एक ऐसा मंदिर जहां आर्मी के बड़े-बड़े अफसर भी टेकते हैं माथा 

एक ऐसा मंदिर जहां आर्मी के बड़े-बड़े अफसर भी टेकते हैं माथा गंगोली हाट स्थित हाट कालिका मंदिर

गंगोलीहाट (पिथौरागढ़)। देश भर में ऐसे कई शक्तिपीठ हैं जो किसी न किसी पौराणिक व ऐतिहासिक कारणों से मशहूर हैं, लेकिन ये ऐसा मंदिर है जहां पर भारतीय सेना के बड़े-बड़े अफसर भी आते हैं। ये है उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले का हाट कालिका मंदिर।

चारों तरफ से देवदार के पेड़ों से घिरे हुए हाट कालिका मंदिर की घंटियों से लेकर यहां के धर्मशालाओं में किसी न किसी आर्मी अफसर का नाम मिल जाएगा, क्योंकि यहां की देवी को कुमाऊं रेजीमेंट अराध्य देवी के रूप में पूजता है। उत्तराखंड में पिथौरागढ़ ज़िले के गंगोली हाट मंदिर में साल भर आम लोगों के साथ ही कुमाऊं रेजीमेंट के जवानों और अफसरों की भीड़ लगी रहती है।

मंदिर में सेना के जवानों से चढ़ायी हैं घंटियां

कुमाऊं रेजीमेंट के हाट कालिका से जुड़ाव के बारे में एक दिलचस्प कहानी है। यहां के पुजारी भीम सिंह रावल बताते हैं, "द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) की बात है, तब भारतीय सेना का जहाज डूबने लगा। तब सैन्य अधिकारियों ने जवानों से अपने-अपने भगवान को याद करने का कहा, कुमाऊं के सैनिकों ने जैसे ही हाट काली का जयकारा लगाया वैसे ही जहाज किनारे आ गया।"

तभी से कुमाऊं रेजीमेंट ने मां काली को आराध्य देवी की मान्यता दे दी, जब भी कुमाऊं रेजीमेंट के जवान युद्ध के लिए जाते हैं तो काली मां के दर्शन के बिना नहीं जाते हैं। हर साल माघ महीने में यहां पर सैनिकों की भीड़ लग जाती है।

पहले इसका नाम शैल शिखर पर्वत था, उस समय आदि गुरू शंकराचार्य बद्रीनाथ, केदारनाथ होते हुए, यहां पर आए तो उन्हें आभास हुआ कि यहां पर कोई शक्ति है, जैसे ही आदि गुरू शंकराचार्य ऊपर पहुंचे वहां पर अचेत हो गए, तब वहां पर मां ने कन्या के रूप में दर्शन दिया और कि मुझे ज्वाला रूप से शांत रूप में ले आओ। तब उन्हें शांत किया।

देवदार के जंगल में बीच बना है येे मंदिर

हाट कालिका मंदिर की स्थापना आदि गुरू शंकराचार्य ने किया था। कूर्मांचल के भ्रमण पर निकले आदि गुरु शंकराचार्य महाराज ने जागेश्वर धाम पहुंचने पर गंगोली में किसी देवी का प्रकोप होने की बात सुनी। शंकराचार्य के मन में विचार आया कि देवी इस तरह का तांडव नहीं मचा सकती। यह किसी आसुरी शक्ति का काम है। लोगों को राहत दिलाने के उद्देश्य से वह गंगोलीहाट को रवाना हो गए। बताया जाता है कि जगतगुरु जब मंदिर के 20 मीटर पास में पहुंचे तो वह जड़वत हो गए। लाख चाहने के बाद भी उनके कदम आगे नहीं बढ़ पाए। शंकराचार्य को देवी शक्ति का आभास हो गया। वह देवी से क्षमा याचना करते हुए पुरातन मंदिर तक पहुंचे। पूजा, अर्चना के बाद मंत्र शक्ति के बल पर महाकाली के रौद्र रूप को शांत कर शक्ति के रूप में कीलित कर दिया और गंगोली क्षेत्र में सुख, शांति व्याप्त हो गई।

ये भी पढ़ें- मंदिर के फूलों से इत्र-गुलाल बनाएंगी वृंदावन के आश्रम की महिलाएं 

कुमाऊं रेजीमेंट ने पाकिस्तान के साथ छिड़ी 1971 की लड़ाई के बाद गंगोलीहाट के कनारागांव निवासी सूबेदार शेर सिंह के नेतृत्व में गंगोलीहाट आई सैन्य टुकड़ी ने महाकाली के मंदिर में महाकाली की मूर्ति की स्थापना की। कालिका के मंदिर में शक्ति पूजा का विधान है। सेना द्वारा स्थापित यह मूर्ति मंदिर की पहली मूर्ति थी। इसके बाद 1994 में कुमाऊं रेजीमेंट ने ही मंदिर में महाकाली की बड़ी मूर्ति चढ़ाई है। कुमाऊं रेजीमेंटल सेंटर रानीखेत के साथ ही रेजीमेंट की बटालियनों में हाट कालिका के मंदिर स्थापित हैं। हाट कालिका की पूजा के लिए सालभर सैन्य अफसरों और जवानों का तांता लगा रहता है।

1971 की लड़ाई में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को हराया था। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के एक लाख जवानों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया था। इस दिन को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। सेना की विजयगाथा में हाट कालिका के नाम से विख्यात गंगोलीहाट के महाकाली मंदिर का भी गहरा नाता रहा है। 1971 की लड़ाई समाप्त होने के बाद कुमाऊं रेजीमेंट ने हाट कालिका के मंदिर में महाकाली की मूर्ति चढ़ाई थी। यह मंदिर में स्थापित पहली मूर्ति थी।

First Published: 2018-03-11 14:01:23.0

Share it
Share it
Share it
Top