अखिलेश अपनी छवि से आशान्वित

अखिलेश अपनी छवि से आशान्वितअखिलेश यादव, मुख्यमंत्री

लेखक- विवेक त्रिपाठी

मुलायम सिंह भले कह रहे हों कि परिवार एक है लेकिन हाल में हुए कुछ घटनाक्रमों ने यह सिद्ध कर दिया कि परिवार में बहुत कुछ खराब हो रहा है। परिवार और पार्टी में आपसी मतभेद गहरी जड़ जमा चुके हैं और इन्हीं दरारों के साथ पार्टी को चुनाव में उतरना होगा। इन सबको देखते हुए अखिलेश यादव अपनी छवि के प्रति अश्वस्त है। वह पहले भी कह चुके हैं विकास के मुद्दे पर ही चुनाव लड़ेंगे, उन्हें आज भी लगता है कि लोगों का समर्थन उन्हें मिलेगा।

2012 का विधानसभा चुनाव, समाजवादी पार्टी ने अखिलेश के चेहरे पर ही लड़ा था, तभी इतना बड़ा बहुमत हासिल हुआ था। पार्टी में एक धड़ा चाहता था कि मुलायम स्वयं मुख्यमंत्री बनें, इसके बावजूद मुलायम ने बेटे अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। फिर भी आधे कुनबे और वरिष्ठ सपा नेताओं के मन में अखिलेश अभी भी बच्चे ही रहे। एक नहीं ऐसे कई मौके आए जब अखिलेश को कमरे के भीतर ही नहीं खुले मंच से भी यह अहसास कराया गया कि वो अभी बच्चे हैं। इस आधे कुनबे की अगुवाई जरूर शिवपाल ने वर्षों तक की, लेकिन उन्होंने अखिलेश पर दबाव बनाने के लिए हमेशा मुलायम का ही सहारा लिया। कई मौकों पर मुलायम ने खुले मंच से बेटे को डांटा, फटकारा। अखिलेश उनके पुत्र मात्र नहीं एक संवैधानिक पद में भी है, इसका ख्याल मुलायम जैसे अनुभवी व्यक्तियों ध्यान रखना चाहिए।

मुलायम साढ़े चार साल में सबसे ज्यादा अपने बेटे की सरकार पर उंगली उठाकर विरोधियों को मुद्दा देते रहे हैं।

23 मार्च 2013 को लखनऊ में डॉ. राम मनोहर लोहिया की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में मुलायम ने यहां तक कह दिया कि अखिलेश चमचों से घिरे हैं। मुलायम बार-बार कहते रहे कि मंत्री भ्रष्ट हैं, लूट मचा रहे हैं जबकि मुख्यमंत्री व्यस्त रहते हैं। मुझसे कुछ नहीं छिपा है। फिर चार मार्च, 2014 को एक समारोह के दौरान नेता जी ने कहा कि मुख्यमंत्री जी सुनिए अपनी सरकार के बारे में। चापलूसी से काम हो रहा है, चापलूसी से खुश होने वाले धोखा खा जाते हैं। पांच अगस्त, 2015 कहा कि वह तो बहुत व्यस्त मुख्यमंत्री हैं। लोग इनकी शिकायत करते हैं, इनके पास समय नहीं होता।

15 अगस्त, 2015 मुख्यमंत्री जी आप लोगों से मिलते क्यों नहीं हैं? आप जनता से नहीं मिलेंगे, तो जनता आप से दूर हो जाएगी।

आठ फरवरी, 2016 को उनके पिता बहुत बड़ा बयान दिया कि आपके सारे मंत्री लूट मचाए हैं। मुख्यमंत्री छोटे-छोटे कार्यक्रमों में व्यस्त रहते हैं। जब भी मैं पूछता हूं, कहां हो, तो कहते हैं लखनऊ में एक कार्यक्रम में हूं।

साढ़े चार वर्षों में जब-जब मुलायम अखिलेश पर नाराज हुए तो अखिलेश एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह सिर झुकाए उनकी बात सुनते रहे। मुलायम सार्वजनिक कार्यक्रमों में अखिलेश को खरी-खोटी सुनाते और मुख्यमंत्री यह कह कर आगे बढ़ जाते कि वह सिर्फ पार्टी अध्यक्ष ही नहीं मेरे पिता भी हैं, इसलिए डांटना तो उनका अधिकार है। उन्होंने कभी मुलायम की डांट का सार्वजनिक मंच से उत्तर नहीं दिया है।

साढ़े चार साल की राजनीति में वह भले ही अपनी चाचाओं वाली राजनीति की तरह कामयाब न हुए हों लेकिन वर्तमान में हुई विकासपरक राजनीति ने उत्तर प्रदेश के कई वर्गों में उनकी छवि बेहद अच्छी बना दी है। यही नहीं उन्हें इन वर्गों की सहानुभूति भी मिल रही है।

