क्या यह 'असंगठित क्षेत्र' को 'संगठित' करने का समय है?

क्या यह असंगठित क्षेत्र को संगठित करने का समय है?

- शुभम कुमार

पिछले दो महीने देश भर के लिए और ख़ासतौर से मजदूरों, श्रमिकों, दुकानदारों और अन्य लघु उद्योग से जुड़े लोगों के लिए एक भयावह सपने की तरह बीते हैं। राष्ट्रव्यापी तालाबंदी की घोषणा के तुरंत बाद श्रमिकों एवं मजदूरों के बड़े पैमाने पर पलायन की कहानियाँ और मार्मिक तस्वीरें सामने आने लगीं। साथ ही लंबे वक़्त बाद मुख्यधारा की मीडिया ने मजदूरों की पीड़ा पर ध्यान दिया और उसे बड़े स्तर पर दिखाया। 24 मार्च की तालाबंदी की घोषणा ने अचानक कई अनिश्चितताओं को सभी के सामने ला दिया, जिसके कारण बेबस होकर मजदूरों को गाँव-देहात जाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि 1929 के महामंदी के बाद कोरोना महामारी यक़ीनन अंतराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है। मैककिंसे एंड कंपनी ने अनुमान लगाया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को महामारी से ख़ासा नुकसान पहुँच सकता है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार अगर तालाबंदी को मध्य मई तक जारी रखा गया तो इससे संभवतः वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था लगभग 20 प्रतिशत तक गिर सकती है। इसका सबसे ज्यादा प्रकोप असंगठित क्षेत्र को झेलना पड़ सकता है जो कि पहले से ही लचर अर्थव्यवस्था की मार झेल रहा है। संगठित क्षेत्र को भी समान रूप से नुकसान होने के आसार हैं। सीआईआई के सीईओ स्नैप पोल के अनुसार, अधिकांश कंपनियों के राजस्व में भारी गिरावट आयी है और यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस क्षेत्र में 50 प्रतिशत नौकरियाँ जा सकती हैं।

देश में बेरोज़गारी की समस्या में पिछले डेढ़ साल से निरंतर इज़ाफ़ा हो रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मार्च महीने में बेरोज़गारी दर 8.45 प्रतिशत थी और तालाबंदी के कारण यह 24 प्रतिशत तक पहुँच सकती है। मनरेगा के वेबसाइट से यह पता चलता है कि हाल में इस योजना के तहत प्रदान किये गए काम में भारी गिरावट आयी है। फरवरी और मार्च 2020 में, 1.8 करोड़ और 1.6 करोड़ लोगों को क्रमशः काम प्रदान किया गया था, जबकि अप्रैल माह में केवल 1.9 लाख लोग इस योजना के तहत रोजगार हासिल कर पाए हैं। यह आकड़ें ग्रामीण इलाकों में रोज़गार न के बराबर होने की कहानी बयां करती है।

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26 मार्च को आर्थिक संकटों से निपटने के लिए वित्त मंत्री ने 1.7 ट्रिलियन रुपए के आर्थिक राहत पैकेज की घोषणा की थी। इसका उपयोग मुख्य रूप से किसानों, ग्रामीण श्रमिकों, पेंशनभोगियों, निर्माण श्रमिकों, इत्यादि के लिए खाद्य सुरक्षा और प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त सरकार ने भुखमरी के ख़तरे को कम करने के लिए फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया से खाद्यों के स्टॉक को जारी करने की भी घोषणा की है। हालांकि, देश भर के 11,000 श्रमिकों से एकत्र किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि दो अप्रैल के सप्ताह तक लगभग 50 प्रतिशत श्रमिकों के पास एक दिन से कम का राशन था और 96 प्रतिशत श्रमिकों को किसी भी सरकारी योजना के अंतर्गत कोई राशन नहीं मिला। यह काफ़ी चौंका देने वाले आँकड़ें हैं और यह स्पष्ट रूप से केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा योजनाओं के लचर कार्यान्वयन को दर्शाता है।


