Wheat Export: दुनिया में गेहूँ की कमी का खतरा, भारत के पास बढ़ा निर्यात का मौका; 1.5 अरब डॉलर से ज्यादा का बाजार खुला
Mansi | Sept 03, 2026, 11:41 IST
दुनिया के गेहूँ उत्पादन में कमी से भारत को निर्यात का मौका मिलेगा। एसोचैम के अनुसार, भारत 1.5 अरब डॉलर से अधिक का गेहूं निर्यात कर सकता है। देश में गेहूंँ की अच्छी पैदावार और सरकारी भंडार निर्यात को बढ़ावा देंगे। नियमों में ढील से आटा, मैदा और सूजी जैसे उत्पाद भी निर्यात हो सकेंगे। यह अवसर किसानों को वैश्विक बाजार से जोड़ने में सहायक होगा।
दुनिया में गेहूँ की घटती पैदावार के बीच भारत के लिए निर्यात का बड़ा बाजार खुलने की उम्मीद
भारत के गेहूँ किसानों के लिए आने वाला समय एक नए बाजार का दरवाज़ा खोल सकता है। दुनिया के कई बड़े गेहूँ उत्पादक देशों में उत्पादन घटने की आशंका के बीच भारत के पास अपने अतिरिक्त गेहूं को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुँचाने का मौका बढ़ गया है। एसोचैम (ASSOCHAM) के एक अध्ययन के मुताबिक, देश में गेहूँ की अच्छी पैदावार, सरकारी भंडार में पर्याप्त स्टॉक, अपेक्षाकृत प्रतिस्पर्धी कीमत और निर्यात नियमों में हाल में दी गई ढील भारत को वैश्विक बाजार में मजबूत स्थिति दे सकती है। अध्ययन के अनुसार, इन परिस्थितियों का फायदा उठाकर भारत 1.5 अरब डॉलर से ज्यादा के गेहूँ निर्यात का कारोबार कर सकता है।
यह मौका ऐसे समय आया है, जब वैश्विक गेहूँ बाजार पर मौसम और भू-राजनीतिक परिस्थितियों का असर पड़ रहा है। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के अनुमान का हवाला देते हुए अध्ययन में कहा गया है कि 2026-27 में दुनिया का कुल गेहूँ उत्पादन करीब 819 मिलियन टन रह सकता है, जबकि 2025-26 में यह लगभग 844 मिलियन टन था। यानी वैश्विक उत्पादन में करीब 25 मिलियन टन की कमी का अनुमान है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े गेहूँ निर्यातक क्षेत्रों में उत्पादन पर दबाव आने की स्थिति में आयात करने वाले देशों को नए और भरोसेमंद सप्लायर की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में भारत के लिए एशिया और पश्चिम एशिया के बाजार खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
भारत की अपनी स्थिति भी इस समय गेहूँ के लिहाज़ से मजबूत बताई जा रही है। अध्ययन के मुताबिक, 2025-26 में देश में करीब 12.1 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन हुआ, जबकि घरेलू खपत लगभग 11.1 करोड़ टन रहने का अनुमान है।इसका मतलब है कि घरेलू जरूरत पूरी करने के बाद भी गेहूँ की एक मात्रा बाजार में उपलब्ध रह सकती है। इसके अलावा सरकारी भंडार में भी गेहूँ का स्टॉक तय बफर मानक से काफी ऊपर रहा है। 28 मई 2026 तक सरकारी बफर में करीब 5.13 करोड़ टन गेहूँ मौजूद था, जबकि 1 जुलाई के लिए निर्धारित बफर मानक करीब 2.75 करोड़ टन था। यानी सरकार के पास घरेलू जरूरत और खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पर्याप्त स्टॉक रखने के बाद भी निर्यात की गुंजाइश बनती है। यही वजह है कि सरकार ने इस साल गेहूँ के निर्यात को धीरे-धीरे बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। फरवरी 2026 में 25 लाख टन गेहूं के निर्यात की अनुमति दी गई। इसके साथ 5 लाख टन गेहूँ उत्पादों के निर्यात को भी मंजूरी मिली। इसके बाद अप्रैल में अतिरिक्त 25 लाख टन गेहूँ के निर्यात की अनुमति दी गई। इससे भारतीय गेहूं के लिए विदेशी बाजारों में पहुँच बढ़ाने का रास्ता खुला।
सरकार की ओर से सिर्फ गेहूँ के निर्यात को ही बढ़ावा नहीं दिया गया है। हाल में गेहूँ की कुछ किस्मों के साथ-साथ आटा, मैदा और सूजी जैसी चीजों को भी प्रतिबंधित निर्यात श्रेणी से निकालकर मुक्त श्रेणी में शामिल किया गया है। इससे भारतीय गेहूँ आधारित उत्पादों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुँच आसान हो सकती है। यह बदलाव किसानों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गेहूँ सिर्फ कच्चे अनाज के रूप में ही नहीं, बल्कि आटा, मैदा और दूसरे प्रसंस्कृत उत्पादों के रूप में भी बाहर भेजा जा सकता है। अगर निर्यात मांग बढ़ती है, तो इसका असर भंडारण, पैकेजिंग, परिवहन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।
