ईवीएम मशीन हटाना माने फिर से लठैतों को दावत देना 

ईवीएम मशीन हटाना माने फिर से लठैतों को दावत देना मायावती, राहुल और केजरीवाल ने चुनावों के बाद उठाए हैं ईवीएम पर सवाल।

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने चुनाव परिणाम आते ही ऐलान कर दिया था कि ईवीएम मशीन में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि दूसरों के वोट भी बीजेपी को चले गए। इसका समर्थन करने वालों में शामिल हो गए अरविन्द केजरीवाल और राहुल गांधी।

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ये सब पढ़े लिखे लोग हैं इन्हें अपने एक्सपर्ट लेकर जनता के सामने प्रदर्शित करना चाहिए था कि ऐसा करना सम्भव है। ऐसा हुआ या नहीं तो बाद की बात है। इन लोगों ने यदि मानसिकता न बदली तो उनकी हार का असली कारण कभी जान ही नहीं मिलेगा। बैलट पेपर आते ही दलितों के वोट लठैत डालने लेगेंगे।

देश की चुनाव प्रक्रिया बड़ी लम्बी यात्रा के बाद ईवीएम तक पहुंची है। पहले आम चुनाव 1952 में बैलट बॉक्स होते थे जिन पर पार्टियों के चुनाव चिन्ह छपे रहते थे। कांग्रेस का दो बैलों की जोड़ी, जनसंघ की दिया बाती, समाजवादियों की झोपड़ी और जमीदारों की लढि़या यानी बैलगाड़ी। सारे मतपत्र एक जैसे होते थे उन पर न पार्टी का नाम, न चिन्ह और न उम्मीदवार का नाम। अपनी पसन्द के बक्से में मतपत्र डालना होता था। भोले भाले गाँव वाले अपनी पसन्द के बक्से पर ही पर्ची डाल आते थे और चतुर लोग जाकर उन्हें बटोर कर अपने बक्से में भर देते थे।

असली खेल होता था मतगणना के समय जब बिजली चली जाती थी तो कहा जाता है इधर के वोट उधर हो जाते थे। सब एक जैसे ही तो थे। बराबर कांग्रेस जीतती रही। साठ के दशक में मत पत्र पर पार्टियों के नाम और चुनाव चिन्ह छपने लगे तब बेइमानी थोड़ा कठिन हो गई। चौथे आम चुनाव 1967 में कई और सुधार हुए और कांग्रेस बुरी तरह हारी और संविद सरकारें बनीं। अब बेइमानी का नया रास्ता खोजने लगे लोग। मतगणना सुस्त तो थी ही कई बार दुबारा मतगणना करनी पड़ती थी जिससे कई दिन लगते थे परिणाम आने में। इसके बाद नेताओं ने लठैतों का सहारा लेना आरम्भ किया।

बाहुबलियों के गुर्गे दलितों के मुहल्ले में वोटिंग से एक दिन पहले जाकर बोल आते थे तुम वोट डालने नहीं जाना तुम्हारा वोट पड़ जाएगा। सचमुच पड़ जाता था क्योंकि वही गुर्गे बूथ में घुसकर उसे बन्द करके मतपत्रों पर ठप्पा लगा-लगा कर पतपेटियों में भर देते थे। इसे बूथ कैप्चरिंग कहते थे। यदि कोई दलित बाद में आते भी थे तो कह दिया जाता था तुम्हारा वोट तो पड़ चुका है। नेताओं की सेवा करते-करते जब बाहुबली बोर हो गए तो उन्होंने खुद ही चुनाव लड़ना आरम्भ कर दिया। राजनीति में अपराधियों का बोल बाला हो गया। अजीब लगता है यह सुनकर कि एक दलित की बेटी फिर से दलितों को वोटिंग के उसी चकव्यूह में ले जाना चाहती है।

उस जमाने में फ़र्जी वोटिंग की बड़ी समस्या थी। कभी एक की जगह दूसरा वोट डालता था तो कभी एक मुश्त मुहर लगाकर वोटिंग हो जाती थी। फोटो सहित पहचान पत्र और बटन दबाकर वोट डालने की प्रक्रिया अस्सी के दशक में आरम्भ हुई और थोक भाव फर्जी वोटिंग कुछ घटी। अदालत ने कुछ अंकुश लगाया है, जिससे बाहुबलियों की संख्या घटी लेकिन इस दिशा में बहुत कुछ करना बाकी है। सीधे सादे गरीब लोगों को बाहुबलियों के लोग बता देते हैं कि तुमने ददुआ को वोट न दिया तो पता चल जाएगा। इस प्रकार बाहुबली जीतते हैं।

आवश्यकता इस बात की नहीं कि ईवीएम मशीनों का प्रयोग रोका जाए बल्कि इस बात की है कि इनमें सुधार किया जाए। एक तो जैसे ही वोट डाला जाए वह सम्बन्धित दल के महायोग में जुड़ जाए दूसरे जैसे पुनर्मतगणना का प्रावधान हुआ करता था वैसे ही चेक करने का प्रावधान रहे, सब के लिए। नोटा के प्रावधान को उपयोगी बनाया जाए और चुनाव प्रणाली में ‘राइट टू रिकाॅल’ का प्रावधान हो। जो भी हो चुनाव सुधारों के कदम आगे बढ़ने चाहिए पीछे हटने नहीं चाहिए।

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