नौतपा नहीं पड़ा तो बढ़ सकते हैं ख़तरनाक कीट! आख़िर क्यों धरती के लिए ज़रूरी मानी जाती है ये भीषण गर्मी?

Preeti Nahar | May 24, 2026, 17:25 IST
नौतपा आते ही लोग गर्मी, लू और तपती दोपहर की शिकायत करने लगते हैं। लेकिन क्या हो अगर यही भीषण गर्मी धरती और इंसानों को कई खतरनाक कीटों और बीमारियों से बचाने का काम करती हो? मौसम और पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि नौतपा सिर्फ तापमान बढ़ाने वाला दौर नहीं, बल्कि प्रकृति का एक ऐसा चक्र है जो कई हानिकारक जीवों की संख्या को नियंत्रित करता है। सवाल यह है कि अगर नौतपा कमजोर पड़ जाए या बिल्कुल न हो, तो पर्यावरण और इंसानी जीवन पर इसका क्या असर पड़ सकता है?

Importance of Nautapa: गाँवों में बुजुर्ग अक्सर कहते हैं “नौतपा नहीं तपा, तो धरती पर रोग और कीड़े बढ़ेंगे।” पहली नजर में यह सिर्फ पुरानी कहावत लग सकती है, लेकिन इसके पीछे गहरा पर्यावरणीय विज्ञान छिपा है।



साथ ही मई-जून की तपती दोपहर, गर्म हवाएं और झुलसा देने वाली धूप को आमतौर पर लोग सिर्फ परेशानी और असहनीय गर्मी के रूप में देखते हैं। लेकिन यह भीषण गर्मी सिर्फ इंसानों की ही परीक्षा नहीं लेती, बल्कि धरती के इकोसिस्टम को संतुलित रखने में भी बड़ी भूमिका निभाती है।



मई-जून की तेज गर्मी कई ऐसे कीटों, फफूंद और बैक्टीरिया के जीवन चक्र को तोड़ती है, जो बारिश के मौसम में तेजी से फैल सकते हैं। यही वजह है कि नौतपा को सिर्फ ‘भीषण गर्मी’ नहीं, बल्कि धरती का प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने वाली प्रक्रिया माना जाता है।



क्या होता है नौतपा?

जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब शुरू होने वाले लगातार 9 दिनों की तेज गर्मी को नौतपा कहा जाता है। इस दौरान उत्तर भारत समेत कई हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँच जाता है। हालांकि यह मौसम इंसानों के लिए मुश्किल होता है, लेकिन प्रकृति के लिए यह एक तरह की ‘रीसेट प्रक्रिया’ मानी जाती है।



नौतपा न हो तो क्यों बढ़ सकते हैं कीट?

तेज गर्मी कई हानिकारक जीवों और सूक्ष्म जीवों के जीवन चक्र को प्रभावित करती है। अगर नौतपा कमजोर पड़ जाए या लगातार बारिश और नमी बनी रहे, तो कई कीट तेजी से बढ़ सकते हैं।



1. मच्छरों की संख्या बढ़ सकती है- गर्मी के दौरान छोटे गड्ढों, तालाबों और जमा पानी का स्तर कम होता है। इससे मच्छरों के लार्वा नष्ट होते हैं। लेकिन अगर नौतपा कमजोर पड़े और नमी ज्यादा बनी रहे, तो मच्छरों का प्रजनन तेजी से बढ़ सकता है। इससे डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।



2. फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीट बढ़ सकते हैं- तेज गर्मी कई फसल रोग फैलाने वाले कीड़ों को नियंत्रित करती है। अगर पर्याप्त गर्मी न पड़े, तो ये कीट ज्यादा समय तक जीवित रह सकते हैं। इनमें शामिल हैं टिड्डे, माहू (Aphids), सफेद मक्खी, दीमक, पत्ती खाने वाले कीट। ये कीट खेतों में तेजी से फैलकर फसलों को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।



3. फफूंद और बैक्टीरिया का खतरा- नमी और हल्का तापमान कई तरह की फफूंद और बैक्टीरिया के लिए आदर्श वातावरण बनाते हैं। नौतपा की गर्मी इन्हें नियंत्रित करने में मदद करती है। अगर गर्मी का यह दौर कमजोर पड़े तो लगातार नमी और कम तापमान कई परजीवी जीवों के लिए अनुकूल माहौल बनाते हैं। इससे खेतों और जल स्रोतों में जैविक संतुलन बिगड़ सकता है जैसे-पौधों में फंगल रोग बढ़ सकते हैं, अनाज और सब्जियों में सड़न बढ़ सकती है, मिट्टी में संक्रमण फैल सकता है।



4. जहरीले और परजीवी जीवों की संख्या बढ़ सकती है- पर्यावरण विशेषज्ञ बताते हैं कि लगातार नमी और कम तापमान कई परजीवी जीवों के लिए अनुकूल माहौल बनाते हैं। इससे खेतों और जल स्रोतों में जैविक संतुलन बिगड़ सकता है।



5- धरती के लिए ‘नेचुरल सैनिटाइजेशन’ जैसा है नौतपा- नौतपा धरती का प्राकृतिक सैनिटाइजेशन है। जैसे तेज धूप और उच्च तापमान-



  1. मिट्टी की ऊपरी सतह को साफ करते हैं
  2. कई हानिकारक सूक्ष्म जीवों को कमजोर करते हैं
  3. खेतों में कीटों का जीवन चक्र तोड़ते हैं
  4. वातावरण में नमी संतुलित करते हैं, यानी यह गर्मी सिर्फ तापमान नहीं बढ़ाती, बल्कि प्रकृति की सफाई प्रक्रिया का हिस्सा भी होती है।

मानसून से भी जुड़ा है सीधा संबंध

नौतपा की गर्मी धरती को तेजी से गर्म करती है, जिससे उत्तर भारत में लो-प्रेशर बनता है। यही कम दबाव समुद्र से मानसूनी हवाओं को भारत की ओर खींचता है। अगर नौतपा कमजोर पड़े, तो मानसून देर से आ सकता है, बारिश कमजोर हो सकती है और वर्षा का संतुलन बिगड़ सकता है। यानी यह गर्मी आगे चलकर बारिश का रास्ता भी तैयार करती है।



जलवायु परिवर्तन से बदल रहा पैटर्न

पिछले कुछ वर्षों में मौसम वैज्ञानिकों ने देखा है कि नौतपा के दौरान कई जगहों पर असामान्य बारिश हो रही है या गर्मी का पैटर्न बदल रहा है। इसका असर खेती, कीट नियंत्रण और मानसून पर पड़ सकता है। अगर भविष्य में नौतपा लगातार कमजोर होता गया, तो इससे पर्यावरणीय संतुलन पर बड़ा असर पड़ सकता है।



सिर्फ लू नहीं, प्रकृति का संतुलन भी है नौतपा

जिस नौतपा को लोग सिर्फ असहनीय गर्मी समझते हैं, वही प्रकृति के लिए बेहद जरूरी प्रक्रिया भी है। यह कई हानिकारक कीटों और रोग फैलाने वाले जीवों को नियंत्रित करता है, मिट्टी और फसलों को तैयार करता है और मानसून के लिए वातावरण बनाता है। यानी कभी-कभी धरती को भी ‘तपना’ जरूरी होता है, ताकि प्रकृति का संतुलन बना रहे।

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