विदेशी बाजार में किसी देश के गेहूँ की मांग सिर्फ उत्पादन पर निर्भर नहीं करती, कीमत भी बड़ी भूमिका निभाती है। ASSOCHAM के अध्ययन के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत का गेहूँ MSP करीब 268 डॉलर प्रति टन के बराबर बैठता है, जबकि मई 2026 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूँ की कीमत करीब 303 डॉलर प्रति टन थी। इस अंतर से भारतीय गेहूँ को कीमत के मामले में प्रतिस्पर्धी स्थिति मिल सकती है। खास बात यह है कि MSP किसानों को एक निश्चित आधार देता है, जबकि निर्यात बाजार में प्रतिस्पर्धी कीमत भारत के लिए अतिरिक्त बाजार खोल सकती है। हालांकि, रूस जैसे कुछ देशों में गेहूँ की कीमत इससे कम हो सकती है, इसलिए भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सिर्फ कीमत ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता, आपूर्ति की निरंतरता और समय पर डिलीवरी के मामले में भी प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
ASSOCHAM के अध्ययन में मिस्र, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, अल्जीरिया और फिलीपींस जैसे देशों को भारतीय गेहूँ के लिए संभावित बाजार बताया गया है। इन देशों की गेहूँ की जरूरत और भारत की भौगोलिक स्थिति भारत के लिए एक फायदा हो सकती है। भारत से इन बाजारों तक माल पहुँचाने में कई दूर के निर्यातक देशों की तुलना में परिवहन समय और लागत कम हो सकती है। भारत पहले भी बड़े पैमाने पर गेहूं निर्यात कर चुका है। 2021-22 में देश का गेहूँ निर्यात बढ़कर करीब 72.4 लाख टन पहुँच गया था और इसका मूल्य करीब 2.12 अरब डॉलर रहा था। हालांकि, बाद में घरेलू उपलब्धता और कीमतों को देखते हुए निर्यात पर प्रतिबंध और नियंत्रण लगाए गए। अब जब देश में उत्पादन और सरकारी स्टॉक की स्थिति मजबूत है, तो सरकार ने निर्यात के लिए फिर से गुंजाइश बनाई है। अगर वैश्विक बाजार में उत्पादन घटता है और आयातक देशों की मांग बढ़ती है, तो भारत इस मौके को अपने गेहूँ किसानों और कृषि कारोबार के लिए इस्तेमाल कर सकता है।
गेहूँ का निर्यात बढ़ने का सीधा फायदा तभी किसानों तक पहुँचेगा, जब विदेशी मांग का असर घरेलू खरीद और किसानों को मिलने वाली कीमतों पर भी दिखाई दे। निर्यात के लिए बड़ी मात्रा में गेहूँ की जरूरत होने पर किसानों को स्थानीय मंडियों के अलावा नए बाजार मिल सकते हैं। इससे भंडारण, परिवहन, ग्रेडिंग, गुणवत्ता जांच और खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े कारोबार को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है। हालांकि, सरकार के सामने सबसे जरूरी संतुलन घरेलू खाद्य सुरक्षा और निर्यात के बीच रहेगा। देश की जरूरत पूरी करने और पर्याप्त सरकारी स्टॉक बनाए रखने के बाद ही बड़े पैमाने पर निर्यात टिकाऊ हो सकता है। अगर यह संतुलन बना रहा, तो दुनिया में गेहूं की संभावित कमी भारत के लिए सिर्फ निर्यात का मौका नहीं, बल्कि किसानों को वैश्विक बाजार से जोड़ने का अवसर भी बन सकती है।
यह मौका ऐसे समय आया है, जब वैश्विक गेहूँ बाजार पर मौसम और भू-राजनीतिक परिस्थितियों का असर पड़ रहा है। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के अनुमान का हवाला देते हुए अध्ययन में कहा गया है कि 2026-27 में दुनिया का कुल गेहूँ उत्पादन करीब 819 मिलियन टन रह सकता है, जबकि 2025-26 में यह लगभग 844 मिलियन टन था। यानी वैश्विक उत्पादन में करीब 25 मिलियन टन की कमी का अनुमान है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े गेहूँ निर्यातक क्षेत्रों में उत्पादन पर दबाव आने की स्थिति में आयात करने वाले देशों को नए और भरोसेमंद सप्लायर की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में भारत के लिए एशिया और पश्चिम एशिया के बाजार खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकते हैं।