भारत गाँवों के विकास केे लिए अमेरिका के अनुभव से सीख ले सकता है

भारत गाँवों के विकास केे लिए अमेरिका के अनुभव से सीख ले सकता हैयह एक अजीब बात है जिस देश की करीब सत्तर फीसदी आबादी गाँव में बसती हो उस देश का भविष्य शहरी लोग तय करते हैं।

शिकागो। यह एक अजीब बात है जिस देश की करीब सत्तर फीसदी आबादी गाँव में बसती हो उस देश का भविष्य शहरी लोग तय करते हैं। यह तो पूंछ को गाय से चलाने वाली बात हुई। एक शहरी होने के नाते यह बात मुझे भी चुभती है, विशेषता इसलिए की लोकशाही में जहां निर्णय बहुमत से लिया जाना चाहिए वहीं निजाम कुछ उलटा ही चल रहा है।

यह लेख लिखने से पहले 2011 की भारत की जनगणना के आंकड़े पढ़े। उसके मुताबिक भारत की 121 करोड़ जनसंख्या में से 83 करोड़ से ज्यादा लोग, मतलब 68.84 फीसदी , 640,867 गाँव में बसते हैं जबकि 37 करोड़ के आसपास भारतीय, मतलब 31.16 फीसदी, 7,935 शहरों में बसते हैं।

इन आंकड़ों से इतना तो साफ है कि भारत की ग्राम्य आबादी की देश की नीतियों पर ज्यादा राजनीति और सांस्कृतिक पकड़ होनी चाहिये। लेकिन हकीकत कुछ और ही है। मेरा कहने का तत्पर्य यह बिल्कुल नहीं है कि आज के युग में हम इस तरह की ग्राम्य नीतियों को चलाएं, जिससे गाँव के लोगों का पिछड़ापन बना रहे। बल्कि ग्रामीण जनता खुद को अपनी सोच के धागे से यूं बदले कि देश के नेता और केंद्र और राज्य सरकारों को भी नई तरह से सोचने पर मजबूर कर दे।

चूंकि मैं अमरीका में स्थित हूं, मुझे यहां के गाँव की परिभाषा को भी देखने और समझने का अवसर मिलता रहता है। सुन्दर सड़के, साफ पानी, बिजली और रोजमर्रा के साधन जो शायद भारत के कई शहरों में न हों वैसे यहां के गाँव में पाए जाते हैं। वह इसलिए कि अमेरिका ने यह बहुत पहले से अपनी नीतियों में विश्वास था कि जहां से इन सहूलियतों की बात आती हो वहां शहर और गाँव में कोई भेद न हो।

मेरी आशा यही है कि गाँव कनेक्शन के जरिए लोगों में ऐसी कुछ जुम्बिश उजागार हो कि आप भी भारत में जो इतने सालों से शहरी और ग्रामीण जीवन के बीच जो अंतर पड़ गया है, उसको कम कर पाएं।

मैंने देश की जनसंख्या की इसलिए बात की कि जिससे राजनीतिक शक्ति का एक परिणाम मिले। इन आंकड़ों में वह ताकत है जिससे ग्राम्य स्वर्ग, जिसकी कल्पना गांधी जी ने की थी, ला सक ते है। ग्राम्य स्वराज के मायने यह नहीं कि शहरों के खि़लाफ कोई अभियान छेड़ा जाए, बल्कि यह है कि गाँव और शहर के बीच एक अच्छी प्रतिस्पर्धा हो तेज विकास के लिए अच्छा स्वायत्ता के लिए, उंदा शिक्षा के लिए और नए उद्योगों के लिए।

तकनीक के आधुनिकीकरण से गाँव और बाहर की दुनिया के बीच जो एक बड़ी गहरी और चौड़ी खाईं थी। वह अब मिट चुकी है। आप चाहें तो अपना भविष्य अपने हाथ में ले सकते हैं और मेरे जैसे शहरी बाबू को यह दिखा सकते हैं कि असल में पूंछ से गाय चलती है न कि गाय से पूंछ।

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