ग्राम-प्रधानों का वेतन; लगता है भ्रष्टाचार का लाइसेंस दे दिया गया है?

आखिर कैसे अलग-अलग स्तर के जनप्रतिनिधियों के लिए अलग-अलग व्यवस्था लागू हो सकती है? आखिर संसद या विधानसभा प्रतिनिधि के मामले में जो सिद्धांत अपनाए जाते हैं, वे ग्राम-प्रधान के लिए क्यों नहीं हो सकते?

AmitAmit   4 Jan 2022 8:48 AM GMT

ग्राम-प्रधानों का वेतन; लगता है भ्रष्टाचार का लाइसेंस दे दिया गया है?

उत्तर प्रदेश सरकार ने त्रिस्तरीय व्यवस्था में पंचायत स्तर पर ग्राम-प्रधानों और दूसरे जनप्रतिनिधियों का मानदेय बढ़ा दिया है। ग्राम-प्रधानों के मानदेय में पंद्रह सौ रुपये (1,500) प्रतिमाह की वृद्धि की घोषणा की गई है। ऐसे में ये विचार करने योग्य है कि वर्तमान में एक जनप्रतिनिधि होने के नाते ग्राम-प्रधान को कितना मानदेय मिलता था, अब कितना मिलेगा और कैसे ये एक तरह का उन्हें भ्रष्टाचार का लाइसेंस देना है।

अपनी बात शुरू करने के लिए मैं दो घटनाओं का जिक्र करूंगा।

एक, सितंबर 2019 में ओडिशा में फुलवानी विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे प्रह्लाद बहरा की दीनहीन स्थिति की खबर आई थी। एक समय अपनी विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते रहे प्रह्लाद जी कई बीमारियों से ग्रस्त थे और एक कच्ची झोपड़ी में रहते थे, जो बुरी तरह गिर चुकी थी। उन्हें लगभग 15 हजार रुपये पेंशन के रूप में मिल रहे थे, जो उनकी बीमारी का इलाज करवाने के लिए अपर्याप्त थे। उस समय मैंने लिखा था कि "ईमानदारी एक सिद्धांत है और सिद्धांत बदले नहीं जाते।" इसमें लिखा था कि क्यों जनप्रतिनिधियों को एक सम्मानजनक वेतन दिया जाना जरूरी है।

प्रतीकात्मक तस्वीर: गाँव कनेक्शन

दूसरा वाकया मेरे चुनाव जीतने का है, रांची से मेरे एक मित्र, जो शानदार पत्रकार भी हैं, ने मुझे बधाई देने के लिए फोन किया, अभिवादन करने या बधाई देने से पहले उनका पहला सवाल था कि आपको वेतन कितना मिलेगा? एक गलत जानकारी के आधार पर मैंने उन्हें बताया कि लगभग प्रति महीने 18-18.5 हजार रुपये, जिसमें कई तरह के भत्ते शामिल होते हैं। सामने से मित्र ने कहा कि ये कम है, लेकिन काम चलाया जा सकता है। 'काम चलाने' के आशय में ईमानदारी का सिद्धांत निहित था। उनकी प्रतिक्रिया पर मैंने अपनी सहमति जताई। हालांकि मुझे मिलने वाली ये रकम, पत्रकारिता में काम करते हुए मिलने वाले वेतन से कई गुना कम थी, लेकिन फिर भी मेरा अनुमान था कि इतने में 'काम चल जाएगा'।

बाद में मुझे पता चला कि मेरी जानकारी का स्रोत गलत था। दरअसल, उत्तरप्रदेश में ग्राम-प्रधान (अन्य राज्यों में मुखिया या सरपंच) को मात्र तीन हजार पांच सौ (3,500) का मानदेय मिलता है। आपने ठीक ही पढ़ा है। सिर्फ 3,500 रुपये प्रति माह, ग्राम-प्रधान को मिलने वाला ये मानदेय उसकी ग्राम-पंचायत में जितने भी उसके सहयोगी (कर्मचारी) होते हैं, उन सबसे कम मिलता है। जैसे ग्राम-पंचायत सचिव का कुल वेतन इसका लगभग 15 गुना, सफाई कर्मी का वेतन लगभग 10 गुना, संविदा पर तैनात रोजगार सेवक (पंचायत मित्र) का वेतन लगभग तीन गुना, आगंनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं का लगभग ढाई गुना वेतन मिलता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एक ग्राम-प्रधान अपने खर्च कैसे निकालता है? ग्राम-प्रधानों अपनी ग्राम-पंचायत में कौन-कौन से कर्तव्यों के प्रति उत्तरदायी होता है, इसकी सूची बहुत लंबी है। संवैधानिक रूप से देखा जाए तो ग्राम-पंचायतों से संबंधित 11वीं अनुसूची में 29 विषय हैं, जिनमें से हर एक उपबंध के कई भाग होते हैं। इन उत्तरदायित्वों को निभाने में जितना खर्च आता है, क्या उसकी पूर्ति के लिए 3,500 प्रति माह का मानदेय पर्याप्त है? एक ग्राम-प्रधान से 24*7 तत्पर रहने की अपेक्षा की जाती है। इन सब कर्तव्यों के निर्वहन में योग्यता अनुसार सहायक (जैसे कंप्यूटर या डेटा एंट्री ऑपरेटर) की भी जरूरत पड़ती है। इनका खर्च आखिर कैसे चलाया जा सकता है?

