सावधान: हर्बल दवाएं भी पहुंचा सकती हैं नुकसान

सावधान: हर्बल दवाएं भी पहुंचा सकती हैं नुकसानहर्बल दवाओं के इस्तेमाल से पहले डॉक्टर की सलाह लेना ज़रूरी है।

मेरे एक मित्र फार्मासिस्ट हैं और बीते रविवार इनसे मेरी मुलाकात हुई। बातों ही बातों में इन्होंने बताया कि आने वाले समय में इनकी व्यस्तता ज्यादा रहेगी क्योंकि ‘सीज़न’ आ चुका है। बार-बार पूछे जाने पर इन साहब ने मुझे सीज़न का मतलब बताया। फार्मासिस्ट और डॉक्टर्स के लिए सीज़न का अर्थ ज्यादा रोगियों की उपस्थिति और ज्यादा से ज्यादा दवाओं का विक्रय।

दरअसल, अब मौसम करवट बदलने की कगार पर है, ठंड दस्तक देने को तैयार है और ऐसे में सामान्य बुखार, सर्दी-खांसी और वायरल होने की बातें आम होंगी और सामान्य एंटीबायोटिक्स, दर्दनिवारक दवाओं की बिक्री में तेज़ी आएगी और यही तेज़ी मेरे मित्र के लिए सीज़न कहलाती है। मित्र ने ये भी बताया कि डॉक्टर्स के द्वारा दी गई दवा पर्ची के अलावा लोग खुद काउंटर तक चलकर आते हैं और दवाएं खरीद ले जाते हैं।

भागती-दौड़ती जिंदगी में हम अपनी सेहत को भी आड़े हाथों लेने से बाज़ नहीं आते और अक्सर स्व-उपचार पर भरोसा कर लेते हैं। अपने मन से दवाएं लेने या फार्मासिस्ट से पूछकर दवा ले लेना इतना आसान होता तो हमारे समाज को चिकित्सकों की जरूरत ही ना पड़ती। ये हाल सिर्फ एलोपेथिक दवाओं को लेकर ही नहीं, बल्कि हर्बल और आयुर्वेदिक दवाओं के साथ भी है। हर्बल दवाओं को लेकर लगभग सारे जनमानस की सोच है कि ये दुष्प्रभाव मुक्त और पूर्णत: सुरक्षित होती हैं, जबकि ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है।

हमारे शरीर में रोग-प्रतिरोधक क्षमता और शारीरिक जरूरतों के तौर पर अनेक रसायन, एंजाइम, हार्मोन्स आदि का बनना समय-समय पर होता रहता है और प्रत्येक शरीर में अक्सर किसी ना किसी रसायन की अधिकता या अल्पता बनी रहती है और अल्प ज्ञान और सलाह की वजह से आप जब अपना उपचार स्वयं करते हंै तो संभावना होती है कि परिणाम नहीं मिलेंगे और इसके विपरीत आपके शरीर को नुकसान भी पहुंचेगा। हमारे शरीर में नैसर्गिक ताकत के रूप में पोषक तत्व, एंजाइम, लिपिड्स और तमाम हार्मोन्स तो हैं लेकिन जरूरत इस बात की है कि किस तरह के रहन-सहन और परिवेश में रहकर इन सबसे संतुलन बनाए रखा जा सकता है। यद्दपि हर्बल दवाएं बगैर किसी प्रेसि्क्रपशन के आसानी से बाजार में मिल जाती हैं लेकिन मेरी समझ से आपको हर्बल दवाओं के सेवन के वक्त भी चिकित्सकीय सलाह (मेडिकल गाईडेंस) लेना जरूरी है क्योंकि अक्सर हर्बल दवाओं की उपयोगिता के बारे में सभी लोग बात करते हैं लेकिन किसी अन्य दवाओं के साथ होने वाले रिएक्शन के बारे में ज्यादा लोगों को समझ नहीं है। यही बात उन डाइटेशियन्स को भी समझनी चाहिए जो चिकित्सा विज्ञान की समझ के बगैर खान-पान में खासे परिवर्तन जरूर करा देते हैं लेकिन किसी खास तत्व की अधिकता या कमी के दुष्परिणामों की फिक्र नहीं करते।

हमारा शरीर खुद अपनी सुरक्षा करने में सक्षम है बशर्ते हम इसे नुकसान ना पहुंचाए। यदि शरीर में किसी पोषक तत्व की कमी है तो पोषक तत्व की पूर्ति के लिए तत्पर औषधियों की तरफ दौड़ लगाने के बजाय तत्वों की कमी होने के कारणों को खोजा जाए और इन कारणों का प्राकृतिक रूप से निवारण किया जाए। यदि अनियंत्रित खाद्य शैली, भाग-दौड़ और तनाव ग्रस्त जीवन में हम अपने शरीर को ढाल लेते हैं और शरीर बीमारियों की चपेट में आता है तो कसूरवार हम खुद हैं। दुर्भाग्यवश हमारे चिकित्सक लोग रोगों के लक्षणों की ठीक कर सकते हैं किंतु रोगों के कारणों को नहीं क्योंकि उन्हें शायद रोगकारकों के बजाए रोग लक्षणों की शिक्षा ज्यादा दी जाती है।

रोगों से बचाव और लड़ने के लिए हमें अपने शरीर से ही सहायता लेनी पड़ेगी और शरीर तभी मदद कर पाएगा जब शरीर मदद के लिए सक्षम होगा। औषधियों का बाजार करोड़ों का है किंतु प्राकृतिक रूप से शरीर स्वस्थ रखना लगभग मुफ्त है और इस मुफ्त इलाज के लिए किसी चिकित्सक की जरूरत भी नहीं, सिर्फ अपना जीवन-यापन, खाद्य शैली, और रोजमर्रा की जिंदगी को सटीक कर लिया जाए तो शरीर स्वत: अपनी रक्षा कर सकता है। रोगों का उपचार बिल्कुल संभव है किंतु यह तभी होगा जब रोगों के कारणों को हम समझ पाएं और कारणों के निवारणों पर अमल किया जाए।

(लेखक हर्बल विषयों के जानकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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