गरीब, किसान, टोकनवाद और राष्ट्रवाद

गरीब, किसान, टोकनवाद और राष्ट्रवादकिसान 

डा‍ॅ. रहीस सिंह

पिछले दिनों एक पुस्तक पढ़ने के दौरान विकास के तीन रूपों की चर्चा मिली। इन तीनों रूपों के दो रूपों से तो सभी वाकिफ होंगे, लेकिन एक अन्य रूप भी है, जिससे सभी परिचित भले ही न हों परन्तु उसकी प्रासंगिकता अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में कुछ ज्यादा ही दिखायी देती है। विकास के पहले दो रूपों का प्रतिनिधित्व समाजवाद व पूंजीवाद जैसे आयाम करते हैं जबकि तीसरे का सम्बंध ‘टोकनवाद’ से है। एक सामान्य अभिव्यक्ति के अनुसार जब नेताओं के पास वज़नदार आर्थिक और राजनैतिक नीतियों की बजाय सिर्फ प्रभावपूर्ण भाषण और अलंकृत भाषा बचे तो वह टोकनवाद होता है।

पुस्तक के अनुसार यह टोकनवाद तब उपजता है जब नेतृत्व अक्षम और अयोग्य होता है लेकिन वह अपनी इस अयोग्यता और अक्षमता को छुपाने के लिए कई प्रकार के छद्म उपायों का सहारा लेता है जिससे समाज का सम्पूर्ण तंत्र असफलता का शिकार होता है। इसी असफलता से समाज जनित हिंसा उत्पन्न होती है। इस व्यवस्था से परिचित होने के बाद एक सवाल मन में अवश्य आया कि क्या ऐसी अभिव्यक्तियां और निष्कर्ष आज की व्यवस्था और सामाजिक सोच में भी मौजूद हैं? क्या हम कुछ समय के लिए ही सही, पर इस बात पर विचार कर सकते हैं कि एक देश के अंदर जो किसान कर्ज न अदा कर पाने के कारण आत्महत्या करते हैं, वे वास्तव में उस हिंसा के शिकार हुए हैं जो समाज और राज्य जनित है अर्थात सरकार और समाज की संवेदनहीनता से उपजी हिंसा के शिकार हुए हैं? क्या गरीबी और भुखमरी का अभिशाप झेल रही भारत की लगभग एक-चौथाई आबादी इसी प्रकार की हिंसा से व्यथित नहीं है?

इस पुस्तक में एक उदाहरण के माध्यम से यह बताया गया है कि ड्राइवर, जो कई वर्षों से एक बेटे की चाहत रखता था, का बेटा किस तरह से मौलिक आवश्यकताओं के पूरा होने से एक सामान्य बीमारी का शिकार हुआ और उचित चिकित्सकीय सुविधाओं के अभाव व नकली दवाइयों के प्रयोग से उसकी मृत्यु हो गयी। ऐसी ही मिन्नतों के बाद इस देश के वे किसान भी किसी किसान के घर में उनके भविष्य के रूप में जन्म लेते हैं जिनमें से कुछ कीटनाशक दवाई खाकर या पेड़ से लटकर अथवा किसी अन्य उपायों को अपना अपनी जान दे देते हैं। लुधियाना का किसान जसवंत सिंह और उसका पांच साल का बेटा भी सम्भवतः ऐसी ही मिन्नतों और ख्वाहिशों के साथ इस दुनिया में आया होगा जिसने 5 अक्टूबर 2016 को अपने पांच साल के बेटे को अपने सीने से लगातार नहर में कूदकर खुदकुशी कर ली।

भारत के उन परिवारों में वे किसान किसी न किसी के बेटे के रूप में पैदा हुए होंगे, जिन्होंने हालातों से लड़ते-लड़ते स्वयं को मार दिया, जिनकी संख्या नेशनल क्राइम ब्यूरो के रिकार्ड के हिसाब से 1995 से 2014 के बीच तीन लाख से अधिक है। मेरा प्रश्न यह है कि क्या इनका राष्ट्र के निर्माण, राष्ट्र के पोषण, राष्ट्र की स्थिरता, अखण्डता और सुरक्षा में कोई योगदान नहीं है? क्या भारतीय राष्ट्रवाद में ये कहीं पर भी फिट नहीं बैठते कि राष्ट्र की नाडि़यां इनकी मौतों पर भी स्पंदित हों? यदि ऐसा है तो भारत के राष्ट्रवादी जय जवान-जय किसान, के इस दूसरे घटक के प्रति कभी कुपित क्यों नहीं होते, कभी उनमें आक्रोश पैदा क्यों नहीं होता, वे कभी उतनी कश्मकश में क्यों नहीं दिखते जितने कि किसी संस्था, किसी पद या किसी व्यक्ति विशेष से जुड़े सवालों से होते हैं? हमारी सम्पूर्ण बौद्धिकता, संवेदनशीलता और आक्रामकता यहां पर आकार निर्वीयता का शिकार क्यों हो जाती है? इसलिए गरीब मजदूर और किसान उनके लिए सिर्फ आंकड़ा भर हैं जो कुछ रिपोर्टों, कुछ पुस्तकों या फिर कुछ छोटी-मोटी डिबेट्स का हिस्सा बनने के लिए होते हैं जिसे नेशनल मीडिया अपने पृष्ठों या बाइट्स में जगह देने लायक भी नहीं समझती?

