कोरोना काल में पर्यावरणीय जन सुनवाई- आपदा में अवसर तलाशती छत्तीसगढ़ सरकार

ज़ाहिर है मुख्यमंत्री जी इस जन सुनवाई की तमाम ज़रूरी तैयारियों का जायजा लेकर ही प्रधानमंत्री के साथ बैठक में शामिल हुए होंगे या उन्हें कम से कम इस विषय में भरपूर जानकारी ज़रूर होगी। जन सुनवाई की तैयारियों का आंकलन इस बात से भी लगाया जा सकता है इस शहर में 24 नवंबर तक रात्रिकालीन कर्फ़्यू और निषेधाज्ञा की धारा 144 लगी थी।

कोरोना काल में पर्यावरणीय जन सुनवाई- आपदा में अवसर तलाशती छत्तीसगढ़ सरकारतस्वीर एक जनसुनवाई की है। कुर्सियां खाली पड़ी हैं। (सभी तस्वीरें साभार राजेश त्रिपाठी)

सत्यम श्रीवास्तव

ऐसे समय में जब पूरे देश में कोरोना का प्रकोप दूसरी लहर के रूप में ज़्यादा आक्रामक और अनियंत्रित होकर लौटता लग रहा है। देश की राजधानी दिल्ली के वायु प्रदूषण को कोरोना के मद्देनजर बहुत गंभीर रूप से देखा जा रहा हो और इस वजह से वायु प्रदूषण को कोरोना के लिए अतिरिक्त रूप से भयावह बताया जा रहा है। हर तरह से एहतियात बरतने के लिए खुद देश के प्रधानमंत्री इस दूसरी लहर से सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर रहे हैं।

राजधानी दिल्ली में 24 नवंबर को हुई बैठक में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी शामिल हुए थे। बैठक में उन्होंने कोरोना को लेकर एहतियात बरतने और सख्त उठाए जाने की हिमायत भी की। इस बैठक के ठीक अगले दिन साल भर गंभीर रूप से प्रदूषित रहने वाले जिले रायगढ़ में वायु की गुणवत्ता को सबसे गंभीर क्षति पहुंचाने वाले उद्योगों में शिखर पर माने जाने वाले स्पंज आयरन प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरणीय जन सुनवाई हुई। 25 नवंबर को रायगढ़ की वायु गुणवत्ता पीएम 2.5 के मानक पर एक्यूआई 155US था। साल भर गंभीर रूप से प्रदूषित रहने वाले इस जिले में कॉर्पोरेट को मुनाफा और क्षेत्रवासियों को केवल और केवल प्रदूषण देने वाले संयंत्र के लिए पर्यावरणीय जन सुनवाई का आयोजन हुआ।

क्या इस स्थिति को कोरोना जैसी 'आपदा से पैदा हुए अवसर' के तौर पर देखा जाना चाहिए या इस सूक्त वाक्य पर केवल भाजपा की सरकारों का कॉपीराइट होगा?

ज़ाहिर है मुख्यमंत्री जी इस जन सुनवाई की तमाम ज़रूरी तैयारियों का जायजा लेकर ही प्रधानमंत्री के साथ बैठक में शामिल हुए होंगे या उन्हें कम से कम इस विषय में भरपूर जानकारी ज़रूर होगी। जन सुनवाई की तैयारियों का आंकलन इस बात से भी लगाया जा सकता है इस शहर में 24 नवंबर तक रात्रिकालीन कर्फ़्यू और निषेधाज्ञा की धारा 144 लगी थी।

पर्यवरणीय जन सुनवाई, उसमें लोगों की हाज़िरी और स्थानीय जन संगठनों के दबाव को देखते हुए हालांकि 24 नवंबर की रात को यह निषेधाज्ञा वापिस ले ली गयी थी, लेकिन जनता के बीच यह कड़ा संदेश जा चुका था कि निषेधाज्ञा लागू है और उनकी आवाजाही प्रतिबंधित है। इस बीच कोरोना, प्रदूषण और निषेधाज्ञा के घटाघोप में भी अंतत: 25 नवंबर को आयोजित की गयी इस जन सुनवाई में स्थानीय लोग गैर हाजिर रहे। यह जन सुनवाई अजय इंगाड रोलिंग मिल प्राइवेट लिमिटेड पूंजीपथरा में स्थापित होने जा रहे स्पंज आयरन परियोजना के लिए आयोजित हुई।


