सावधान! आम ही खाएं, जहर नहीं

सावधान! आम ही खाएं, जहर नहींgaoconnection

आज इस लेख में हम इसी विषय का जिक्र करने जा रहे हैं। पिछ्ले कुछ वर्षों से आम व्यापारियों ने ग्राहकों की सेहत से खिलवाड़ करते हुए आमों को जल्दी पकाने के अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया है। कृत्रिम रूप से आमों को पकाकर बाजार में धड़ल्ले से बेचा जाता है, पके और मोहक से दिखाई देने वाले आमों को खरीदते समय हम भूल जाते हैं कि यही आम हमें किस कदर नुकसान पहुंचा सकते हैं।

आमों को पकाने के लिए जिस रसायन का आमतौर पर इस्तेमाल किया जाता है उसे कैल्शियम कार्बाइड के नाम से जाना जाता है और आधुनिक शोधों से प्राप्त जानकारी के अनुसार कैल्शियम कार्बाइड एक घातक कैंसर कारक रसायन है, जिसका उपभोग लम्बे समय तक करने से मानव स्वास्थ को बेहद हानि पहुंच सकती है। जल्दी बिक्री और ज्यादा मुनाफे की चाहत में आमों को इस रसायन का उपयोग कर पका दिया जाता है और बाजार में खुलेआम बेचा जाता है। 

आम के मौसम की शुरुआत होने से पहले ही पके हुए आमों को बाजार में बिकता देखना आश्चर्यचकित कर देता है लेकिन आमतौर पर लोग इस बात को नकार देते हैं। यहां इस बात का जिक्र करना भी जरूरी है कि आमों को पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड का इस्तेमाल खाद्य एवं औषधि प्रशासन की ओर से प्रतिबंधित है, यानि इसका उपयोग करना गैर कानूनी है।

चलिए थोड़ी और गहराई से कैल्शियम काबाईड के बारे में जानते हैं। वास्तव में कैल्शियम काबाईड खुद आमों को पकाने में सक्षम नहीं होता है, दरअसल आमों के पकने का सिलसिला बेहद प्राकृतिक होता है और यह कार्य एक जैव रासायनिक क्रिया के तहत पूर्ण होता है। 

जब फल परिपक्व हो जाता है तो इसमें एक विशेष गैस एथिलीन का निर्माण होता है और साथ ही आम के अंदर उपस्थित अम्लों का भी विघटन भी शुरु हो जाता है और इस प्रक्रिया के दौरान फल में उपस्थित स्टार्च शर्करा में तबदील हो जाती है। आम के व्यापारी और किसान बंधु अक्सर अधिक आवक के चक्कर में आमों को पेड़ पर पकने से पहले ही तोड़ लेते हैं जिससे आम में होने वाली जैव रासायनिक क्रिया बाधित हो जाती है और फलों में प्राकृतिक रूप से एथिलीन गैस नहीं बन पाती और इन स्थितियों में आम स्वत: पकने में सक्षम नहीं होता है।आमों को पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड का इस्तेमाल किया जाना यानि आम में होने वाली स्वभाविक जैव रासायनिक क्रिया को बाधित करना है। 

कैल्शियम काबाईड एक गैस एसिटिलीन बनाता है जो कि प्राकृतिक रूप से आमों में परिपक्वन के दौरान बनने वाली रासायनिक गैस एथिलीन से अलग होती है। एथिलीन तो दरअसल एक तरह का पादप हार्मोन है, जो आम के गुदे में परिपक्वन को अंजाम देने में मदद करता है जबकि एसिटिलीन गुदे को पकाने से पहले आम के छिलकों को पका देता है। एसिटिलीन का बाजारू इस्तेमाल वेल्डिंग व्यवसाय में बतौर ईंधन किया जाता है।

 जब कैल्शियम कार्बाइड से एसिटिलीन का निर्माण होता है तो इसमें कई तरह की जहरीली अशुद्धताएं होती हैं जो कि मानव शरीर के तंत्रिका तंत्र पर खासा प्रभाव डाल सकती हैं। जब कैल्शियम कार्बाईड को आम से भरे डिब्बों में डाला जाता है तो इन डिब्बों में एसिटिलीन गैस भर जाती है और यही गैस आमों को बाहरी तौर पर पका देती है और आम की त्वचा हरी से पीली हो जाती है। कई जगह पर प्रतिबंधित होने की वजह से आमों को पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाईड के बजाए एथिलीन का प्रयोग किया जाता है लेकिन महंगा होने की वजह से अक्सर विक्रेता चोरी चुपके कैल्शियम कार्बाईड का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। 