जानकारों का कहना है कि पिछले साढ़े चार साल में राज्य में कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक शांति तो गड़बड़ी का शिकार रही है लेकिन अन्य मोर्चों पर अखिलेश यादव सरकार का रिकॉर्ड अच्छा रहा है और विकास कार्यों का लाभ अल्पसंख्यकों और बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाकों तक पहुंच सका है जिसके कारण जनता के बीच उनकी छवि काफी अच्छी है। समाजवादी पार्टी में टूट की स्थिति में अखिलेश यादव को इसी छवि का सहारा है। इसके अलावा अल्पसंख्यक समुदाय के एक हिस्से का वोट भी उनकी तरफ खिंचकर आने की संभावना है।

मुलायम जाने अनजाने बहुत सारी गलतियां कर बैठे हैं। उन्हें 2012 के सत्ता मोह के लिए पुत्र मोह त्यागना चाहिए था। जब सत्ता बेटे के रास्ते से आयी है तो उन्हें खुले मन से काम करने की छूट देनी चाहिए जिससे वह पार्टी का कद बड़ाकर सकते थे लेकिन वह अपने भाइयों के दबाव में यह नहीं कर सके। इससे अखिलेश पर निरंतर दबाव बनता रहा। उन्हें अपने फैसले लेने में बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा। मुलायम परिवारवाद का कितने बड़े शिकार हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है। उन्होंने महत्वपूर्ण पदों पर हमेशा अपने कुनबे के लोगों को तरजीह दी।

वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों के लिए अखिलेश ने काफी पहले से तैयारी शुरू कर दी थी। इसके लिए उन्होंने छह महीनों में दस हजार किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा की और 800 रैलियों को संबोधित किया। उनके प्रोफेशनल नजरिये के चलते सपा ने चुनावों में ज्यादातर प्रोफेशनली क्वालिफाइड लोगों को टिकट दिया ताकि, पार्टी की पहले वाली इमेज को बदला जा सके। इसी का नतीजा था कि सपा पूर्ण बहुमत के साथ प्रदेश में सत्ता में वापस आई।

वर्तमान के हालात देखे जाएं तो परिवार की लड़ाई जिस प्रकार सड़कों पर आ गई उसमें भी अखिलेश की बड़ी सशक्त छवि बाहर आई है। युवाओं का रुख भी उन्हीं की ओर है। पुरानी राजनीति और नई राजनीति की एक लड़ाई चल रही है जिसमें समय अनुसार जो मांग है जीत उसी की होगी।

मुलयाम को भी समझना होगा कि जिस चेहरे की बदौलत उन्हें सत्ता हासिल हुई उसे ही आगे रखना चाहिए। अखिलेश को ही चुनाव रणनीति बनाने की पूरी छूट दी जानी चाहिए क्योंकि सरकार उन्होंने चलाई जनता के बीच में जवाब उन्हें देना है। शिवपाल तो उनके महज सहयोगी रहे हैं। कोई ऐसा फॉर्मुला निकाले जिससे सारे अधिकार तो अखिलेश को ही मिलें वरना पार्टी की हालत बहुत ज्यादा खराब होगी। उसकी वजह भी पार्टी के वरिष्ठ लोग माने जाएंगे। अखिलेश की युवा टीम उनके नेतृत्व क्षमता को पहचान रही है इसलिए सत्ता तक पहुंचाने में अखिलेश कारगर हो सकते हैं। खैर, जो होगा वो आने वाले चंद दिनों में सामने आ जाएगा, लेकिन इस फजीहत ने चुनाव से पहले प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरणों का संकेत कर रहे हैं।

अब तक जो सरकार चली उसका फैसला मतदाता को करना है। अन्तर यह होगा कि पार्टी एक जुट रहेगी तो फायदा होगा। अगर सरकार और संगठन एक दूसरे पर तंज करते दिखाई दिए तो ऐसी स्थित में अखिलेश हो या मुलायम शिवपाल किसी को भी फायदा नहीं होगा क्योंकि तमाम प्रयासों और विकास को प्रमुख मुद्दा बनाने के बावजूद अखिलेश अपनी पार्टी की जातिवादी छवि और कानून व्यवस्था के लिए हमेशा घेरे जाते रहे हैं। अब 2012 वाली स्थित नहीं है जिसमें डीपी यादव को रोक कर उन्होंने छवि तोड़ने का प्रयास किया था। 2017 में क्या ऐसी स्थिति है? नेता भले ही अपने गुणा भाग लगाते रहे लेकिन मतदाता समझदार है। अखिलेश को भी अपनी छवि पर विश्वास है। उन्हें लग रहा यदि चुनाव में अकेले जाने की नौबत आयी तो वह बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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