इस्लाम माने शान्ति, पर इस्लामिक देशों में खूनख़राबा

इस्लाम माने शान्ति, पर इस्लामिक देशों में खूनख़राबाजानकार लोग बताते हैं इस्लाम का मतलब शान्ति होता है, लेकिन दुनिया के इस्लामिक देशों पर नजर डालें तो पाते हैं कि लगभग सभी में अशान्ति है, खून खराबा है।

जानकार लोग बताते हैं इस्लाम का मतलब शान्ति होता है, लेकिन दुनिया के इस्लामिक देशों पर नजर डालें तो पाते हैं कि लगभग सभी में अशान्ति है, खून खराबा है। इरान, ईराक, सीरिया, यमन, लेबनान, अफ़गानिस्तान, सूदान, उजबेकिस्तान,अल्जीरिया, पाकिस्तान और बंगलादेश सभी जगह अशान्ति है। अविभाजित भारत के मुसलमानों ने जिन्ना की अगुवाई में अपने लिए आबादी के हिसाब से बेहद खूनखराबा के बाद इस्लामिक देश पाकिस्तान ले लिया था। शेष भारत की आबादी पर सेकुलर कानून लागू होने थे लेकिन हमारा देश और अदालतें तीन तलाक से आगे नहीं बढ़ सके।

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इतिहास गवाह है कि भारत के उस इलाके में जहां आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ था मध्यपूर्व से आए मुसलमानों को जमींदार ने मलाबार तट पर सातवीं शताब्दी में बसाया था। उन्हीं के वंशजों ने 1921 में मल्लापुरम, कालीकट और आस पास के जिलों में जो विद्रोह किया उसमें कहते हैं एक लाख हिन्दू या तो धर्मान्तरित हुए या मार डाले गए या भाग गए। हैदराबाद में रज़ाकारों ने वहां के हिन्दुओं के साथ क्या व्यवहार किया और कश्मीर में पंडितों ने क्या झेला यह सभी जानते हैं। एक बार संसद में 1971-72 में अटल जी ने कहा था उस साल 22 में से 21 दंगे मुसलमानों ने आरम्भ किए थे, इस पर इन्दिरा गांधी ने गुस्से में कहा था इससे अन्तर नहीं पड़ता कि पहला पत्थर कौन फेंकता है। इस्लाम का मतलब शान्ति है लेकिन उसके मानने वाले शान्त नहीं हैं।

बंटवारे के बाद वोटों के लालच में शेष भारत की राजनैतिक पार्टियां भी मुसलमानों को अलग आबादी के रूप में देखती रही हैं, उनके अलग विकास की बातें करती हैं। अलग पहचान बचाए रखने की बात जो जिन्ना ने कही थी वह आज भी कही जाती है। भारत को हिन्दुओं से अलग नज़रिये से देखते हैं मुसलमान, कभी वंदे मातरम के नाम से, कभी भारत माता की जय बोलने में, कभी अपने अलग कानून को लेकर, कभी कश्मीर के मुद्दे पर तो कभी राम के जन्मस्थान को लेकर। वास्तव में मुसलमानों ने भारत पर एक हजार साल तक हुकूमत की थी इसलिए उनकी मानसिकता शासक की है। वे हिन्दुओं को काफिर मानते आए हैं और काफिर के साथ भाई जैसा व्यवहार कैसे हो सकता था। यदि भाईचारा सम्भव होता तो देश का बंटवारा ही नहीं होता। और पाकिस्तान का बंटवारा क्यों हुआ इसका जवाब आसान नहीं।

सारी दुनिया को दारुल इस्लाम बनाना मुसलमान का फ़र्ज है, लेकिन दारुल इस्लाम बनाने का तरीका शान्ति का नहीं है भले ही इस्लाम का अर्थ है शान्ति। ईसाइयों ने ‘होली वार’ के माध्यम से अपने धर्म का प्रचार किया और मुसलमानों ने जेहाद करके ‘दारुल हरब’ को दारुल इस्लाम में बदलने की कोशिश की। भारत में मुहम्मद अली जिन्ना सारे देश को नहीं बदल पाए लेकिन पाकिस्तान के रूप में इस्लामिक देश बना लिया। ध्यान रहे भारत को इस्लाम के ज्ञाता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने दारुल हरब के बजाय ‘दारुल अमन’ यानी शान्ति का देश माना था। इसलिए यहां जेहाद की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी।

अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प को इस्लाम से परेशानी हो सकती है भारत के लोगों को इस्लाम से नहीं इस्लाम के मानने वालों से कठिनाई हुई है। जिस धरती पर सिन्धु घाटी सभ्यता का विकास हुआ था और तक्षशिला ने दुनिया में ज्ञान बांटा था उसे बाद में मुहम्मद गौरी, गजनवी, नादिरशाह, बाबर ने तहस-नहस कर दिया। उसी धरती पर अब ओसामा बिन लादेन, मुल्ला उमर, मौलाना मसूद अजहर, बगदादी जैसे लोग पैदा हो रहे हैं। ये लोग न तो धर्म का विस्तार कर रहे हैं और न धर्म रक्षा। ये लाखों मुसलमानों को ही तबाह कर रहे हैं लेकिन ये पैदा ही क्यों हो रहे हैं इसका जवाब शायद ही किसी के पास हो।

कई लोग औरंगजेब को सच्चा मुसलमान मानते हैं। लेकिन वह, उस इस्लाम का मानने वाला तो नहीं था जिसका अर्थ है शान्ति। उसने अपने भाई दारा शिकोह को कत्ल कर दिया और पिता शाहजहां को आजीवन कारागार में डाले रखा। कहा जाता है शाहजहां ने भी अपने भाई खुसरो को मार डाला था। जो भी हो ये सब शान्ति के उदाहरण नहीं हैं यानी सच्चे मुसलमान कहे जाने वाले भी इस्लाम का शान्ति सिद्धांत नहीं मानते।

भारत के सन्दर्भ में विद्वानों के सोचने का विषय होना चाहिए क्या इस्लाम सेकुलरवाद यानी सर्वधर्म समभाव की इजाज़त देता है। क्या इस्लाम को न मानने वाले कुफ्र के गुनहगार हैं, काफिर हैं? क्या मुसल्लम ईमान वाला जिसे मुसलमान कहते हैं वह किसी काफिर को भाई मान सकता है।

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