कैल्शियम काबाईड से पके हुए आम किस तरह घातक हो सकते हैं, इसका आकलन भी कर पाना आम जनों के लिए मुश्किल है। लेकिन, आम व्यापारियों के पास अपने तर्क हैं, इनके अनुसार ज्यादातर देश भर में आम दक्षिण भारत और गुजरात से पहुंचाए जाते हैं और आमों को प्राकृतिक तौर पर पकने दिया जाए और बाद में व्यापार के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाए तो आम मंजिल तक पहुंचने से पहले ही खराब हो चुके होंगे। 

लेकिन यह तर्क व्यक्तिगत तौर पर मुझे सही नहीं समझ पड़ता क्योंकि कैल्शियम कार्बाईड के अलावा भी अन्य रसायन हैं जो सेहत के लिए घातक नहीं हैं, इनका इस्तेमाल आम पकाने के लिए किया जा सकता है और इनकी कीमत 5 से 10 रुपयों के बीच ही होती है यद्यपि विक्रेताओं की मानी जाए तो इन रसायनों की यह कीमत ज्यादा है और वो अपने मुनाफे को कम होता देख कैल्शियम  कार्बाईड का ही इस्तमाल चोरी चुपके कर रहे हैं जो कि 2 से 3 रूपए में उपलब्ध है। कैल्शियम  कार्बाईड से आम पक जरूर जाते हैं लेकिन इनकी प्राकृतिक सुगंध खो जाती है।

आखिर क्या बला है कैल्शियम कार्बाईड?

इसे आमतौर पर मसाला के नाम से जाना जाता है, इसका रासायनिक फार्मूला CaC2 है। इसका इस्तेमाल एसिटिलीन के स्रोत के तौर पर ब्लोटार्च और वेल्डिंग आदि के कार्यों के लिए किया जाता है। पानी के संपर्क में आकर कैल्शियम  कार्बाईड एसिटिलीन गैस का निर्माण करता है, जो कि आम को पकाने के लिए कारगर होती है। कैल्शियम कार्बाईड में अतिसूक्ष्म मात्रा में आर्सेनिक और फास्फोरस हाइड्राईड पाए जाते हैं, जो कैंसर कारक हैं।

कैल्शियम कार्बाइड के अलावा कई अन्य रसायनों का इस्तेमाल करके भी आमों को पकाया जाता है। एथेफोन नाम रसायन को पानी में घोलकर कच्चे आमों पर छिड़काव किया जाता है। एथेफोन भी एथिलीन गैस उत्पन्न करता है जो कि आम पकाने के लिए महत्वपूर्ण होती है। एक अन्य रसायन 2,4- क्लोरोफेनिलथायोट्रायएथिल एमीन हायड्रोक्लोराईड जिसे सेप्टा के नाम से भी जाना जाता है, का इस्तेमाल आमों को पकाने के लिए किया जाता है। एब्सिसिसिन का इस्तेमाल भी अक्सर देखने में आता है। इन सब के अलावा कई आम विक्रेता एस्कार्बिक एसिड और क्युप्रिक एथिलीन डायामाईन टेट्राएसिटेट का इस्तेमाल भी करते हैं जो कि एथिलीन निर्माण में सहायक होते हैं।

इन रसायनों से पके हुए आमों को आखिर कैसे पहचानें 

आमों को पानी से भरे किसी पात्र या बाल्टी में डालिए, यदि ये तैरने लगे तो मान लीजिए कि आमों को रसायनों की मदद से पकाया गया है। इसके अलावा आमों को हाथ में उठाकर देखिए, इनकी बाहरी त्वचा पर हल्की सी झुर्रियां दिखाई देंगी। आमतौर पर लोग मानते हैं कि आमों पर झुर्रियां हो तो वे प्राकृतिक रूप से पके हुए होते है, ऐसा नहीं है।

आम हल्का सा हरापन लिया हो और झुर्रियां भी दिखाई दें तो तय है कि आम को पेड़ पर पकने से पहले ही तोड़ लिया गया है और रसायनों की मदद से पकाया गया है। आम पर हल्के हल्के हरे चत्तों या धब्बों का दिखना भी दिखाता है कि इसे रसायनों की मदद से पकाया गया है जबकि प्राकृतिक तौर पर पका आम हरा हुआ भी तो चत्ते या धब्बे नहीं दिखायी देंगे बल्कि अपने पीलेपन के साथ हरे रंग का समानता दिखाई देगी। इसके अलावा, आम को काटा जाए, समांगी या एकरूप से पका आम प्राकृतिक है जबकि अधकचा, कहीं लाल कहीं हल्का पीला आम रासायनों की मदद से पकाया गया है।   

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