमें दो रुपए वाला पारले जी बिस्किट दिया गया। दो यूनिट ब्लड लेने के लिए मैंने 1200 रुपए भी अदा किया और डेढ़ घंटे बाद ब्लड लेने के लिए बुलाया गया।

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बाहर घना कोहरा था। रात के 11 बज चुके थे। घर से लगातार फोन आ रहे थे। मेरे मस्तिष्क में लगातार किसी अनहोनी का दृश्य बन रहा था। विशाल मुंबई से निकल चुका था। बुआ की बस रायबरेली पहुंची थी। अब तक मेरे दो परिचित भी अस्पताल पहुंच चुके थे। उनके आने से मुझे थोड़ा संबल मिला। डेढ़ घंटे बाद ब्लड बैंक से दो यूनिट ब्लड मिल चुका था। ऑपरेशन की तैयारी शुरू चुकी थी। दर-दवा की व्यवस्था हो चुकी थी। इंजेक्शन और कुछ दवाएं मैं खुद बाहर जाकर ले आया। 12:30 पर ऑपरेशन शुरू हुआ।

ट्रामा सेंटर में अब तक मैं 10 घंटे बिता चुका था। गैलरी में कई लोग कंबल डालकर बैठे थे। वे भी किसी अपने के लिए इतनी ठंड में हाड़ कंपा रहे थे। मैं ऊपर वाले से बस यही मना रहा था कि बुआ और विशाल के आने तक फूफा को कुछ न हो। 1 बजे बुआ और उनका भतीजा अस्पताल आ चुके थे। उन्हें नीचे जाकर ले आया। बुआ एक दम बदहवास थीं। इतनी ठंड में भी उनके शरीर पर सिवाय एक शॉल के कुछ नहीं था।

उन्हें संभालते हुए किसी तरह ऑपरेशन कक्ष तक लेकर आया। कुछ देर बाद एक डॉक्टर ने मुझे आवाज लगाई और तत्तकाल दो यूनिट और ब्लड लाने के लिए बोला। मेरे परिचित ब्लड देने की स्थिति में नहीं थे। मैं ब्लड दे ही चुका था।

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बुआ और उनके भतीजे कृष्णा को मैं शताब्दी लेकर पहुंचा। फार्म भरकर तुरंत ब्लड देने की प्रक्रिया शुरू करना चाह रहा था। वे दोनों लोग ब्लड दे रहे थे और मैं भागकर फिर ऑपरेशन कक्ष तक आया। मैं बहुत डर रहा था। मेरे मन में उस समय कई सवाल थे। मैं सोच रहा था। फूफा ऑपरेशन थियेटर में हैं। ब्लड आने में अभी डेढ़ घंटे का समय लगेगा।

इतना लंबा समय क्यों लग रहा है, डॉक्टर ने पहले ही क्यों नहीं बताया था कि ब्लड की जरूरत पड़ेगी। खैर, इस बार थोड़ा जल्दी हुआ। एक घंटे में ही ब्लड मिल गया। ब्लड मैंने ऑपरेशन कक्ष के अंदर भिजवाया। बुआ फूफा से मिलना चाह रही थीं। मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि बस, कुछ देर बाद मैं आपको मिलने ले चलूंगा।

एक डॉक्टर बाहर आता है उसने तुरंत कुछ इंजेक्शन लाने को कहा और मुझे पर्ची थमा दी। मैं नीचे कैंपस के बने मेडिकल स्टोर पर गया। वहां वो इंजेक्शन मिला नहीं। मेडिकल स्टोर वाले ने बताया कि ये दवा चौक पर मिलेगी। बाहर कोहरा इतना था कि अपना दूसरा हाथ भी न दिखे। कोई साधन तो मिलने से रहा। चौक चौराहा ट्रामा सेंटर से एक किमी की दूरी पर था। बताये अनुसार दो इंजेक्शन लेकर आता हूं। पांच मिनट वही डॉक्टर फिर आता है और वहीं इंजेक्शन दो और लाने को कहता है। उस समय गुस्सा तो बहुत आती है लेकिन किसी की जान की बात थी। फिर भागते हुए गया।

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सुबह के ढाई बज चुके थे। डॉक्टर बाहर आये। उन्होंने कहा कि पेशेंट की स्थिति ठीक नहीं है। उन्हें वेंटिलेटर पर भेजा जा रहा है। वहां से उठकर हम वेंटिलेटर वार्ड तक आते हैं।

मैं बुआ और कृष्णा के साथ बाहर बैठा था। बुआ अब शांत थीं। तीन बज रहा था। डॉक्टर ने आवाज लगायी। रामप्रसाद शुक्ला के साथ कौन है। मैं उठ ही रहा था कि उसने कहा......... रामप्रसाद शुक्ला को हम बचा नहीं पाये। मेरे पैर जैसे थम से गये। बुआ अपनी छाती पीटकर रोने लगीं। मैं समझ नहीं पा रहा था कि उस समय क्या करूं। डॉक्टर से जाकर कारण जानने की कोशिश करूं या बुआ को सम्भालूं। बुआ का रो-रोकर बुरा हाल था। मैं भी कुछ देर के लिए जमीन पर बैठ गया। मैं बुआ को फूफा से मिला नहीं पाया। विशाल को क्या जवाब दूंगा।

जैसे-तैसे सुबह होती है। सात बजे विशाल लखनऊ आ जाता है। विशाल जब अपनी मां से मिलता है, वो दृश्य आज तक मैं भूल नहीं पाया हूं। पापा को सुबह पांच बजे ही बता चुका था। सुनने के बाद पापा ने तुरंत फोन काट दिया। शायद वे मुझे कमजोर नहीं होने देना चाह रहे थे। घंटेभर बाद एक बार फिर पापा का फोन आता है, पापा कहते हैं वहां तुम्ही अब बड़े हो। बुआ को संभालो और सबको घर भेजो।

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डेथ सर्टिफिकेट, पंचनामा और पोस्टमार्टम कराते-कराते दोपहर के दो बज गये। एंबुलेंस से बुआ, विशाल और कृष्णा को भदोही के लिए भेज चुका था। घटना को एक हफ्ता बीत चुका है। लेकिन कई सवाल आज भी मेरे जेहन में हैं जिनके जवाब मैं ढूंढ रहा हूं.......

  • अगर मरीज का कोई न हो तो ऐसे बड़े सरकारी अस्पतालों में उसका इलाज कैसे होगा ?
  • ऑपरेशन के समय रात को एक या डेढ़ बजे कोई खून का बंदोबस्त कैसे कर सकता है ?
  • मरीज ऑपरेशन थियेटर मैं है, उसका पेट चीरा जा चुका है, ब्लड लेने और देने में घंटेभर से ज्यादा का समय लगता है, क्या ऐसे में ब्लड आने तक मरीज जिंदा बचा रहेगा ?
  • ऐसे गंभीर मामलों में क्या डॉक्टर्स को ये पता नहीं होता कि ऑपरेशन के समय किन-किन दवाओं की आवश्यकता पड़ती है ?

(नोट- ये रिपोर्टर के अपने निजी विचार हैं)