दिल्ली की देहरी : दिल्ली के पीने वाले पानी की कहानी

दिल्ली की देहरी : दिल्ली के पीने वाले पानी की कहानीदिल्ली की देहरी।

दिल्ली में हुए विभिन्न राजवंशों के दौर में हुए समुचित जल प्रबंधन के कारण देश की राजधानी पानी के मामले आत्मनिर्भर रही। इतिहास गवाह है कि दिल्ली में बसे नौ या उससे अधिक शहर जल स्त्रोतों के निकट थे और शहर के स्त्रोत से दूर होने पर पानी की व्यवस्था की गई। प्राचीन और मध्यकालीन समय में नदी, नहर, कुओं, तालाबों और बावलियों ने आबादी की घरेलू और खेती के लिए पानी उपलब्ध करवाया। तोमर राजपूत शासकों ने आठवीं शताब्दी में सूरजकुंड बनवाया, जो कि दिल्ली में प्राचीनतम जल संचयन संरचनाओं में से एक माना जाता है। तोमर शासकों ने ही सिंचाई के लिए बड़खल झील बनवाई।

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वर्ष 1230 में गुलाम वंश सुल्तान इल्तुतमिश ने हौज-ए-शम्शी बनवाया जो कि दिल्ली में अब तक बचा हुआ सबसे बड़ा और पुराना तालाब है। दक्षिण दिल्ली की महरौली में असंख्य बावलियां और तालाब पाए गए हैं, जिनमें से कुछ इल्तुमिश और उसके बाद के लोदी शासकों ने बनवाए थे।

मध्य काल में यमुना से निकलने वाली नहरों से शहर में पानी आता था। तेरहवीं शताब्दी में सबसे पहले फिरोजशाह तुगलक ने नहर बनवाई, जिसे मुगल बादशाह अकबर और जहांगीर के समय में सुधारा गया। वर्ष 1643 में बादशाह शाहजहां के फौजी सिपाहसालार अली मर्दन ने एक पुरानी नहर से दिल्ली के लिए पानी मोड़ा और उसकी मरम्मत करवाई। इस तरह रोहतक नहर शुरू हुई।

वर्ष 1803 में जब अंग्रेजों का दिल्ली पर कब्जा हुआ तो उनके हिसाब से शहर में नहर से आने वाला पानी उपयुक्त नहीं था। अठारहवीं सदी के मध्य तक अली मर्दन नहर जीर्ण शीर्ण होकर सूख चुकी थी और जब उन्नीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में नहर की मरम्मत तो हुई पर नहरों को ताजा पानी उपलब्ध करवाने वाले असंख्य स्त्रोतों जैसे झीलों को उनके हाल पर ही छोड़ दिया गया।

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अंग्रेजों की दिल्ली में सफाई संबंधित व्यवस्थाएं शुरू से ही शहर के आबादी वाले इलाके में पानी की आपूर्ति से जुड़ी थी। दिल्ली पर ब्रिटिश जीत के बाद ही मर्सर नामक एक अंग्रेज ने सूख चुकी अली मर्दन नहर को अपने खर्च पर दोबारा चालू करने की पेशकश की। इस काम की एवज में मर्सर अगले बीस वर्षों के लिए नहर के पानी से मिलने वाले राजस्व की वसूली के अधिकार चाहता था।

उसके बाद शहर में पानी को लेकर वर्ष 1810 में एक सर्वेक्षण हुआ जिस पर वर्ष 1817 में जाकर कार्य शुरू हुआ। अंग्रेज़ रेजिडेंट चार्ल्स मेटकाफ ने औपचारिक रूप से चार साल बाद इस नहर का उद्घाटन किया। इस नहर का उद्देश्य शहरवासियों को पीने के लिए स्वच्छ पानी उलब्ध करवाना था और शायद यही कारण था कि दिल्ली वालों ने घी और फूलों के प्रसाद के साथ बहते जल का स्वागत किया। लेकिन दिल्ली क्षेत्र के किसानों ने इस पानी का इतना इस्तेमाल किया कि शहर में बहकर आने वाले पानी की मात्रा कम हो गई और अंत में फिर से नहर सूख गई।

वर्ष 1832 में दिल्ली के दक्षिण-पूर्वी भाग में बने मकानों को ताजा पानी की आपूर्ति करने के लिए बने पानी के एक भूमिगत चैनल की मरम्मत का एक प्रस्ताव तैयार किया गया लेकिन पैसे की कमी के कारण उस पर अमल नहीं हो सका। वर्ष 1846 में पीने के पानी के लिए एक बड़ा जलाशय बनाया गया लेकिन एक दशक के भीतर ही उसका पानी भी खारा हो गया। उर्दू की मशहूर शायर मिर्जा गालिब ने 1860-61 में एक खत में लिखा कि "कारी का कुंआ सूख चुका है। लाल डिग्गी में सभी कुएं अचानक पूरी तरह से खारे हो गए हैं... अगर कुएं गायब हो गए और ताजा पानी मोती की मानिंद दुर्लभ हो जाएगा तो यह शहर कर्बला की तरह एक वीराने में बदल जाएगा।"

