सॉफ्ट पावर से बनेगा भारत विश्व शक्ति!

सॉफ्ट पावर से बनेगा भारत विश्व शक्ति!सॉफ्ट पावर से बनेगा भारत विश्व शक्ति!

फरवरी 1999 में जिस दिन अटल बिहारी वाजपेयी को लाहौर की ऐतिहासिक बस यात्रा पर निकलना था उसके एक दिन पहले उनका कार्यालय एकदम परेशान था कि आखिर आधी रात को फिल्म अभिनेता देव आनंद से संपर्क कैसे किया जाए? शायद उसी वक्त यह पता लगा था कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ देव आनंद के जबरदस्त प्रशंसक हैं। इस बीच देव साहब के एक और प्रशंसक को जगाकर देव साहब से पुछवाया गया कि क्या वह वाजपेयी के साथ बस यात्रा पर जाएंगे। वह खुशी से तैयार हो गए। उनका आगमन उस यात्रा की बड़ी खबर बनी। हिंदी सिनेमा के इस शोमैन ने राजनेताओं, बुर्जुग वर्ग के लोगों, आम पाकिस्तानी मीडिया सब को प्रभावित किया। वाजपेयी अपनी यात्रा के जरिए भारत की सॉफ्ट पावर (सांस्कृतिक प्रभाव के जरिये अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को आकार देना) का इस्तेमाल कर रहे थे।

हाल के दिनों में पाकिस्तान के साथ सभी सांस्कृतिक खेल और अकादमिक रिश्ते खत्म करने का जो अभियान चला है वह उन दिनों की याद दिलाता है जब सॉफ्ट पावर शब्द इस्तेमाल में ही नहीं था। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के साथ सारे रिश्ते खत्म कर उसे विश्वस्तर पर एकदम अलग-थलग कर दिया जाए। गोवा में ब्रिक्स सम्मेलन के पहले और उसके बाद की कुछ घटनाओं ने भारत की मई 2014 के बाद की वैश्विक शक्ति की सीमाएं उजागर की हैं। हमारे टीवी स्टूडियो के योद्धाओं और युद्धाकांक्षी पूर्व सैन्य अधिकारियों को छोड़ दिया जाए तो भारत का विश्व शक्ति होना अभी दूर की कौड़ी है।

जूनियर बुश के पहले कार्यकाल में अमेरिकी रक्षा मंत्री रहे डॉनल्ड रम्सफेल्ड से जब पूछा गया कि क्या वह सॉफ्ट पावर में यकीन करते हैं तो उन्होंने निहायत मासूमियत से कहा था कि यह क्या है? वह कड़े सैन्य कदमों के बहुत बड़े हिमायती थे। हम जानते हैं कि उन्होंने अपने पीछे कितनी गंदगी छोड़ी। अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान में कैसे हालात पैदा किए यह हम सबने देखा। हार्वर्ड के प्रोफेसर जोसेफ जूनियर ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1990 में शीतयुद्ध के बाद अपनी रचना ‘बाउंड टु लीड: द चेंजिंग नेचर ऑफ अमेरिकन पॉवर’ में सॉफ्ट पावर अवधारणा का उल्लेख किया था। उन्होंने कहा कि बुश ने अपने दूसरे कार्यकाल में सबक सीखा और कोंडोलीजा राइस के विदेश मंत्री रहते उन्होंने सॉफ्ट पावर और सार्वजनिक कूटनीति पर जमकर ध्यान दिया। उनकी मूल दलील यह थी कि सॉफ्ट पावर अनिवार्य रूप से नरम और मानवीय ही हो यह आवश्यक नहीं है। उन्होंने कहा था कि आप सॉफ्ट पावर का प्रयोग करते हैं या सख्ती बरतते हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परिस्थितियां कैसी हैं। उन्होंने अपनी बात को आगे स्पष्ट करते हुए कहा कि आप किसी को बंदूक के जोर पर लूट सकते हैं, उसे किसी जल्द अमीर बनाने वाली योजना का हिस्सा बनाकर ठग सकते हैं या उसे एक आध्यात्मिक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए प्रेरित कर उसकी संपत्ति अपने नाम करा सकते हैं। इसमें शुरुआती दोनों तरीके हार्ड पावर के हैं जबकि तीसरा सॉफ्ट पावर का।

इसे भारत के वैश्विक हितों पर लागू करें या भारत-पाकिस्तान रिश्तों पर लागू करें तो? क्या सॉफ्ट पावर का संबंध केवल खाने, संस्कृति, साहित्य और खेलों से है? अगर ऐसा होता तो कोका कोला और मैकडॉनल्ड्स, माइकल जैक्सन और मडोना ने बहुत पहले सोवियत संघ को जीत लिया होता। या फिर चीन अपने खाने के जरिये हमारे दिलोदिमाग पर राज कर रहा होता। या फिर उसके खानपान का देसीकरण करने के लिए कबका हमसे जंग छेड़ चुका होता? सॉफ्ट पावर का संबंध राष्ट्रीय मूल्यों, नीतियों, लोकतंत्र की गुणवत्ता और राजनीति तथा संस्थानों की ताकत से भी है।

