अमेरिका के लिए भारत बना ‘प्रथम’

अमेरिका के लिए भारत बना ‘प्रथम’प्रतीकात्मक तस्वीर।

पीएम नरेन्द्र मोदी की बहुप्रतीक्षित अमेरिकी यात्रा समाप्त हो चुकी है। एक बड़े अमेरिकी अखबार ने मोदी-ट्रंप मुलाकात को ‘अमेरिका फर्स्ट मीट्स इण्डिया फर्स्ट’ नाम दिया, जिसका तात्पर्य यह हुआ कि अमेरिकी मीडिया भी प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा को तरजीह दे रही है। यह न केवल द्विपक्षीय सम्बंधों की दृष्टि से बल्कि नई विश्व व्यवस्था में बदल रहे वैश्विक डिप्लोमैटिक फ्रेमवर्क में भारत बढ़ते कद एवं प्रभाव का संकेत है।

प्रधानमंत्री की 26 जून को सम्पन्न हुई अमेरिकी यात्रा पहले के मुकाबले कुछ भिन्न दिखी इसलिए कुछ सवाल अवश्य उठते हैं कि आखिर मेडिसन स्क्वायर जैसा रोमांच इस बार कम क्यों दिखा। भारत एवं अमेरिका अथवा नरेन्द्र मोदी और ट्रंप में जो कॉमन विशेषताएं हैं, वे कहां तक पारस्परिक लाभ में बदलती दिखीं? मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात से पहले अमेरिकी प्रशासन द्वारा जिस तरह के कुछ कदम उठाए गए, उनके निहितार्थ क्या हैं और भारत को उनसे कितना लाभ होगा? क्या प्रधानमंत्री मोदी की इस अमेरिकी यात्रा से भारत की उम्मीदें पूरी हुईं?

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने वक्तव्य में मीडिया के समक्ष दिए गए वक्तव्य में स्वयं स्वीकार किया कि ट्रंप से उनकी बातचीत हर प्रकार से अत्यंत महत्वपूर्ण रही क्योंकि यह परस्पर विश्वास पर आधारित थी, क्योंकि इसके मध्य हमारी नजर हमारे मूल्यों, हमारी प्राथमिकताओं, चिंताओं और रुचियों की समानता पर थी, क्योंकि यह भारत तथा अमेरिका के बीच परस्पर सहयोग व सहभागिता की चरम सीमाओं की उपलब्धि पर केन्द्रित थी, क्योंकि हम दोनों ग्लोबल इंजन ऑफ ग्रोथ हैं, क्योंकि आतंकवाद जैसी वैश्विक चुनौतियों से अपने समाजों की सुरक्षा राष्ट्रपति ट्रंप और मेरी उच्च प्राथमिकताओं में से एक है।

हमारी ऐसी मजबूत स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप है जिसने मानव प्रयासों के लगभग सभी क्षेत्रों को छुआ है। मेरा विश्वास है कि मेरा नए भारत का विज़न तथा राष्ट्रपति ट्रंप का ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के विज़न में निहित कनवर्जेंस हमारे सहयोग के नए आयाम पैदा करेगा। हम न केवल संभावनाओं के सहयोगी हैं बल्कि हम अपने सामने मौजूदा तथा आने वाली चुनौतियों से निपटने में भी सहभागी हैं। आज अपनी मीटिंग में हमने आतंकवाद, अतिवाद और उग्रवाद से पूरे विश्व में उत्पन्न गम्भीर चुनौतियों पर चर्चा की। अंत में प्रधानमंत्री ने प्रमुख रूप से तीन बातें और कहीं।

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पहली-भारत और अमेरिका दोनों ने ही अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और इसकी सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हम अफगानिस्तान में शांति तथा स्थिरता के उद्देश्य की पूर्ति के लिए अमेरिका से क्लोज कंसलटेशन, कम्युनिकेशन एवं कोऑर्डिनेशन बनाए रखेंगे। दूसरी-इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में खुशहाली, शांति और स्थिरता हमारे रणनीतिक सहयोग का मुख्य उद्देश्य है। तीसरी-सुरक्षा चुनौतियों के संदर्भ में हमारा बढ़ता दायरा रक्षा और सुरक्षा सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यदि प्रधानमंत्री की बातों पर गौर किया जाए तो फिर यह मानने में कोई परहेज नहीं होना चाहिए कि मोदी-ट्रंप ने द्विपक्षीय मुद्दों एवं वैश्विक चुनौतियों को लेकर कॉम्प्रीहेंसिव स्तर पर सहमति बनाने की कोशिश की। इस दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में उस साझा बयान को माना जा सकता है जिसमें कहा गया, ‘‘दोनों पक्ष पाकिस्तान से यह कहना चाहते हैं कि वह दूसरे देशों में आतंकी हमलों को अंजाम देने के लिए अपनी सरजमीं का इस्तेमाल नहीं होने दे।

साथ ही 26/11 के मुंबई हमले और पठानकोट हमले के गुनहगारों के खिलाफ कार्रवाई करे।’’ दूसरी उपलब्धि जैश-ए-मुहम्मद एवं लश्करे तैयबा सहित अलकायदा और आईएसआईएस के आतंकी खतरों के खिलाफ सहयोग मजबूत करने के लिए प्रतिबद्धता के रूप में देखी जा सकती है (इसमें दाऊद इब्राहिम और उसके नेटवर्क के जिक्र को भी शामिल किया जा सकता है)।

तीसरी उपलब्धि अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा हिजबुल मुजाहिद्दीन के सरगना सैयद सलाहुद्दीन को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करने सम्बंधी है। चौथी उपलब्धि के रूप में अमेरिका से भारतीय नौसेना को 22 गार्जियन गैर-हथियारबंद ड्रोन विमानों की बिक्री को मंज़ूरी को माना जा सकता है। 2-3 अरब अमेरिकी डॉलर का यह सौदा इस बात का सबूत होगा अमेरिका के लिए भारत ‘बड़ा रक्षा साझीदार’ है।

