रोज़गार मिले तब कर पाऊंगी बेटी की शादी

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लखनऊ। पति को फैक्ट्री में मामूली पगार मिलती थी, किसी तरह से घर का गुजारा चल पाता था। साल 2005 में फैक्ट्री बंद कर दी गई। हक की लड़ाई में चल रहे आंदोलन के दौरान पति भी गुजर गए। दो बेटियां बड़ी हो गईं हैं। काम-रोजगार नहीं है, कैसे बेटियों के हाथ पीले करूंगी। एपी सेन रोड पर अपर श्रम आयुक्त कार्यालय पर प्रदर्शन करते हुए उन्नाव जिले की मोहल्ला भूरे देवी की जुबैदा खातून (40 वर्ष) ने कहा। 

कार्यालय पर प्रदर्शन कर रहे मोहम्मद जावेद ने बताया, “उन्नाव की रहमान इंडस्ट्री की जूता बनाने की फैक्ट्री में 150 महिलाओं समेत 532 कर्मचारी कार्य करते थे। वर्ष 2005 में सभी कर्मचारियों ने कर्मचारियों को परमानेंट करने, बोनस आदि की मांग की थी।” उन्होंने आगे बताया, “कर्मचारियों की मांग को देखते हुए फैक्ट्री मालिक ने कर्मचारियों का बिना नोटिस दिए फैक्ट्री बंदी कर दी।”

कर्मचारियों की लड़ाई लड़ रहे मंजूर (47 वर्ष) ने बताया, “फैक्ट्री बंद किए जाने के खिलाफ और वेतन भुगतान को लेकर श्रम न्यायालय में मजदूरों ने शरण ली जिस पर डीएलसी ने फैक्ट्री की बंदी को अवैध घोषित कर दिया था।” उन्होंने आगे बताया, “फैक्ट्री इस निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय गई। वहां न्यायालय ने डीएलसी के फैसले को सही ठहराते हुए डीएलसी को मामले को निपटाने और 130 कर्मचारियों को फ्रेश मानते हुए 1.83 करोड़ रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया था।

इस फैसले के खिलाफ फैक्ट्री प्रशासन सुप्रीम कोर्ट गए थे, जहां सर्वोच्च अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए डीएलसी से मामले को परीक्षण कर तीन महीने में डीएलसी को रेफरेंसे के लिए राज्य सरकार को भेजने को कहा है, लेकिन अब तक डीएलसी ने इसे नहीं भेजा है।” फैक्ट्री की कर्मचारी मीना बानो ने बताया, “वह फैक्ट्री में जूता में स्लोशन लगाने, धागा काटने का काम करती थी। फैक्ट्री में 1600 रुपए वेतन दिया जाता था। छह बच्चे हैं, तीन लड़कियां शादी के लायक हो गई है, पिछले 11 साल से फैक्ट्री बंद है, रोजगार का कोई जरिया नहीं है, बेवा हूं, हमें हमारा हक मिल जाए तो बेटियों की शादी कर पाऊंगी।”

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