सावन, शिव और प्रकृति संरक्षण

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सावन या श्रावण मास आरंभ हो गया है। इस दौरान मंदिरों और पूजा स्थलों पर शिव जी की आराधना का विशेष महत्व होता है। ग्रामीण इलाकों में, खासतौर से मध्यप्रदेश में, इस पूजा के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और जड़ी-बूटियों के ज्ञान का कमाल का संयोग देखा जा सकता है।

सतपुड़ा वनांचलों में बसे आदिवासियों के लिए श्रावण मास का बहुत महत्व है। पर्यावरण संतुलन और वन संरक्षण को लेकर जितने सजग ये वनवासी हैं, गोलमेज पर बैठकर चिंतन करने वाले तथाकथित शिक्षा और पर्यावरणविद नहीं। चाहे वनवासियों की मान्यताओं की बात करूं या उनकी दैनिक जीवन शैली की, वन और पर्यावरण की बातें हमेशा उनके करीब होती हैं। 

श्रावण मास की शुरुआत में गाँव के बुजुर्ग और जवान पहाड़ों पर बने प्राकृतिक झरनों का जल एकत्र करके लाते हैं और इस शुद्ध प्राकृतिक जल से शिवजी (बड़ा देव) की पूजा अर्चना की जाती है। आदिवासी मान्यताओं के अनुसार शिव क्रोध और गुस्से के प्रतीक देव हैं और इन्हें जल से स्नान करा कर मानसिक तौर से शांत कराया जाता है।

गाँव की आदिवासी महिलाएं नदी, झरनों और पोखरों के करीब जाकर किनारे की मिट्टी एकत्र करके लाती हैं। इस मिट्टी की मदद से पार्थिव शिवलिंग या मिट्टी से बने शिवलिंगों को तैयार किया जाता है। 101 या 201 शिवलिंगों को कुछ इस तरह तैयार किया जाता है कि सभी एक आकार के बनें। इन पार्थिव शिवलिंगों को एक विशेष पूजा अर्चना के साथ स्थापित किया जाता है। विगत वर्ष की फसलों से प्राप्त धान को लेकर महिलाएं इन पार्थिव शिवलिंगों के पास आती है और आहिस्ता-आहिस्ता धान को छीलकर चावल के दानों को एकत्र किया जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया में ध्यान रखा जाता है कि चावल के दाने टूटे नहीं और यदि चावल के दाने टूट जाते हैं तो इन दानों को पूजन में उपयोग में नहीं लिया जाता है। इन अक्षत दानों से पार्थिव शिवलिंगों का पूजन किया जाता है, इन्हें शिवलिंग पर अर्पित किया जाता है। इसके बाद बेल पत्रों से बड़ादेव का पूजन अर्चन किया जाता है। पूजन विधि के दौरान बेल पत्रों के चुनाव के दौरान यह विशेष ध्यान रखा जाता है कि बेल पत्रों पर चक्र और बज्र ना हों। वक्र दर असल कीटों के लगने की वजह से पत्तियों की सतह पर बने धब्बे होते हैं और बज्र पत्तियों की डंठल पर सूजी हुई संरचनाएं होती हैं। ऐसी पत्तियों को निकालकर अलग रख दिया जाता है।

 बगैर कटी-फटी बेल पत्तियों की शिवजी के त्रिनेत्र से तुलना की जाती है। आदिवासी बेल पत्रों के तोड़ने से पहले यह तय कर लेते हैं कि उस बेल पेड़ पर फल लग चुके हों। जिन पेड़ों पर अब तक फल नहीं लगते हैं उन पेड़ों की पत्तियों को तोड़ना वर्जित माना जाता है।

आदिवासी संप्रदाय के बुजुर्गों के अनुसार ऐसा प्रकृति संरक्षण को ध्यान में रखकर किया जाता है। पूजन प्रक्रिया संपन्न होने के बाद पूजन स्थल पर ही शिवलिंगों का विसर्जन करा दिया जाता है। पूजन सामाग्री को गाँव के किनारे एक बड़ा गड्डा करके अंदर दबा दिया जाता है। शिवजी की पूजा अर्चना में आक, धतूरा, बेलपत्र, अर्जुन, अशोक, चन्दन, पीपल, शिवलिंगी जैसी वनस्पतियों को अर्पित किया जाता है और बाद में इन वनस्पतियों को पूजास्थल से उठाकर किसी छांव वाली जगह पर रखकर सुखाया जाता है।

इनके सूखने के बाद इनका चूर्ण तैयार कर विभिन्न प्रकार के रोग निवारणों के लिए हर्बल नुस्खे तैयार किए जाते हैं। खास बात ये भी है कि जिन वनस्पतियों का उपयोग इस पूजन विधि में किया जाता है वे सारी वनस्पतियों का इस्तेमाल सावन और शीतकाल के दौरान होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं के निवारण के लिए किया जाता है। वनवासियों द्वारा प्रकृति के संसाधनों का सहजता से इस्तेमाल कर तमाम तरह से इस्तेमाल करने की सीख काफी प्रेरणादायी होती है।

(लेखक हर्बल विषयों के जानकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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