लेकिन अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हमें ‘राष्ट्र’ एवं ‘लीडरशिप’ को अलग-अलग नजरिए से देखना होगा। कारण है कि राष्ट्र के उद्देश्य एवं नीतिगत विशेषताएं दीर्घकालिक होती हैं जबकि नेतृत्व की कम समय में ज्यादा से ज्यादा प्रतिफल अर्जित करने वाली। यानि हमारी लीडरशिप के जो उद्देश्य थे उन्हें हासिल करने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कमोबेश सफल रहे।

लेकिन राष्ट्र के उद्देश्यों पर तत्काल निष्कर्ष निकालना युक्ति-युक्त नहीं लगता। ट्रंप-मोदी मीटिंग से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्वागत ‘सच्चा दोस्त’ कहते हुए किया। लेकिन प्रोटोकॉल और कूटनीतिक परम्परा से भिन्न प्रधानमंत्री मोदी भारतीयों की ओर से उस तरह के अतिरंजित स्नेही शब्द नहीं दे पाए जैसे कभी डॉ. मनमोहन सिंह ने दिए थे। शायद ‘भावनात्मक नीति’ की इस समय जरूरत नहीं थी क्योंकि ट्रंप इस संवेदनशील विषय से काफी दूर हैं।

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दूसरी बात यह कि प्रधानमंत्री पहली व्हाइट हाउस 10 वर्ष के वीजा बैन के बाद हुई थी। इसलिए उन्होंने कुछ अमेरिकी अधिकारियों की मौजूदगी में मेडिसन स्क्वायर गार्डन में अपनी ताकत प्रदर्शित की थी। उस समय विश्व मंच पर उनका अधिकारिक परिचय रॉक कन्सर्ट के रूप में कराया गया था। लेकिन इस बार आप्रवासियों, वीजा एवं नौकरियों को लेकर ट्रंप के नकारात्मक सेंटीमेंट्स को देखते हुए शोमैनशिप के लिए कोई स्पेस नहीं था।

बल्कि इस मुलाकात में प्रधानमंत्री का मुख्य उद्देश्य एक विचलित राष्ट्रपति को भारत की ओर आकर्षित करना था। सम्भवतः इस उद्देश्य में प्रधानमंत्री मोदी पूरी तरह से सफल रहे हैं। लेकिन देश की जरूरतें इससे थोड़ी भिन्न हैं।

ट्रंप इकोनामिक संरक्षणवाद को लेकर चल रहे हैं और उनकी एच-1बी वीजा एवं इमीग्रेशन पॉलिसी भारतीय कौशल के लिए उपलब्ध अवसरों को बेहद कमजोर कर रही है। इस मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन ने कोई भी आश्वासन नहीं दिया है। ट्रंप की विदेश नीति और वैचारिक पक्ष को दुनिया अब तक मान्यता नहीं दे पा रही है। दुनिया आज जिस नई विश्व का साक्षात्कार कर रही है, वहां चीन नई साम्राज्यवादी-उपनिवेशवादी महत्वाकांक्षाओं को लेकर आगे बढ़ रहा है और रूस को पुतिन सोवियत युग में ले जाने लिए ग्रेट गेम्स को बढ़ावा दे रहे हैं।

इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए चीन आर्थिक संस्थाओं, इन्फ्रा योजनाओं के साथ-साथ रणनीतिक धुरियों का निर्माण भी कर रहा है। रही बात ट्रंप की तो उन्होंने राष्ट्रपति चुने जाने के बाद ‘वन चाइना पॉलिसी’ के विपरीत कदम बढ़ाया और ताइवानी राष्ट्रपति से बात की पर चीन के आंखे तरेरते ही ट्रंप ने यू-टर्न ले लिया।

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यही नहीं चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड’ फोरम में भी अमेरिकी प्रतिनिधि शामिल हुआ जबकि भारत ने उसका बहिष्कार किया था। ट्रंप और उनके सहयोगियों ने विदेश नीति में शुरूआती दौर में बड़े बदलाव सम्बंधी फ्रेमवर्क पेश किया गया था जिसमें बराक ओबामा की ‘एशिया पीवोट’ का स्थान ‘मॉस्को पीवोट’ ले रहा था। लेकिन अब मॉस्को पीवोट नेपथ्य में चला गया प्रतीत होता है।

ट्रंप ने अपने चुनावी अभियान के दौरान पाकिस्तान के प्रति सख्त रुख अपनाने का संकेत दिया था और अभी ऐसा महसूस किया जा रहा है कि वे पाकिस्तान के प्रति सख्त नीति अपनाएंगे लेकिन उनके राष्ट्रपति चुने जाने के बाद पाकिस्तान के प्रेस इन्फर्मेशन ब्यूरो ने जो रीडआउट जारी किए थे उनके अनुसार ट्रंप ने नवाज शरीफ को शानदार पुरुष एवं पाकिस्तान को महान देश बताया था। फिर इस बात की क्या गारण्टी है कि ट्रंप आगे पाकिस्तान पर इसी तरह से अडिग रहे हैं।

फिलहाल प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका को इस बात के लिए आश्वस्त किया है कि वे दोनों देशों की साझी विकास की यात्रा में अमेरिका के ड्राइवेन, डिटरमिन और डिसाइसिव पार्टनर रहेंगे। इसलिए भविष्य में बेहतर साझीदारी की उम्मीद की जा सकती है।

(लेखक राजनीतिक व आर्थिक विषयों के जानकार हैं यह उनके निजी विचार हैं।)

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