हवा में घुलते ज़हर को भारत न करे नजरअंदाज़

हवा में घुलते ज़हर को भारत न करे नजरअंदाज़वायु प्रदूषण की वजह से भारत में हर साल लाखों लोग और खास तौर पर गरीब मर रहे हैं।

कल्पना शर्मा

इस बात से क्यों इनकार किया जा रहा है कि वायु प्रदूषण की वजह से भारत में हर साल लाखों लोग और खास तौर पर गरीब मर रहे हैं? केंद्रीय पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे इनकार की मुद्रा में हैं। वे इस बात को नहीं नजरअंदाज कर रहे हैं कि वायु प्रदूषण भारत में एक गंभीर समस्या बन गई है। लेकिन वे यह नहीं चाहते ये बात देश के बाहर से कोई कहे।

बोस्टन की हेल्थ इफेक्ट इंस्टीट्यूट और इंस्टीट्यूट फोर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन ने स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर, 2017 के नाम से एक रिपोर्ट जारी की। इसमें बताया गया वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में भारत चीन से बहुत पीछे नहीं है। इस पर दवे ने कहा कि हम भारतीय लोग बाहर की चीजों से बहुत प्रभावित होते हैं। उन्होंने कहा कि हमें अपने विशेषज्ञों पर भरोसा करना चाहिए उसी तरह जिस तरह हम अपनी सेना पर भरोसा करते हैं।

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पर्यावरण मंत्री द्वारा की गई यह तुलना हैरान करने वाली है। वायु प्रदूषण की वजह से होने वाली मौतों की जो संख्या इस रिपोर्ट में दी गई है, उसे लेकर मतभेद हो सकते हैं लेकिन इस सच्चाई से कोई मुंह नहीं मोड़ सकता है कि वायु प्रदूषण एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या बन गई है और इससे काफी लोगों को जान गंवानी पड़ रही है।

वायु प्रदूषण पर सरकारी आंकड़ों और ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज यानी जीबीडी रिपोर्ट के आधार पर इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है। जीबीडी में 195 देशों के 1990 से 2015 तक के विस्तृत आंकड़े हैं। इनके आधार पर वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या निकाला जाता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2015 में पूरी दुनिया में 42 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई। इनमें से 52 फीसदी मौतें भारत और चीन में हुईं। हालांकि, चीन ने इस दिशा में जो कदम उठाए हैं उनकी वजह से इन मौतों की संख्या स्थिर हो गई है। जबकि भारत में अभी यह संख्या लगातार बढ़ रही है।

इसकी वजह कोई रहस्य नहीं है। भारत में सरकारों ने वायु प्रदूषण को कभी गंभीरता से ही नहीं लिया। वायु प्रदूषण कम करने की कोशिशें भी दिल्ली जैसे बड़े शहरों पर केंद्रित रहीं। हमने छोटे शहरों को नजरअंदाज किया। 2016 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची जारी की इनमें 10 भारत पर है। भारत में सबसे बुरी स्थिति इलाहाबाद, कानपुर, फिरोजाबाद और लखनऊ की है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपनी एक रिपोर्ट में वाराणसी को सबसे अधिक प्रदूषित तीन शहरों में रखा है। दवे को कम से कम यह रिपोर्ट माननी चाहिए क्योंकि इसे ‘हमारे अपने’ वैज्ञानिकों ने जारी किया है।

दिल्ली में प्रदूषण के आंकड़े इसलिए मिल जाते हैं क्योंकि यहां इसके लिए जरूरी बुनियादी ढांचा है। जबकि वाराणसी में सिर्फ तीन जगहों पर प्रदूषण मापा जाता है। इनमें से भी सिर्फ एक जगह ही पीएम 2.5 का स्तर मापा जाता है। जबकि एयर क्वालिटी इंडेक्स की जानकारी देने वाला कोई उपकरण वाराणसी में नहीं है। दिल्ली में 13 जगहों पर पीएम 2.5, पीएम 10 और एयर क्वालिटी इंडेक्स की सूचना देने वाले उपकरण लगे हैं।

अगर हम अपने शहरों में वायु प्रदूषण का अंदाज ही नहीं लगा पा रहे हैं तो इनकी वजह से सेहत पर पड़ने वाले कुप्रभावों का अंदाज हम कैसे लगा पाएंगे। हमारे यहां इसके लिए जरूरी बुनियादी ढांचे के अभाव की स्थिति में विदेशी अध्ययनों पर भरोसा करने के अलावा और क्या विकल्प बचता है। क्या पर्यावरण मंत्री की बात मानकर हमें भारतीय विशेषज्ञों की रिपोर्ट का इंतजार करते रहना चाहिए? अगर हमने ठीक से अपने शहरों और गाँवों से प्रदूषण के आंकड़े जुटा लिए तो सच्चाई इस विदेशी रिपोर्ट से कहीं अधिक भयावह होगी।

हम आसानी से जिस सच्चाई को भूल जाते हैं, वो यह है कि जहरीली हवा से सबसे अधिक बुरा प्रभाव गरीब लोगों पर पड़ता है। अमीर लोग तो एसी कार में चलकर और घरों में हवा साफ करने वाली मशीन लगाकर दुष्प्रभावों से बच जाते हैं। गरीबों के सामने जहरीली हवा में अपना हर काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता।

गरीब लोग लकड़ी और गाय के गोबर से बनने वाले उपलों पर खाना बनाते हैं। उनके घरों में हवा की आवाजाही की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती। इसलिए उन्हें जहरीली हवा का दंश और झेलना पड़ता है। सरकार स्रोत का हवाला देकर स्थिति की गंभीरता को खारिज कर रही है। इससे पहले से ही खराब सेहत और पोषण में कमी का सामना कर रहे लाखों लोगों को सरकार और बुरी स्थिति में धकेल रही है।

(लेखक इकोनोमिक एंड पोलेटिकल वीकली की सलाहकार संपादक हैं।)

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