ऐसा नहीं है कि केवल पाकिस्तान के लोग ही हमारी फिल्में और टीवी चैनल देख रहे हैं, हमारे खेल नायकों से रौब खाते हैं या हमारी धुनें गाते-बजाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि केवल प्रमुख पाकिस्तानी यानी खिलाड़ी और अभिनेता भारत में अपनी आजीविका कमा रहे हैं और इसलिए बेहतर रिश्तों में उनके हित जुड़े हैं। यह सारी बात मायने रखती है लेकिन केवल तभी जबकि व्यापक भारतीय प्रभाव नैतिक रूप से प्रभावी हो। एक बेहतर लोकतंत्र, एक उदार समाज, अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार, बोलने की आजादी, मजबूत मीडिया, अदालत, पर्यावरण कानून आदि सभी इस ब्रांड अपील में शामिल हैं। आप इसे सॉफ्ट, हार्ड या जो चाहे कहकर पुकार सकते हैं।

एक देश और समाज दूसरे को केवल आतंकियों की घुसपैठ से ही नहीं प्रभावित करता है बल्कि वह अनुकरणीय उदाहरण पेश करके भी वही काम करता है। कई उदार लोकतांत्रिक ताकतें इसका उदाहरण पेश कर चुकी हैं। करीब 25 साल पहले मालविका और तेजबीर सिंह की प्रतिष्ठित पत्रिका सेमिनार में मैंने एक लेख लिखा था, ‘पाकिस्तान: अ हॉक्स एजेंडा।’ इसमें बताया गया था कि कैसे पश्चिमी दुनिया, खासतौर पर अमेरिका ने अपने लोकतांत्रिक, उदार और सांस्कृतिक प्रभाव का प्रयोग शीतयुद्ध में सोवियत संघ को परास्त करने में किया (उस वक्त सॉफ्ट पावर शब्द नहीं था) और भारत को भी पाकिस्तान के संबंध में यही नीति अपनानी चाहिए। बतौर संवाददाता अपनी कई पाकिस्तान यात्राओं के दौरान मैं यह देखकर चकित हुआ कि भारतीय संस्थानों ने उसके नेताओं को कितना प्रभावित किया है। वहां के प्रभावी लोगों ने मुझसे कई चीजें मांगी, उनमें केंद्र राज्य संबंधों पर न्यायमूर्ति सरकारिया आयोग की रिपोर्ट भी शामिल थी। यह रिपोर्ट शाह महमूद कुरैशी ने मांगी थी जो बाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्री बने। उस वक्त वह पाकिस्तानी पंजाब सूबे के वित्तमंत्री थे। अपने पहले कार्यकाल में जब नवाज शरीफ कराची में स्वायत्त काम करने की मांग कर रही अपनी सेना के लिए नियम कायदों पर विचार कर रहे थे तो मुझसे सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम मांगा गया था। मैं अतीत में इस बारे में लिख चुका हूं। भारत में अब तक 27 सेना प्रमुख हुए हैं जो समय पर या उससे पहले सेवानिवृत्त हुए हैं जबकि पाकिस्तान में केवल 13 ही। यह सकारात्मक प्रभाव का विषय है।

संस्कृति, अर्थव्यवस्था, व्यापार, खेल इसके बाद राष्ट्रीय हित के विविध कारकों के रूप में सामने आते हैं। क्या राजकपूर चार दशक तक समूचे कम्युनिस्ट देशों पर ऐसा ही सकारात्मक प्रभाव नहीं डालते रहे? केवल सोवियत संघ में ही नहीं बल्कि पेइचिंग तक में। थ्यान अनमन चौक पर 1989 में जिस सप्ताह हत्याकांड हुआ था उस वक्त होटल के कर्मचारियों ने अनधिकृत रूप से हमारी खबर फैक्स की वह भी इस शर्त पर कि हम तब तक बिना रुके आवारा हूं...गाते रहेंगे जब तक कि सारे पन्ने फैक्स नहीं हो जाते। हमारे साथ वे भी गुनगुनाते रहे। अमेरिका ने हॉलीवुड और डिजनी की यात्राओं को अंतरराष्ट्रीय नेताओं के कार्यक्रमों में शामिल कराया। वह एक व्यापक पारंपरिक और परमाणु हथियार जखीरा तैयार कर रहा था लेकिन राजनीतिक और दार्शनिक तौर पर वह सोवियत संघ के करीब जाने की प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था। खुले समाज के लिए खुलापन एक बड़ा हथियार है। यही वजह है कि पाकिस्तान के साथ लड़ाई केवल इतनी नहीं है कि भारत छह गुना बड़ा है। बल्कि पाकिस्तान उतना ही ज्यादा कटु और असुरक्षित भी है। भारत को अगर विश्व शक्ति बनना है तो उसे सख्ती के साथ-साथ चतुराई दिखानी होगी और अपना दिल बड़ा करना होगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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