मानसून के सामने आई 'गर्मी की दीवार'! जानिए क्यों थम गई बारिश की रफ्तार, खेती, पानी और महंगाई पर बढ़ा ख़तरा!
देश के कई हिस्सों में लोग मानसून की बारिश का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन इस बार मौसम ने नया मोड़ ले लिया है। केरल से तेजी से आगे बढ़ने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून अब मध्य भारत पहुंचकर सुस्त पड़ गया है।
मौसम विभाग के मुताबिक इसकी वजह मध्य भारत के ऊपर बनी गर्म और सूखी हवाओं की एक मजबूत परत है, जो मानसूनी हवाओं के रास्ते में दीवार बनकर खड़ी हो गई है। इस स्थिति ने किसानों, मौसम विशेषज्ञों और बाजारों की चिंता बढ़ा दी है।
अगर अगले 10 से 15 दिनों में मानसून की रफ्तार नहीं बढ़ी तो खरीफ फसलों की बुवाई, जल भंडारों की स्थिति और खाद्य पदार्थों की कीमतों पर असर पड़ सकता है। यदि मानसून जल्द सक्रिय हुआ तो स्थिति सामान्य हो सकती है, लेकिन देरी बढ़ी तो इसका असर खेत से लेकर बाजार तक दिखाई दे सकता है।
केरल से तेज शुरुआत, फिर अचानक क्यों थम गया मानसून?
इस साल मानसून ने केरल में प्रवेश के बाद शुरुआत में अच्छी रफ्तार दिखाई। कुछ ही दिनों में यह कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के कई हिस्सों तक पहुंच गया। मौसम विभाग के बुलेटिन के अनुसार मानसून की उत्तरी सीमा तेजी से आगे बढ़ी, जिससे उम्मीद जगी कि इस बार बारिश सामान्य से बेहतर रह सकती है।
लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग निकली। मानसूनी हवाओं की सीमा तो आगे बढ़ी, मगर मध्य भारत के ऊपर मौजूद गर्म और सूखी पश्चिमी हवाओं ने नमी को ऊपर उठने और घने बादल बनने से रोक दिया। नतीजा यह हुआ कि कई क्षेत्रों में मानसून पहुंचने के बावजूद व्यापक और लगातार बारिश नहीं हो पाई।
क्या है 'हीट वॉल' या गर्म हवा की दीवार?
मौसम विज्ञान की भाषा में इसे शुष्क वायु द्रव्यमान (Dry Air Mass) कहा जा सकता है। यह गर्म और सूखी हवा का बड़ा क्षेत्र है, जो मध्य भारत के ऊपर फैला हुआ है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी भरी हवाएं जब इस क्षेत्र से टकराती हैं तो बादलों का विकास कमजोर पड़ जाता है।
सरल शब्दों में समझें तो बारिश लाने वाली हवाएं मौजूद हैं, लेकिन उन्हें ऊपर उठकर बादल बनाने का मौका नहीं मिल रहा। यही वजह है कि मानसून का नक्शे पर विस्तार दिख रहा है, लेकिन जमीन पर कई जगह अच्छी बारिश नहीं हो रही।
सबसे ज्यादा चिंता किसानों को क्यों?
जून का महीना खरीफ सीजन की शुरुआत का समय होता है। धान, सोयाबीन, कपास, मक्का, मूंगफली, अरहर और अन्य फसलों की बुवाई इसी समय शुरू होती है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में लाखों किसान पहली अच्छी बारिश का इंतजार करते हैं।
यदि पर्याप्त बारिश नहीं होती तो किसान बुवाई टालते हैं। बुवाई में देरी होने पर फसल की अवधि घट जाती है, जिससे उत्पादन कम हो सकता है। खासकर सोयाबीन, कपास और दालों जैसी फसलों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
मिट्टी की नमी और जल संकट भी बढ़ सकता है
मार्च से मई के दौरान देश के कई हिस्सों में भीषण गर्मी और लू चली। इस दौरान मिट्टी की नमी काफी कम हो गई और तालाबों, कुओं तथा छोटे जलाशयों का जलस्तर भी घट गया। मानसून के शुरुआती दौर में अच्छी बारिश न होने से नमी की भरपाई नहीं हो पा रही है।
यदि बारिश में और देरी होती है तो सिंचाई पर निर्भरता बढ़ेगी, जिससे किसानों की लागत भी बढ़ सकती है।
क्या बढ़ सकती है महंगाई?
मानसून का सीधा संबंध सिर्फ खेती से नहीं, बल्कि आम लोगों की रसोई से भी है। भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादन काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। यदि खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होती है तो दालों, खाद्य तेलों, अनाज और सब्जियों की आपूर्ति पर असर पड़ सकता है।यदि अगले दो हफ्तों में बारिश की स्थिति नहीं सुधरी तो कमोडिटी बाजार में अनिश्चितता बढ़ सकती है और खाद्य महंगाई पर दबाव बन सकता है।
20 जून के बाद बदल सकती है तस्वीर
मौसम वैज्ञानिकों की नजर अब अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में बनने वाले नए मौसम तंत्रों पर है। उम्मीद है कि 20 जून के आसपास कोई मजबूत सिस्टम विकसित हो सकता है, जो नमी भरी हवाओं को मध्य भारत तक पहुंचाने में मदद करेगा और गर्म हवा की इस दीवार को कमजोर करेगा। अगर ऐसा होता है तो मानसून फिर से रफ्तार पकड़ सकता है और मध्य भारत समेत उत्तर भारत के बड़े हिस्से में अच्छी बारिश शुरू हो सकती है।
किसानों के लिए सलाह
विशेषज्ञों का कहना है कि किसान शुरुआती हल्की फुहारों को देखकर जल्दबाजी में बुवाई न करें। पर्याप्त और लगातार बारिश का इंतजार करना बेहतर रहेगा। साथ ही स्थानीय मौसम पूर्वानुमान और कृषि विभाग की सलाह पर नजर बनाए रखें।
मानसून अभी रुका है, खत्म नहीं हुआ है। लेकिन मध्य भारत के ऊपर बनी गर्म और सूखी हवाओं की दीवार ने फिलहाल इसकी चाल धीमी कर दी है। अगले 10 से 15 दिन खेती, जल संसाधनों और खाद्य कीमतों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। क्योंकि अगर मानसून जल्द सक्रिय हुआ तो स्थिति सामान्य हो सकती है, लेकिन देरी बढ़ी तो इसका असर खेत से लेकर बाजार तक दिखाई दे सकता है।