गन्ने के खेतों में उग रही ‘तेल क्रांति’! जानिए यूपी के किसानों के लिए कैसे गेमचेंजर बन रही मूंगफली इंटरक्रॉपिंग?
Sugarcane Groundnut Intercropping: मेरठ के कुछ खेत इन दिनों सिर्फ गन्ना पैदा नहीं कर रहे, बल्कि देश की ‘तेल आत्मनिर्भरता’ का नया रास्ता भी तैयार कर रहे हैं। खेतों की लंबी कतारों के बीच एक ऐसा प्रयोग चल रहा है, जिसने कृषि वैज्ञानिकों से लेकर नीति निर्माताओं तक का ध्यान खींच लिया है। यही वजह है कि ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट खुद किसानों के बीच पहुंचे और इस मॉडल को भारत की खेती के लिए बड़ा बदलाव बताया। सवाल यह है कि आखिर गन्ने के बीच कौन सी फसल उगाकर किसान अतिरिक्त कमाई और देश को खाद्य तेल संकट से राहत दिलाने की कोशिश कर रहे हैं?
जानिए गन्ने के साथ उग रही है कौनसी फसल?
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के सरधना ब्लॉक के कुशावली गाँव में इन दिनों खेत सिर्फ फसल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि कृषि के नए प्रयोगों की प्रयोगशाला बन चुके हैं। यहाँ गन्ने के बीच मूंगफली की खेती ने वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और किसानों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव डॉ. एम. एल. जाट ने इन खेतों का दौरा किया। उन्होंने किसानों से सीधे बातचीत की और गन्ना और मूंगफली इंटरक्रॉपिंग मॉडल को भारत की खाद्य तेल आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बताया।
आखिर क्या है गन्ना-मूंगफली इंटरक्रॉपिंग?
इंटरक्रॉपिंग यानी एक ही खेत में एक साथ दो फसलों की वैज्ञानिक तरीके से खेती करना। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान पारंपरिक रूप से गन्ने की खेती करते हैं, लेकिन अब वैज्ञानिक गन्ने की कतारों के बीच मूंगफली जैसी तिलहनी फसल उगाने का मॉडल विकसित कर रहे हैं। इसका फायदा यह है कि किसान को एक ही खेत से दो फसलें मिलती हैं। जहाँ गन्ना लंबी अवधि की नकदी फसल है, वहीं मूंगफली कम समय में तैयार होकर अतिरिक्त आमदनी देती है।
खाद्य तेल आयात घटाने की बड़ी रणनीति
भारत हर साल बड़ी मात्रा में खाद्य तेल आयात करता है, जिस पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं। इसी चुनौती को देखते हुए डॉ. एम. एल. जाट ने कहा कि देश को खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनना होगा और इसके लिए विज्ञान आधारित इंटरक्रॉपिंग सबसे मजबूत रास्ता है।
उन्होंने लक्ष्य रखा कि गन्ना आधारित इंटरक्रॉपिंग मॉडल के जरिए देश में 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मूंगफली और अन्य तिलहनी फसलों का विस्तार किया जाए। अगर यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल होता है, तो यह भारत की ‘ऑयलसीड मिशन’ रणनीति का अहम हिस्सा बन सकता है।
किसानों को कैसे हो रहा फायदा?
कुशावली और आसपास के गाँवों में कई किसान इस मॉडल को अपनाने लगे हैं। किसानों के मुताबिक इससे खेत की खाली जगह का बेहतर उपयोग हो रहा है और अतिरिक्त आय भी मिल रही है। मूंगफली की फसल मिट्टी में जैविक नाइट्रोजन जोड़ने का काम भी करती है यानी इससे गन्ने की फसल को भी फायदा मिलता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस मॉडल के कुछ बड़े फायदे हैं:
- एक खेत से दो फसलों की कमाई
- मिट्टी की उर्वरता में सुधार
- अतिरिक्त तिलहन उत्पादन
- पानी और संसाधनों का बेहतर उपयोग
- जोखिम कम और आय के नए स्रोत
- मशीनों और तकनीक पर जोर
दौरे के दौरान वैज्ञानिकों ने सिर्फ खेती के फायदे ही नहीं बताए, बल्कि यह भी चर्चा की कि बड़े स्तर पर इस मॉडल को सफल बनाने के लिए आधुनिक मशीनों और तकनीक की जरूरत होगी। गन्ना और मूंगफली की एक साथ बुवाई, सिंचाई, निराई-गुड़ाई और कटाई के लिए विशेष मैकेनाइजेशन मॉडल पर काम किया जा रहा है। वैज्ञानिकों ने फसल सुरक्षा, रोग प्रबंधन और संसाधन दक्षता बढ़ाने के उपायों पर भी किसानों को जानकारी दी।
वैज्ञानिकों और किसानों के बीच सीधा संवाद
इस कार्यक्रम में ICAR-IIFSR के वैज्ञानिकों के साथ डॉ. सुनील कुमार, डॉ. एस. एन. सुशील और डॉ. एलिसन लैंग जैसे विशेषज्ञ भी शामिल हुए। उन्होंने किसानों के अनुभव सुने और इंटरक्रॉपिंग को ज्यादा लाभकारी बनाने के सुझाव दिए। किसानों ने बताया कि पारंपरिक खेती में बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के बीच यह मॉडल उम्मीद की नई राह दिखा रहा है। खासकर छोटे किसानों के लिए यह अतिरिक्त कमाई का मजबूत विकल्प बन सकता है।