तो फिर ऐसी स्थिति में ग्राम-प्रधान अपने खर्च कैसे चलाएगा? उसके पीछे निजी जीवन में उसका परिवार भी होता है। एक व्यक्ति अपनी निजी जिम्मेदारी कैसे उठाएगा? फिर डेटा संग्रहण वेबसाइट statista के अनुसार उत्तर प्रदेश में 2019 वित्तीय वर्ष में प्रति व्यक्ति आय लगभग 66 हजार रुपये सालाना थी। यानी प्रति व्यक्ति आय से भी कम मानदेय जनप्रतिनिधि को दिया जा रहा है?

इतने कम मानदेय पर क्या मान लिया गया है कि ग्राम-प्रधान अपनी ग्राम-पंचायत में होने वाले कार्यों में भारी-भरकम कमीशन लेने की छूट होगी? सहयोगियों के साथ मिलकर बजट अधिकतमीकरण के जरिए सार्वजनिक धन की बंदरबांट की जाएगी? ग्राम-प्रधान बेवजह के कार्यों को स्वीकृति प्रदान करेगा, जिनसे अपना खर्च निकालेगा?

इन सवालों का जवाब क्या राजनीति शास्त्र की किताबों में मिल सकता है? क्या पंचायती राज अधिनियम में इतने कम मानदेय पर जन-सेवा करने को सिद्धांत माना गया है? मैंने ऐसा कहीं नहीं पढ़ा, आपने भी नहीं पढ़ा होगा। फिर क्या कारण है कि ग्राम-प्रधानों को इतना कम मानदेय मिलता है? अगर इन सवालों का कोई जवाब नहीं है तो क्यों न मान लिया जाए कि ग्राम-प्रधानों को भ्रष्टाचार का लाइसेंस दे दिया गया है। भ्रष्टाचार में शासन-प्रशासन की उन्हें मौन स्वीकृति है। जिसमें न सिर्फ ग्राम-प्रधान सार्वजनिक धन की लूट-खसोट करते हैं बल्कि सभी जिले में संबंधित कर्मचारी और अधिकारी भी इसमें शामिल होते हैं? हकीकत में यही होता है। भ्रष्टाचार एक बुरी सच्चाई बन चुका है।


लेकिन आखिर कैसे अलग-अलग स्तर के जनप्रतिनिधियों के लिए अलग-अलग व्यवस्था लागू हो सकती है? आखिर संसद या विधानसभा प्रतिनिधि के मामले में जो सिद्धांत अपनाए जाते हैं, वे ग्राम-प्रधान के लिए क्यों नहीं हो सकते?

भ्रष्टाचार की कोई सीमा या अंत नहीं होता। ये व्यवहारिक रूप से सही है तो सिद्धांततः ये भी सही है कि सौ-प्रतिशत लोग भ्रष्ट नहीं होते। कुछेक ऐसे भी होते हैं, जो पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता से जन-सेवा करना चाहते हैं। ऐसे लोगों के लिए ईमानदारी का वही सिद्धांत लागू होता है जो प्रह्लाद बहरा जी की स्थिति पर लागू हुआ था। एक सम्मानजनक वेतन की व्यवस्था हो तो बदलाव लाने के लिए कोशिश करने वाले युवा इसे एक कैरियर के रूप में भी देख सकते हैं। अन्यथा बिना कैरियर की संभावना के इस निर्वात को भ्रष्ट और लूट-खसोट करने वाले लोगों द्वारा ही भरा जाता रहेगा।

अंत में आदर्श और सिद्धांतों में जनप्रतिनिधियों को ईमानदार बनाने की कोशिश होनी चाहिए और इसके लिए जरूरी है कि उन्हें एक सम्मानजनक वेतन और नियमित वेतन दिया जाए। ये वेतन कितना हो, इसके लिए विशेषज्ञों की राय ली जा सकती है। कोई आयोग या समिति बनाकर इसका निर्धारण कराया जा सकता है। लेकिन 3,500 में 1,500 की वृद्धि निश्चित रूप से 21वीं सदी के दूसरे दशक में भ्रष्टाचार के इस लाइसेंस का नवीनीकरण करना ही कहा जाएगा।

(अमित उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की मलकपुरा ग्राम पंचायत में ग्राम प्रधान हैं, साथ ही कई उन्होंने कई बड़े मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता भी है। ये उनके निजी विचार हैं।)

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