आंगन तो शहरों से गुम हो चुके हैं 

Deepak AcharyaDeepak Acharya   4 March 2017 1:22 PM GMT

आंगन तो शहरों से गुम हो चुके हैं बीते दिनों मेरी मुलाकात रामजी भाई पटेल से हुई, सौराष्ट्र (गुजरात) के गोंडल में रहने वाले इन बुजुर्ग की उम्र तकरीबन 85 साल है।

बीते दिनों मेरी मुलाकात रामजी भाई पटेल से हुई, सौराष्ट्र (गुजरात) के गोंडल में रहने वाले इन बुजुर्ग की उम्र तकरीबन 85 साल है। किसी पत्रिका में मेरे बारे में छपे एक इंटरव्यू को पढ़ने के बाद रामजी भाई ने मुझसे मिलने का मन बनाया। गोंडल से बस पकड़कर वो सीधे अहमदाबाद स्थित मेरे ऑफिस आ पहुंचे। रामजी से मुलाकात से पहले तक मुझे उनकी उम्र का अंदाजा नहीं था। मेरी मुलाकात हुई और बातों ही बातों में उन्होंने मुझसे अपनी उम्र का खुलासा किया। मेरे होश उड़ चुके थे, 85 की उम्र में कोई बुजुर्ग बस पकड़कर करीब 250 किमी की यात्रा करके मुझसे मिलने आया और उन्हें 3 घंटे बाद वापस गोंडल जाना था। इनकी दुरुस्त सेहत देखकर मेरे मन में एक ही ख्याल आ रहा था ‘ये पुराने घी का कमाल है’।

पूछे जाने पर उन्होंने बड़ी सहजता से अपनी तगड़ी सेहत की वजहों के बारे में बताना शुरू किया। रामजी रोज सुबह 5 बजे सो कर उठते हैं, नित्यक्रियाओं के बाद वे अपने घर के आंगन में खुले आसमान के नीचे कुर्सी लगाकर बैठ जाते हैं। कभी घर के आंगन में लगे पेड़-पौधों को पानी देते हैं तो कभी यहीं साफ-सफ़ाई में भी लग जाते हैं। मिट्टी और धूल में हाथ सानकर पौधों के आसपास की सफाई करते हैं। रामजी कहते हैं कि सुबह 5 बजे से लेकर 7:30 बजे तक घर के अंदर नहीं जाते हैं। इनका मानना है कि सूर्य ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है और सूर्य की रौशनी या धूप में जो व्यक्ति प्रतिदिन 2 घंटे खुद को रखेगा, 90% से ज्यादा रोग उसके इर्द-गिर्द भी भटकेंगे नहीं।

रामजी के खानपान में पानी की भी अहम भूमिका है। इनका मानना है कि प्रतिदिन कम से कम 6 लीटर पानी पीना और मेहनत करके शरीर में पसीना लाना बहुत जरूरी है। रामजी कहते हैं कि दिन में कम से कम से एक बार शरीर के हर हिस्से से पसीना छूट जाए तो मान लीजिए कि आप स्वस्थ हैं और ये पसीना शारीरिक मेहनत से निकलना चाहिए। रामजी मीठा खाने के शौकीन हैं और घर में ही गुड़ से तैयार तिलपट्टी, राजगीरा के लड्डू और दूध गुड़ के साथ पकाया हुआ दलिया इन्हें बेहद पसंद है। एक बुजुर्ग से विटामिन डी के गुणों, बिटामिन बी की जरूरतों के बारे में सुनना मुझे बेहद अच्छा लग रहा था। आज अहमदाबाद जैसे शहरों में हर दूसरा व्यक्ति विटामिन डी और विटामिन बी की कमी से जूझ रहा है। ऊंची-ऊंची इमारतों के जंगलों में रहने वाले हम शहरी लोगों को घर के कमरों के भीतर सूर्य की रौशनी तक नसीब नहीं होती। आंगन तो शहरों से गुम हो चुके हैं और कैक्टस और चाइनीज बैम्बू ने आंगन वाले गार्डन को गमलों में कैद कर लिया है।

बच्चों को मिट्टी से दूर रखा जाता है, मानो सारी बीमारी मिट्टी से होकर घर तक आनी है जबकि मिट्टी में सूक्ष्मजीव एक्टिनोमायसिटीस भी होते हैं जो प्रकृति की देन हैं, नेचुरल एंटीबॉयोटिक्स हैं। मैं आज भी चोट लगने पर सबसे पहले मिट्टी उठाकर चोट पर लगा देता हूं। मिट्टी में एक्टिनोमायसिटीस होने की बात भले ही आधुनिक विज्ञान ने सिखाया है लेकिन मेरे नानाजी से 30 साल पहले ही मुझे बताया था कि हमारी मिट्टी की ताकत इतनी है कि घाव तक सुखा देती है, भले ही इसकी वजह उन्हें ना पता हो। बुजुर्गों के पास ज्ञान की असली पोटली है, हमें इनके साथ बैठना होगा, सुनना होगा और इन्हें समझना होगा। व्हाट्सएेप और फेसबुक पर भरोसा करके वो सीख नहीं मिलेगी जो रामजी जैसे किसी बुजुर्ग से चर्चा करने पर मिले। बच्चों की परिक्षाओं का मौसम आ चुका है और इसके बाद उनकी गर्मियों की छुट्टियां लगेंगी। छुट्टियों में बच्चों को अपने ही परिवार के सबसे ज्यादा बुजुर्ग व्यक्ति के साथ वक्त बिताने का मौका दें। क्या पता कोई बच्चा उन बुजुर्ग की सीख से एक अलग सोच का इंसान बन जाए। पारिवारिक मूल्यों और स्वस्थ जीवन के असली मंत्रों की माला हमारे बुजुर्गों के पास ही है।

(लेखक हर्बल वैज्ञानिक हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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