कुछ हुडंदगियों केे चलते न उठाएं कांवड़ियों की अास्था पर सवाल

यहां ये जान लेना भी जरूरी है कि ये कांवड़िए हैं कौन, क्या ये वही हैं जिन्हें हम जानते हैं। नहीं, ये कांवड़िए नहीं हैं। जैसे हर पीला चीज सोना और नहीं होती, वैसे हर कांवड़ियों के भेष में हर व्यति कांवड़िया नहीं हो जाता।

Mithilesh DubeyMithilesh Dubey   11 Aug 2018 8:09 AM GMT

कुछ हुडंदगियों केे चलते न उठाएं कांवड़ियों की अास्था पर सवाल

बात 2005 की है। तब मैं 10वीं में पढ‍़ता था। बड़े भैया ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर में थे। पापा उन्हें 500 रुपए दे रहे थे। ये देखकर मुझसे रहा नहीं गया और मैंने भी रुपयों की मांग की। तब पापा ने बताया कि तुम्हारे भैया कांवड़ लेकर जा रहे हैं, उसी लिए उन्हें पैसे दिए। ये पहली बार था जब मैंने कांवड़ शब्द का नाम सुना। बाद में पता चला कि गांव से सात लोगा कांवड़ लेकर जाएंगे। इलाहाबाद के संगम से जल उठाकर बाबा विश्वनाथ को चढ़ाएंगे। ये पैदल यात्रा लगभग 120 किमी की थी।

मन में ये सवाल बार-बार उठता रहा कि इतनी लंबी पैदल यात्रा ये लोग करेंगे कैसे। खैर, वो दिन भी आ गया जब मेरे गांव से ( जिला भदोही) सात लोगों समूह कांवड़ यात्रा के लिए जाने लगा।

सड‍़क किनारे पूरा गांव इकट्ठा हो गया था। पापा उस दिन दुकान नहीं गए थे। कांवड़ यात्रा के लिए बेटे को विदा करना था। दादी, मम्मी और गांव की अन्य महिलाएं हाथ में अक्षत लेकर खड़ी थी। कांवड़ियों ने बड़े बुजुर्गों का पैर छूकर आशीर्वाद लिया। जो छोटे थे, उनको आशीर्वाद दिया। उनपर अक्षत फेंका गया और यात्रा रवाना हो गई। ये लोग पहले इलाहाबाद बस से जाते हैं। फिर संगम से जल उठाने के बाद बाबा विश्वनाथ (वाराणसी) में जल चढ़ाते हैं।

फोन पर खबर मिलती रही। हम सबको बड़ी बेसब्री से उनकी वापसी का इंतजार था। तीसरे दिन खबर आई कि विस्सू बब्बा (भैया के उम्र के ही हैं लेकिन पदवी में दादा जी के भाई लगते हैं) के पैरों में छाले पड़ गए हैं। उन्हें चलने में बहुत दिक्कत है। आसपास की कई महिलाओं में ये चर्चा हो रही थी। लेकिन विस्सू बब्बा वापस नहीं आए। लगभग पांचवें दिन सभी की वापसी की खबर आई।

एक बार फिर अगवानी के लिए पूरा गांव सड‍़क किनारे इकट्ठा हुआ। बस से जैसे ही सातों लोग नीचे उतरे, हर-हर महादेव के जयकारों से माहौल शिवमय हो गया। ज्यादातर लोगों के पैरों में पट्टियां बंधी हुई थी। बच्चों ने पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया। सभी कांवड़िए गांव के सामूहिक कुंए पर इकट्ठा हुए। वहां उन्होंने लिट्टी-चोखा बनाया, खाया और फिर अपने-अपने घरों को गए।

ये सिलसिला सात साल तक चला। ऐसी मान्यता है कांवड़ उठाने वालों को कम से कम सात बार तो जल चढ़ाना ही चाहिए। इस बीच हम लोगों ने चंदा इकट्ठा करके कांवड़ यात्रा के समय सड‍़क किनारे स्टॉल लगाना भी शुरू किया। उस रोड से गुजरने वाले कांवड़ियों के लिए चाय नाश्ता आदि का प्रबंध करते थे। कुनकुन पानी से उनका पैर धोया जाता था। तब इससे बड़ा पुण्य का कोई दूसरा काम था ही नहीं।