ठीक जन सुनवाई के दौरान ली गईं तस्वीरों से भी यह साफ है कि पंडाल खाली रहा। हालाँकि इसे प्रशासन और कंपनी के लिए मुफीद माना जा सकता है। लंबे समय से यह चलन बन गया है कि पर्यावरणीय जन सुनवाई में लोगों की भागीदारी को किसी भी हथकंडे से हतोत्साहित किया जाए। प्रशासन और कंपनियाँ मानती हैं कि प्रभावित और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील लोगों की भागीदारी जितना कम होगी उसमें रोड़े भी उतने कम आएंगे और इस तरह जन सुनवाई की औपचारिकता पूरी करते हुए परियोजना को हरी झंडी मिल जाएगी।

5 दिसंबर 2020 को आर इस्पात पूंजीपथरा प्लांट के लिए ऐसी ही जनसुनवाई रायगढ़ में होनी है। कोरोना, प्रदूषण तो यथावत रहेंगे लेकिन संभव है जनसुनवाई की अपार सफलता को देखते हुए राज्य सरकार फिर से इसे निषेधाज्ञा की खबरों के बीच सम्पन्न कराये।

स्पंज आयरन का शैतान एक बार फिर जिन्न की तरह बोतल से निकाल लिया गया है। बल्कि इस बार सत्ता की विशेष कृपा और संरक्षण में ज़्यादा मजबूत होकर आया है। हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे कोर उद्योगों की सूची में सूचीबद्ध करते हुए राज्य की तरफ से विशेष पैकेज देने का फैसला भी लिया है।

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25 नवंबर और 5 दिसंबर को आयोजित हुई और होने जा रही इन पर्यावरवीय जन सुनवाइयों को लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं की आपत्तियों को प्रशासन व राज्य सरकार ने सुने जाने लायक भी नहीं माना है।

जन चेतना से जुड़े साथी राजेश त्रिपाठी से इस विषय पर विस्तार से बात हुई। उनसे पूछा गया कि वो इस पर्यावरणीय जन सुनवाई को निरस्त करने की मांग क्यों कर रहे हैं? राजेश इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।

उनका कहना है, "कोविड-19 महामारी के दौरान जब पूरे देश में एवं राज्य में जिले में 144 धारा लगी हो उन परिस्थितियों में यह जनसुनवाई करवाना क्यों ज़रूरी है? ऐसे समय में जब आम जनता शादी एवं मृत्यु के कार्यक्रम के लिए भी जिला प्रशासन से अनुमति लेती है और जिला प्रशासन 50 लोगों से ज्यादा की अनुमति प्रदान नहीं करता। जनसुनवाई में लोग भागीदारी करें और अपना पक्ष रखें इसके लिए कम से कम 45-45 प्रभावित गांवों के लोग हिस्सेदारी करेंगे जिससे अनुमानित 5,000 लोग पर्यावरणीय जनसुनवाई के मुद्दे पर बात करेंगे। एक नियत समय और नियत स्थान पर इतने लोगों का साथ आना कोविड-19के मद्देनजर क्या जायज़ है? रायगढ़ जिले में हर रोज़ करीब 200 से ज्यादा कोविड-19 के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे में महज़ एक उद्योग, और ऐसे उद्योग के लिए जिससे जिले और आसपास के वातावरण पर हमेशा के लिए गंभीर खतरे पैदा होना तय है ऐसी जल्दबाज़ी दिखाना समझ से परे है'।


राजेश पर्यावरण आंकलन रिपोर्ट पर भी गंभीर सवाल करते हैं। उनका कहना है कि इस परियोजना के लिए जो पर्यावरण आंकलन रिपोर्ट तैयार हुई है उसमें गंभीर खामियां हैं। जानबूझकर ऐसे तथ्यों को छिपाया गया है जिससे इस परियोजना के रास्ते में बाधाएँ आ सकती थीं। उदाहरण के लिए वो बताते हैं कि इस रिपोर्ट में कहीं भी हाथियों की मौजूदगी का ज़िक्र तक नहीं है। जबकि हाथी-मानव संघर्ष की घटनाएँ यहाँ रोज़ हो रही हैं। खुद वन विभाग इन घटनाओं को दर्ज़ कर रहा है। यह हाथियों का सबसे प्रकृतिक पर्यावास रहा है। इसी तरह घरघोड़ा और तमनार पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र के तहत नहीं बतलाए गए हैं।

