साठा धान तराई को बना देगा बंजर

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पीलीभीत। तराई क्षेत्र में स्थित पीलीभीत में उपजाऊ भूमि और भूमिगत जलस्तर अच्छा होने के कारण यह कृषि के लिए अग्रणी है। यहां के किसान साठा धान की खेती करने के लिए जाने जाते हैं।

साठा या चैनी धान गर्मी के मौसम में उगाया जाता है जबकि बारिश न के बराबर होती है। साठा धान की पूरी फसल की सिंचाई भूमिगत जल द्वारा की जाती है, जिससे भूमि का जलस्तर लगातार नीचे गिर रहा है। जनपद में विगत 5-7 सालों से इस धान का चलन काफी बढ़ा है। 

जनपद की मुख्य तहसील पूरनपुर में 6810 हेक्टर में साठा धान की खेती की जा रही है, जिसकी पैदावार 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टर है। 

इस धान की उपज खरीफ वाले धान की तुलना में कुछ अधिक रहती है। जब यह धान बाज़ार में आता है तो कई बार बारिश हो चुकी होती है। गीला धान ही बिक्री के लिए मण्डी में लाया जाता हैं। गीला होने की वजह से किसानों को इसका वाजिब दाम नहीं मिल पाता। 

धान मिल मालिकों के पास तो सुखाने के लिए डायर लगे होते हैं, वो किसानों का धान औने पौने दामों में खरीदकर मोटा मुनाफा कमाने में सफल हो जाते हैं। 

जनपद पीलीभीत के कृषि वैज्ञानिक डॉ एमएस ढाका बताते हैं, “यह साठा धान वैज्ञानिक रूप से भी खेतों के लिए हानिकारक है एक तो साठा धान के बाद लगातार दूसरी धान की फसल लेने से भूमि की उर्वकता का कमी होती है और भूमि में आवश्यक उर्वरक तत्वों की कमी हो जाती है।”  

साठा धान में कीट एवं रोग कम लगते हैं लेकिन यह धान गर्मियों में लगने वाले कीटों को लगातार भोजन उपलब्ध कराकर खरीफ फसल में लगने वाले कीटों के लिए अधिक अनुकूल वातावरण तैयार कर देता है जिससे मुख्य फसल में कीट और बीमारियां ज्यादा लगने लगती हैं। 

डॉ ढाका आगे बताते हैं, “चैनी धान का सबसे अधिक हानिकारक प्रभाव भूमिगत जल पर होता है, जिससे भूमिगत जलस्तर नीचे चला जाता है।” 

जिला कृषि अधिकारी अवधेश मिश्रा बताते हैं, “साठा धान की पैदावार 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है क्योंकि यह धान गीला होता है और राज्य सरकार द्वारा भी इसका कोई मूल्य निर्धारित नहीं किया जाता है, जिसकी वजह से व्यापारी इस धान को गीला बताकर सस्ते दामों पर खरीद लेते हैं।”

रिपोर्टर - अनिल चौधरी 

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