संवाद

इनकार की मुद्रा में देश

एक राष्ट्र के तौर पर हम इनकार की मुद्रा में हैं। हम यह इनकार नहीं कर पा रहे हैं कि विविधता के बावजूद हम जातिवादी, नस्लवादी और नारी विरोधी समाज हैं। भारतीयता की नई परिभाषा हिंदू होने में सिमटती जा रही है और इसमें कोई भी अलग दिखने वाला, अलग राय रखने वाला या अलग व्यवहार करने वाले की कोई जगह नहीं है। हर बार ऐसी घटनाएं होती हैं जो हमारा यह कुरूप चेहरा सामने लाती हैं। इसके बावजूद हम खुद को अहिंसक और सहिष्णु सिर्फ इस नाते कहते हैं कि हमारे यहां गांधी और बुद्ध पैदा हुए थे। अब कोई यह मानने को तैयार नहीं है। अफ्रीकी देशों के लोग तो बिल्कुल यह मानने को तैयार नहीं हैं। क्योंकि उन्हें हर बार इस तरह से निशाने पर लिया जाता है जिस पर कोई भी सभ्य समाज शर्म करेगा।

हाल ही में जो ग्रेटर नोएडा में हुआ, वह नया नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी घटनाएं देश के दूसरे शहरों में भी हुई हैं। इस बार एक भारतीय छात्र की मौत अधिक ड्रग्स लेने से हुई। इसके लिए पड़ोस में रह रहे कुछ नाइजिरियाई लोगों को जिम्मेदार ठहराया गया। इनमें से पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। इसके बाद काम करने और पढ़ाई करने आने वाले अफ्रीकी लोगों पर हमले हुए। एक माल में 600 से अधिक लोगों की भीड़ ने कई अफ्रीकी लोगों पर हमला कर दिया।

भारतीय शासन तंत्र की इस मामले के प्रति अनदेखी ने 43 अफ्रीकी देशों के भारत में स्थिति दूतावासों को साझा बयान जारी करने पर बाध्य किया। इन देशों ने हमलों को नस्ली करार दिया और यह कहा कि भारतीय प्रशासन ने सही ढंग से इन घटनाओं की निंदा नहीं की। यह एक गंभीर आरोप है। इसे सरकार ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ और ‘आपराधिक घटना’ कहकर इससे पल्ला नहीं झाड़ सकती। न ही इससे इनकार कर सकती है कि अफ्रीकी लोगों पर अक्सर होने वाले इस तरह के हमले नस्लभेदी मानसिकता दिखाती है।

यह मानसिकता का मसला है। इसका शिकार पूर्वोत्तर भारत के लोगों को भी होना पड़ता है। उनसे तरह-तरह से भेदभाव होते हैं। इसकी एकमात्र वजह यह है कि वे बहुसंख्यक के मुकाबले अलग दिखते हैं और अलग ढंग से व्यवहार करते हैं। अफ्रीकी लोगों के लिए समस्या और गहरी है। न सिर्फ वे सामान्य भारतीयों से अलग दिखते हैं बल्कि उनका रंग भी ऐसा है जिसे भारत में बहुत लानत-मलामत का सामना ऐतिहासिक तौर पर करना पड़ा है। पूर्वोत्तर के लोगों की तरह ही अफ्रीकी लोगों को भी खास स्थानों पर आपस में सिमटकर रहने को बाध्य कर दिया गया है। ताकि वे हिंसा की स्थिति में एक होकर इसका सामना कर सकें। भारत में आम धारणा यह है कि अफ्रीका एक देश है न कि महाद्वीप, जिसमें अलग-अलग संस्कृति वाले 54 देश हैं।

पूर्वोत्तर के लोगों पर होने वाले हिंसक हमलों पर लाॅरेंस लियांग और गोलक नालक ने 2014 के एक लेख में ‘फ्रंट पेज नस्लभेद’ और ‘फुट नोट नस्लभेद’ की अवधारणा सामने रखी थी। ग्रेटर नोएडा में जो हुआ, उसे वे फ्रंट पेज नस्लभेद का उदाहरण मानते हैं। क्योंकि इसकी खबर अखबारों में पहले पन्ने पर प्रकाशित होती है। लेकिन उनकी चिंता दूसरे श्रेणी की हिंसा के प्रति अधिक है। इससे उनका तात्पर्य लोगों के व्यवहार से है। कैसे लोग आपको देखते हैं। लोग कैसे आपसे बचना चाहते हैं। आपके बारे में लोग क्या बात करते हैं।

आपके बारे में क्या पूर्वाग्रह हैं जिनके आधार पर आपको सेवाएं देने से इनकार किया जाता है। इन चीजों का सामना पूर्वोत्तर के लोग और अफ्रीकी देशों के लोग अक्सर करते हैं। इस वजह से उन्हें रोजमर्रा की चीजों में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। थंगखनाल नगाहिटे ने 2014 में ईपीडब्लयू में एक लेख में ‘संस्थागत नस्लभेद’ का जिक्र किया था। इसमें उन्होंने बताया है कि कैसे पुलिस और अन्य संस्थाएं ऐसे मामलों में हीलाहवाली करती हैं।

हमारी सरकार सिर्फ दूसरे देशों में होने वाले नस्लभेद को ही नस्लभेद मानती है। अगर किसी भारतीय पर अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया जैसे किसी देश में हमला हो जाए तो भारत सरकार इसकी आलोचना नस्लभेद के नाम पर करती है। जबकि ऐसी घटना भारत में हो जाए तो उसे ‘आपराधिक’ करार देकर पल्ला झाड़ लेती है। इस तरह का नस्लभेद और सरकार की शह पर बढ़ रही राजस्थान के अलवर जैसी ‘भीड़ न्याय’ की घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि आने वाले दिनों में ऐसी हिंसक घटनाएं बढ़ सकती हैं। अगर किसी व्यक्ति को दिनदहाड़े राजमार्ग पर ‘गौ तस्करी’ की शंका मात्र पर पीटकर मारा जा सकता है तो फिर कोई पूर्वोत्तर का व्यक्ति, कोई अफ्रीकी, कोई दलित, कोई मुस्लिम या अन्य विश्वास वाला कोई और व्यक्ति सुरक्षित कैसे महसूस करेगा?

भारतीय लोग इस बात पर आत्ममुग्ध हो सकते हैं कि हम स्वभाव से नस्लभेदी नहीं हैं। लेकिन इतिहास कुछ और बताता है। अफ्रीकी देशों में साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ चले संघर्ष से हमारे लोगों को एकजुट होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। विदेशों में रहने वाले भारतीय लोगों ने खुद से अलग रंग के दिखने वाले व्यक्तियों के साथ अपनी पहचान को नहीं जोड़ा। उनकी भारतीयता का मतलब भारतीय-आर्य यानी गोरों के करीब दिखाने की कोशिश करने से रही है। भारतीय वर्ण व्यवस्था भी एक तरह से रंग आधारित व्यवस्था ही थी।

जिसमें गोरे लोग ऊपर थे और कम गोरे नीचे। अगर भारत को भविष्य में विविधतापूर्ण, सहिष्णु और सर्वग्राही समाज बने रहना है तो इस मानसिकता को बदलना होगा। लेकिन ऐसे कई संकेत मिल रहे हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि देश दूसरी दिशा में जा रहा है। इससे वर्ग, जाति और संप्रदाय से परे हटकर हर भारतीय को भविष्य को लेकर चिंतित होना चाहिए।

(यह लेख इकॉनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली से लिया गया है)

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