कोरोना जैसी महामारी के दौरान यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वो हर व्यक्ति को भोजन, आजीविका और आश्रय सुनिश्चित कराये। ऐसा करने के लिए सरकार को कुछ अल्पकालिक और दीर्घकालिक उपायों की आवश्यकता है। सबसे पहले केंद्र और राज्य सरकारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से खाद्य वितरण को सार्वभौमिक बनाना चाहिए और यह भी सुनिश्चित करना चाहिए की ऐसे वितरण में किसी का भी बहिष्कार न हो।

उदाहरण के तौर पर सर्वप्रथम पीडीएस की दुकानों की मदद से सभी को राशन वितरित किया जा सकता और चुनाव के दौरान इस्तेमाल होने वाली स्याही रसीद के संकेतक के रूप में इस्तेमाल हो सकती है जिससे दुरूपयोग की संभावना न रहे। दूसरा,सरकार हर परिवार को तीन महीने के लिए नकद हस्तांतरण के रूप में 7,000 रुपए प्रति माह प्रदान करके आय और आजीविका को सुनिश्चित कर सकती है। ऐसे में भोजन वितरण और नकद हस्तांतरण प्रदान करने की संयुक्त लागत होगी 5,53,800 करोड़ रुपए जो कि हमारे सकल घरेलु उत्पाद का लगभग 2.9 प्रतिशत है। ऐसा करने से मज़दूर और श्रमिक वर्ग के लोगों को काफ़ी राहत मिलेगी और इसके उपरांत सरकार एक विस्तृत नीति बना सकती है जो दीर्घकालिक सुधार लाये।

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कोरोना ने भारत में डिजिटल डिवाइड की समस्या की पोल खोल दी है। यह स्पष्ट है कि जन- धन, आधार और मोबाइल की तिकड़ी इस महामारी में पूरी तरह विफ़ल रही है। ग्रामीण क्षेत्र में बैंकों का घनत्व, निष्क्रिय जन-धन खाते और इंटरनेट की उपलब्धता न होने से हस्तांतरण में काफ़ी समस्या हो रही है। कोरोना के दोहराव से देश को तैयार करने के लिए डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की अत्यंत आवश्यकता है।

असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 के तहत श्रमिकों का बड़े पैमाने पर पंजीकरण किया जाना चाहिए, ताकि श्रमिकों को इलेक्ट्रॉनिक चिप आधारित आईडी कार्ड जारी किए जा सके, जो उन्हें कानूनी अधिकारों को हासिल करने में मदद करेगा और उन्हें भविष्य के किसी भी लाभ के लिए योग्य भी बनाएगा। इसके अलावाट्रेड यूनियनों के तहत असंगठित श्रमिकों को संगठित करने की आवश्यकता है। वर्तमान मेंलगभग ९०प्रतिशतश्रमिक संघबद्ध नहीं हैं। ट्रेड यूनियनों को सरकार के साथ साझेदारी करनी चाहिए और पूरे बाजार में श्रमिकों को स्थानांतरित करने में मदद करनी चाहिए और उन्हें पंजीकृत करना चाहिए।

महात्मा गांधी ने कहा था कि किसी देश की तरक्की उस देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर करती है। अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस के मौके पर यह आवश्यकता है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर यह सुनिश्चित करें कि इस आपदा की स्थिति में देश के मज़दूर, श्रमिक और किसानों का किसी भी प्रकार का दोहन न होऔर उनकी मूल जरूरतों का यथासंभव ध्यान रखा जाए।

[यह लेख शुभम कुमार, पूर्व-लेजिस्लेटिव असिस्टेंट टू मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट (LAMP) फ़ेलो द्वारा लिखा गया है। लेखक से @shubham765 (ट्विटर) पर संपर्क किया जा सकता है।]

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