एक बार स्टालिन ने कहा था, ‘किसी एक की मौत एक दुखद घटना है और अनगिनत मौतें सिर्फ आंकड़े।’’ यानि ड्राइवर के बेटे की मौत से लेकर लाखों किसानों, हजारों गरीबों और कुपोषण के शिकार लोगों, मातृत्व सुविधाओं से वंचित मरती हुयी माताओं एवं शिशुओं....आदि की मौत, सिर्फ एक आंकड़ा अथवा संख्या है जो तीसरी दुनिया के देशों में एक अध्ययन सामग्री और वोट पॉलिटिक्स के काम आती है। यदि ऐसा न होता तो शायद स्थितियां अब तक बदल गयी होतीं। हम वास्तविक परिणामों की बजाय आ‍ंकड़ांे के अर्थशास्त्र के जरिए बड़ी बेशर्मी से अनापेक्षित व अमर्यादित परिणाम पेश कर अपने शासन तंत्र की सेहत दुरुस्त बताने की युक्ति में पारंगता प्रदर्शित कर अपनी पीठ ठोंकते रहे। उदाहरण के तौर पर तेंदुुलकर समिति के सिफारिशों के आधार पर योजना आयोग ने दावा किया था कि 2004-05 और 2011-12 के बीच सात वर्षों में गरीबी 37.2 प्रतिशत अंकों से गिरकर 21.9 पर आ गई है।

खास बात यह है कि इस समिति द्वारा अपनाए गये प्रतिमानों में शहरी इलाके में 1000 रुपए प्रति व्यक्ति प्रतिमाह और ग्रामीण क्षेत्र में 818 रुपए प्रति व्यक्ति प्रति माह की आय गरीबी रेखा पर आती है। इसमें इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की कि व्यक्ति को अपनी कैलोरी जरूरतें पूरी करने के लिए कितना खर्च करने की जरूरत है, जो शहरी इलाके में 2100 कैलोरी और ग्रामीण इलाके में 2400 कैलोरी थी लेकिन क्या तीन दशकों से ज्यादा समय बाद अब इसे गरीबी के आंकलन का बहुत ही घटिया तरीका नहीं माना जाना चाहिए? क्या यह अफसोस जनक बात नहीं है कि विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे हैं और दिखा रहे हैं, लेकिन आज तक इतना साहस और मेधा नहीं जुटा पाए जो यह तय कर सके कि गरीब कौन है और सही अर्थों में कितने हैं?

यही स्थिति किसानों के विषय में कही जा सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1995 से 2014 के बीच किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा तीन लाख पार कर चुका है। महत्वपूर्ण बात यह है कि पी साईनाथ के अनुसार वर्ष 2014 के आंकड़े सुनिश्चित करते समय राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा किसानों की आत्महत्या की गिनती का तरीका ही बदल दिया गया जिससे इनकी संख्या कम की जा सके। यही वजह है कि वर्ष आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या वर्ष 2013 में 11,772 थी लेकिन 2014 में 5,660 रह गयी। दरअसल एनसीआरबी ने किसानों की आत्महत्या के ज्यादातर मामलों को अन्य वर्ग यानि कृषि मजदूर की आत्महत्या में परिवर्तित कर दिया। परिणाम यह हुआ कि किसानों की आत्महत्या के मामले घट गये।

वास्तविकता यह है कि वर्ष 2014 में खेती-किसानी के सभी मामलों में आत्महत्या की संख्या 12, 360 है जो 2013 की तुलना में कहीं अधिक थी। सवाल यह उठता है कि आखिर राज्य और उसकी प्रबुद्ध एजेंसियों ऐसा क्यों करती हैं? क्या यह राज्य की मशीनरी की क्षमता और योग्यता का परिणाम है अथवा अक्षमता क्या? क्या वास्तव यह संवेदनहीनता एक प्रकार की हिंसा नहीं है? इस हिंसा का दूसरा छोर कहां है? क्या इस दूसरे छोर की तलाश कभी हो पाएगी? या ये टोकनवादी व्यवस्था से निर्मित गहरी खाइयों में ऐसे ही दफन होते रहेंगे?

(लेखक राजनैतिक व आर्थिक विषयों के जानकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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