सात साल बाद भी गांव के लोग कांवड़ यात्रा लेकर जाते रहे। अब कोई इलाहाबाद से गांव में बने मंदिर पर जल चढ़ाता है तो कोई विंध्याचल से काशी की यात्रा करता है। इस बीच बाइक और कार से जाने वाले कांवड़ियों की भी संख्या बढ़ी है, लेकिन आस्था जस की तस है।

पिछले कई सालों से कांवड़ियों के उत्पात की भी खबरें लगातार आ रही हैं। इस साल भी दिल्ली सहित अन्य जगहों से बवाल, मारपीट आदि की खबरें मिल रही हैं। लेकिन यहां ये जान लेना भी जरूरी है कि ये कांवड़िए हैं कौन, क्या ये वही हैं जिन्हें हम जानते हैं। नहीं, ये कांवड़िए नहीं हैं। जैसे हर पीला चीज सोना और हर विकेटकीपर बल्लेबाज महेंद्र सिंह धोनी नहीं हो जाता, वैसे हर कांवड़ियों के भेष में हर व्यति कांवड़िया नहीं हो जाता।

मेरठ के रमन त्यागी कहते हैं "हर साल करोड़ों लोग कांवड़ यात्रा लेकर जाते हैं। एक बार जल उठा लेने के बाद कांवड़ को किसी भी कीमत पर जमीन पर नहीं रखा जाता नहीं तो वो अशुद्ध हो जाता है। ऐसे में अगर कोई व्यवधान पैदा करे और उनकी यात्रा बाधित करेगा तो वे नाराज तो होंगे ही। एक बार जल उठा लेने के बाद कांवड़िए जल्द से जल्द मंदिर पहुंचना चाहते हैं। इन करोड़ों लोगों में से कोई एक बलवाई हो सकता है, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं होता कि सभी पर सवाल उठाए जाएं। यात्रा में कुछ लोग सिर्फ मौज मस्ती के लिए शामिल होते हैं जो ऐसी घटनाओं कां अंजाम देते हैं। लेकिन इसके लिए आस्था पर तो सवाल नहीं उठाया जा सकता।"

कांवड लेकर जाती 90 साल की बुजुर्ग महिला। फोटो-साभार योगेश मि॰ की फेसबुक वॉल से


बिहार, पटना सिटी से पंकज कुमार हर साल बाबा धाम (झारखंड) तक कांवड़ लेकर जाते हैं। ये यात्रा लगभग 250 किमी की होती हैं। वे कहते हैं "मैं पिछले 10 सालों से कांवड़ लेकर जा रहा हूं। हमारे साथ लगभग 20 लोग होते हैं। इनमें से कई लोग तो 15 साल से बाबा धाम जा रहे हैं। कभी कुछ नहीं हुआ। हां, साथ में कुछ हुड़दंगी भी मिल जाते हैं। लेकिन इसके लिए सबको जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।"

सोशल मीडिया के मुताबिक दिल्ली में कार तोड़ने वाला एक चोर निकला, पश्चिमी यूपी में पुलिस ने कई हुड़दंगियों को गिरफ्तार किया जो पुलिस ने बचने के लिए वेष बदलकर कांवड़ियों के सहारे फरार होने के चक्कर में थे। कई बार चोर उच्चके पहले भी पकड़े गए हैं। इन घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर कांवड़ को लेकर माहौल अजीब तरीके का हो गया, लोगों ने उन्हें दंगाई और हुडंदगी के अलावा कुछ लोगों ने आतंकी तक बता दिया..

किसी भी कांवड़िए का हुड़दंग और हंगामा बर्दाश्त नहीं करना चाहिए, न ही उसका किसी तरह समर्थन हो... लेकिन ये धर्म की खाईं को और गहरा करेगा.. क्योंकि इन करोड़ों कावंड़ियों में हुडदंगी १००-२०० होंगे लेकिन आस्था का कांवड वाले लाखों हैं। सोशल मीडिया पर वो ९० साल की महिला भी कांवड़ लाती नजर आई है और वो दो बेटे भी जो अपने माता-पिता को कंधे पर उठाए चल रहे हैं। होना ये चाहिए कि पुलिस ऐसे हुड़दंगियों पर सख्ती करेे, धार्मिक गुरु इन्हें कांवड का मर्म समझाएं...

मिथिलेश दुबे, गांव कनेक्शन डिजिटल डेस्क से जुड़े हैं ये उनके निजी विचार हैं।

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