इस रिपोर्ट में कहीं भी सामाजिक प्रभाव आंकलन नहीं किया गया है। उल्लेखनीय है कि इस औद्योगिक क्षेत्र के 10 किलोमीटर के अंदर लगभग 40 से 45 गांव आते हैं। जहां की आबादी एक हजार से ज्यादा है इस क्षेत्र में लगभग 70 आंगनबाड़ी केंद्र हैं। 45 से 50 प्राथमिक विद्यालय हैं जहां सैकड़ों की संख्या में छोटे बच्चे पढ़ने आते हैं। ऐसे में उनके स्वास्थ्य पर बहुत गंभीर असर हो रहे हैं। यह देखा जा रहा है कि बच्चों में खांसी, जुकाम और टीवी जैसे लक्षण पाए गए हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा भी इस क्षेत्र का अध्ययन किया गया है जिसमें बताया गया है कि वायु प्रदूषण अपने गंभीरतम स्तर पर पहुँच चुका है।

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प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए रायगढ़ जिले में नए उद्योगों की स्थापना एवं पुराने उद्योगों के विस्तार के लिए पर्यावरणीय अध्ययन कहता है कि अब यहां नए उद्योगों का निर्माण एवं विस्तार नहीं किया जाना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि रायगढ़ जिले में पहले से ही स्पंज आयरन पवार प्लांट मौजूद हैं और जिनकी वजह से इस क्षेत्र की आवोहवा पर बहुत गंभीर असर हुए हैं। रायगढ़ में इस ज़हरीली हवा के कारण लोगों में हर आयु-वर्ग के लोगों में फेफड़ों के कैंसर, दमा और खून में आक्सीजन के कमी से कई तरह की बीमारियाँ बढ़ रही हैं।

स्पंज आयरन केवल वायु की गुणवत्ता को ही नहीं बल्कि जल स्रोतों और मृदा को भी गंभीर रूप से प्रदूषित करते हैं और इसलिए छत्तीसगढ़ में नए स्पंज आयरन प्लांट्सबीते डेढ़ दशक तक नहीं लगाए गए। इस मामले में छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन से आलोक शुक्ला बताते हैं कि –'स्पंज आयरन प्लांट सबसे प्रदूषित उद्योगों में आते हैं। वर्ष 2005 -07 में पूरे प्रदेश में इन उद्योगों के खिलाफ ग्रामीणों विशेषरूप से किसानों में जबरदस्त आक्रोश रहा। किसानों व ग्रामीणों के दबाव में प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल को स्वयं कई औधोगिक क्षेत्रों का दौरा करना पड़ा था। अपनी ही सरकार के खिलाफ धरसींवा विधायक किसानों के साथ सड़कों पर थे'।

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आलोक आगे बताते हैं कि 'बेमता, कठिया, चौरेंगा आदि गांव में विरोध के बाद ये प्लांट कभी शुरू ही नहीं हो पाए। वर्ष 2007 में नागपुर की संस्था नीरी ने सिलतरा, बोरझरा और उरला ओधोगिक क्षेत्र में किसी भी नए प्लांट के विस्तार या स्थापना पर पूर्ण रोक लगाई थी। दुर्ग से लेकर रायगढ़ में इन उद्योगों के खिलाफ व्यापक विरोध और तीव्र आंदोलनों के बाद स्पंज आयरन के नए उद्योगों की स्थापना पर राज्य सरकार को अंतत: रोक लगाना पड़ी'।

राज्य सरकार के इस निर्णय पर आश्चर्य जताते हुए आलोक बताते हैं कि –'मौजूदा कांग्रेस नीत सरकार का यह फैसला चौंकाने वाला है कि ऐसे समय में जब कोरोना और प्रदूषण के बीच वैज्ञानिक सीधा संबंध स्थापित कर चुके हैं, पहले से ही इन्हीं उद्योगों के कारण राज्य में प्रदूषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है, कोयला खनन, ताप विद्युत परियोजनाएं और कम होते जंगलों से स्थिति पहले से ही खराब है फिर इन स्थापित प्रदूषण पैदा करने वाले उद्योगों को अनुमति व प्रोत्साहन क्यों दिया जा रहा है?'

प्राकृतिक संपदा की विरासत से भरपूर इस राज्य के पास कोरोना जैसी आपदा से पैदा हुए उन गंभीर सभ्यतागत सवालों का जवाब देने का एक दुर्लभ लेकिन ऐतिहासिक अवसर था। अफसोस, इस सरकार ने भी अपने लिए आपदा को अवसर बदल लिया और सामूहिक बर्बादी का रास्ता चुना।

(लेखक सत्यम श्रीवास्तव आदिवासी मामलों के मंत्रालय द्वारा गठित दो समितियों में नामित विशेषज्ञ सदस्य हैं। जल, जंगल, ज़मीन, पर्यावरण और व आदिवासियों के मुद्दों पर काम करते हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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