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दिल्ली शहर में पानी की आपूर्ति मांग के अनुरूप नहीं थी। शहर के बहुसंख्यक घरों में अपने कुएं थे और जब नहर सूखने लगी, जैसा कि वास्तव में अठारहवीं सदी के अंत में हुआ, तो ये घर पानी के लिए दोबारा इन कुओं पर निर्भर हो गए। वर्ष 1860 तक, शहर में 1,000 कुएं होने की बात दर्ज थी, जिनमें लगभग 600 निजी स्वामित्व और 400 सार्वजनिक उपयोग में थे। इनसे पानी लाने के लिए कहार या पानी की मशक ढोने वाले आदमी थे। रईस-बड़े घर वालों ने पानी की अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए पूर्णकालिक रूप से पानी ढोने वाले आदमी रखे हुए थे जबकि बाकियों के लिए ये मश्क वाले सार्वजनिक उपयोग वाले कुओं से चमड़े की मश्कों में पानी भरकर उसे घर-घर पहुंचाते थे।

वर्ष 1867 में यह नहर दोबारा 1820 के दशक की तरह फिर से बहने लगी थी और यहां के निवासी उसका इस्तेमाल नहाने तक के लिए करने लगे थे। लेकिन फिर भी पीने योग्य पानी की समस्या का हल नहीं हो सका। वर्ष 1867 में, दोबारा वर्ष 1846 की तरह शहर के तीन चौथाई कुओं का पानी खारा हो गया। ऐसे में मीठा पानी केवल रिज पर झरनों और दूर झंडेवाला से महंगी कीमत पर ही उपलब्ध था। वर्ष 1870 में अंग्रेजों ने ताजेवाला, जहां नदी पहाड़ियों से निकलकर मैदानों में उतरती है, में यमुना पर एक तटबंध बनाकर इन नहरों को फिर से तैयार किया। आज भी पश्चिमी यमुना नहर हरियाणा के मैदानों से दिल्ली तक पानी पहुंचा रही है और रास्ते में कई हेक्टेयर भूमि को सिंचित भी कर रही है। जबकि दिल्ली के दक्षिण के क्षेत्रों में आगरा नहर, जिसे अंग्रेजों ने 1875 में यमुना नदी पर ओखला में बनाए बंध से निकला था, से सिंचाई होती थी। यह नहर आज भी प्रयोग में है।

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जाहिर है, अहम सवाल केवल पानी की उपलब्धता का नहीं बल्कि उपलब्ध पानी की गुणवत्ता का था, जिसके लिए काफी कुछ किया जाना था। तत्कालीन एक अंग्रेज कर्मचारी के अनुसार, दिल्ली के कुंओं के तल से निकाली गई मिट्टी का रंग पहले नीला भूरा, फिर पीला था तथा उसमें पानी के लोटे, ईंटें और पत्थर निकले तो कुछ कुओं में पशुओं की हड्डियाँ भी मिली थी। जबकि एक अन्य कर्मचारी लिखता है कि दिल्ली के नालों में खुले में ही थोड़ा बहुत ठोस मल बहता था जबकि बाकी को मिट्टी में ही मिलने के लिए छोड़ दिया जाता था। इसके अलावा, रात में सफाई में निकलने वाली मिट्टी को गड्ढों में भर दिया जाता था, जिससे घरों के आस-पास की मिट्टी के प्रदूषित होने का खतरा लगातार बना रहता था।

दिल्ली में नदी और नहरों से मिलने वाले पानी की गुणवत्ता संतोषजनक नहीं थी। शहर के करीब काबुल गेट से प्रवेश करने वाली पश्चिमी यमुना नहर में अनेक नाले मिलते थे जो कि अलग-अलग हिस्सों से बहती हुई यमुना नदी में मिलती थी। एक कर्मचारी लिखता है कि नदी के किनारे का रास्ता खतरनाक और अनियमित था और किनारों पर दरारों में मलबे सहित अन्य वस्तुओं के जमाव के कारण पानी की धारा अत्यधिक प्रदूषित और हानिकारक दोनों थी। यह सब गंदा पानी नहीं था बल्कि प्रदूषित पानी था, और कर्मचारी का तर्क था कि उन्हें पीने के पानी की आपूर्ति के स्रोतों को गंभीरता से लेना चाहिए। इस तरह, 1896 में पंजाब के सैनिटरी कमीशनर ने यमुना के पानी के इस्तेमाल के लिए जलदाय विभाग बनाने और इस काम पर आने वाली लागत की वसूली के लिए कर लगाने का सुझाव दिया।

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