ऑडियो-विज़ुअल सशक्त संचार माध्यम है, इसका दुरुपयोग न हो

आजाद भारत में शासक दल का श्रव्यदृश्य पर इतना प्रभाव रहा कि विपक्ष की आवाज न अखबारों में और न रेडियो पर सुनाई देती थी। इन्दिरा गांधी ने तो व्यवस्था की थी कि सम्पादकों के सम्पादकीय भी बाबू लोग सम्पादित करते थे। अब अखबारों की जगह टीवी और मोबाइल का प्रयोग होता है। फेसबुक, ट्विटर, वाट्सऐप, ईमेल, मेसेजिंग द्वारा वोटरों से सीधा सम्पर्क सम्भव है, और उसका दुरुपयोग भी सम्भव है।

ऑडियो-विज़ुअल सशक्त संचार माध्यम है, इसका दुरुपयोग न हो

पिछले माह 27 अक्टूबर को श्रव्यदृश्य यानी ऑडियो विज़ुअल हेरिटेज दिवस मनाया गया। श्रव्यदृश्य एक सशक्त संचार विधा है, जिसका सदुपयोग और दुरुपयोग भी हो सकता है। सत्तर के दशक में एक बार बस्तर जिले के एक आदिवासी गांव में अपने कैंप में रात को आराम कर रहा था तो देखा पहाड़ों पर जगह-जगह अचानक आग जलने लगी और ढोल नगाड़ों की आवाज आने लगी। मैने चौकीदार से पूछा यह क्या हो रहा है, उसने बताया ये लोग पूरे इलाके के लोगों को कोई आपातकालीन मीटिंग के लिए बुला रहे हैं। यही तो था उनका श्रव्यदृश्य जिसमें लपटें देख कर और नगाड़े की आवाज सुनकर सन्देश मिल गया था।

आजकल रेडियो, कैमरा, टीवी, टेलिफोन और मोबाइल आदि अनेक विधाओं का प्रयोग होता है जिनका आविष्कार पश्चिम में हुआ है। कहते हैं वायरलेस का आविष्कार जगदीश चंद्र बोस ने मार्कोनी से पहले कर लिया था, लेकिन इसका श्रेय उन्हें नहीं मिला। भारत में अनेक आविष्कार और खोजें हुईं और सब मानव जाति को समर्पित हैं।


भारतीय प्रायद्वीप में अनेक आविष्कार हुए हैं जैसे पुष्पक विमान, प्लास्टिक सर्जरी, टेलीपैथी, जीव विकास, शून्य और गिनतियों का ज्ञान, नक्षत्र विज्ञान आदि के भौतिक प्रमाण नहीं मिलते परन्तु उन्हें मान्यता मिली है। ऑस्ट्रेलिया की कैनबेरा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ए. एल. वाल्श ने अपनी पुस्तक 'वन्डर देट वाज इंडिया' में लिखा है कि भारत सातवीं शताब्दी में ओद्योगिक क्रान्ति के लिए यूरोप से 800 साल पहले तैयार था, पता नहीं क्यों नहीं आई।

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देश को आधुनिक संचार विधा का लाभ तब मिला जब नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को अंग्रेजों ने उनके घर में नजरबंद कर रक्खा था और वह अंग्रेजों को चकमा देकर देश से बाहर चले गए थे। उन्होंने काबुल जाकर रेडियो पर भारतवासियों को सम्बोधित किया था, जिसने नौजवानों की रगों में चिंगारी का काम किया था। इसके विपरीत जब पटेल के न चाहते हुए भी नेहरू ने रेडियो पर कश्मीर में प्लेबिसाइट का वादा कर दिया था तो आज तक हम उसका खामियाजा भुगत रहे हैं। इसी तरह अपराधियों को पकड़ने में सीसीटीवी का प्रयोग बहुत मदद कर रहा है, लेकिन सोशल मीडिया में झूठी तस्वीरें डालकर समाज को भ्रमित भी किया जा रहा है।

आजाद भारत में शासक दल का श्रव्यदृश्य पर इतना प्रभाव रहा कि विपक्ष की आवाज न अखबारों में और न रेडियो पर सुनाई देती थी। इन्दिरा गांधी ने तो व्यवस्था की थी कि सम्पादकों के सम्पादकीय भी बाबू लोग सम्पादित करते थे। अब अखबारों की जगह टीवी और मोबाइल का प्रयोग होता है। फेसबुक, ट्विटर, वाट्सऐप, ईमेल, मेसेजिंग द्वारा वोटरों से सीधा सम्पर्क सम्भव है, और उसका दुरुपयोग भी सम्भव है।

ऑडियाविज़ुअल का महत्व यहां के लोग समझते थे। जब महाभारत का युद्ध हो रहा था तो दृष्टिबाधित धृतराष्ट्र को युद्ध का पल-पल का आंखों देखा हाल बता रहे थे संजय। पता नहीं संजय के पास कोई यंत्र था अथवा महाभारत की इस घटना को साइंटिफ़िक फिक्शन कहा जाएगा। वैसे इतिहासकार महाभारत को इतिहास ही मानते हैं।

टेलीफोन आने के पहले तक चिट्ठी पत्री का बहुत महत्व था और पुराने समय में हलकारा या बाद में पोस्टमैन जब पत्र लाता था तो उसकी आवभगत होती थी। अब टेलीफोन, ईमेल, मोबाइल आदि के आने से डाक तार विभाग की भूमिका सीमित हो गई है। पत्रकारिता के क्षेत्र में टेलीफोन और मोबाइल का बड़ा योगदान रहा है। पहले तो खोजी पत्रकारों द्वारा आवाज को ही रिकार्ड कर लिया जाता था लेकिन बाद में कैमरे और आवाज दोनों को मिलाकर वीडियोग्राफी होने लगी जिसमें चित्र और आवाज दोनों का मिलाजुला प्रमाण तो अकाट्य हो गया।

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सत्तर के दशक में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति निक्सन ने अपने विरोधियों के कार्यालयों और घरों में यंत्र लगवा दिये थे, जिससे उनकी सारी गतिविधियों की जासूसी करवाई थी। बाद में उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा था। अस्सी के दशक में भारत में टीवी ने सचमुच तहलका मचा दिया और जब तेजपाल के पत्रकारों ने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मन को रिश्वत लेते हुए कैमरे में कैद किया तो तहलका की धाक जम गई। अब तेजपाल स्वयं दूसरे कारणों से जेल में हैं। वीडियोग्राफी का प्रयोग पत्रकारिता में ही नहीं इसका भरपूर प्रयोग होता है स्कूल कॉलेजों में छात्रों को पढ़ाने के लिए और परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए।

श्रव्यदृश्य की विधाएं एक माचिस की तरह हैं, चाहो तो गैस चूल्हा जलाओ, चाहे यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित करो या फिर चाहो तो किसी का घर फूंक दो। ऑडियो-विज़ुअल विधाओं का प्रयोग विवेकपूर्वक संयम से होना चाहिए अन्यथा इसकी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगने लगेंगे।


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