किसानों की आय दोगुनी करने के लिए नई नीतियां बनानी ज़रूरी

Devinder SharmaDevinder Sharma   26 Feb 2017 7:24 PM GMT

किसानों की आय दोगुनी करने के लिए नई नीतियां बनानी ज़रूरीदुख की बात है कि सबसे अधिक पैदावार और दुनिया की सबसे अधिक सिंचाई की ज़मीन होते हुए भी पंजाब में किसान के लिए आत्महत्या मज़ाक बन गई है।

इस समय जब पिछले कुछ सप्ताह से किसानों की आमदनी अगले पाँच वर्षों में दोगुनी करने वाली बहस भी दोगुनी रफ्तार से हो रही है, वहीं किसानों की लगातार हो रही आत्महत्या में कोई राहत नहीं है। किसान पांच साल धैर्य से इंतज़ार करने की बजाय अपनी जान ले रहे हैं।

कुछ दिन पहले कर्नाटक में हावेरी जिले के चिक्कमसिहोसुर गाँव का 58 वर्षीय एक किसान अपने गाँव के बाहरी इलाके में ट्रांस्फ़ार्मर पर चढ़ गया और बिजली के झटके से अपनी जान गँवा दी। वो पिछले दो साल से अपनी फ़सल के ख़राब होने के कारण तनाव में था और साहूकार, जिससे उसने कर्ज़ लिया था, उसे लगातार परेशान कर रहा था। उसके नाम सिर्फ़ तीन लाख रुपए का कर्ज़ था। पंजाब के मनसा इलाके में दो दिन के अंदर तीन किसानों ने आत्महत्या की। उनमें से एक 45 साल वर्षीय गुरजीत सिंह ने दो लाख रुपए बैंक और कमीशन एजेंट से लिए थे।

शायद ही कोई ऐसा दिन होगा जब मैंने देश के किसी भी कोने से किसानों की आत्महत्या का समाचार न पढ़ा हो और ये मुझे हैरत में डाल देता है कि क्यों ये किसान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच साल में आय दोगुनी वाले वादे पर विश्वास और भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। ना केवल प्रधानमंत्री यहां तक कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव, पंजाब मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, महाराष्ट्र मुख्यमंत्री देवेंद्र फ़डनवीस, इनके अलावा लगभग हर मुख्यमंत्री और पार्टी नेता ने समय–समय पर उन्हें आश्वासन दिया है कि सरकार उनके बचाव के लिए आएगी।

ना केवल चुनाव के समय में बल्कि समय–समय पर वित्तमंत्रियों ने सालाना बजट में किसानों का गुणगान किया है। मुझे अख़बार की वो सुर्खियां याद आती हैं जिनमें अरुण जेटली, पी चिदंबरम, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और प्रणब मुखर्जी द्वारा सालाना बजट देते हुए किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर ज़ोर दिया गया था। सवाल ये उठता है कि फिर किसान आए दिन बड़ी संख्या में आत्महत्या क्यों कर रहे हैं, अगर सालाना बजट और चुनावी वायदे किसानों के हित की बात करते हैं तो? क्या इसका मतलब ये नहीं है कि जहां आवश्यकता थी वहां वित्तमंत्री पूंजी का निवेश सही ढंग से करने में नाकामयाब रहे हैं? अब जब हम पिछले बजट निवेश को सही नहीं कर सकते तो क्या अब समय नहीं है कि वित्तमंत्री अरुण जेटली अपने बजट प्रस्ताव पर एक नई नज़र डालें , ये पता करने के लिए कि बजट प्रस्ताव निश्चित करने से पूर्व कहां उनके सलाहकारों और अर्थशास्त्रियों ने उन्हें गुमराह किया ?

एक ही चीज़ को ज़्यादा करना सही उत्तर नहीं है। न सिर्फ़ वित्तमंत्री मैंने पाया यहां तक कि पूरे देश के कृषि वैज्ञानिक भी खेती की आय को दोगुना करने के लिए वही तकनीकी प्रस्ताव बता रहे हैं । मैं देख रहा हूं कि किसानों की आय को दोगुना करने के तरीके वही हैं जो 20 साल या उससे पहले के हैं। नीति आयोग भी इसी बहस को अपने दोषपूर्ण आदेशों के साथ आगे बढ़ा रही है – फ़सल की पैदावार बढ़ाओ , कृषि की लागत को कम करो , सिंचाई को बढ़ाएं और राष्ट्रीय कृषि बाज़ार उपलब्ध कराया जाए । राष्ट्रीय कृषि बैंक एवं ग्रामीण विकास ( नाबार्ड) अपने साधन उन सातों क्षेत्रों में ही लगा रहा है जोकि पहले ही कृषि को संभालने में नाकाम हो चुके हैं । कृषि विश्वविद्यालय भी भूली प्रथाओं को निकाल कर आगे बढ़ने के लिए उन्हीं प्रथाओं को नए सिरे से पेश कर रहे हैं।

जब मैं देखता हूं कि नीति आयोग और नाबार्ड क्या प्रस्तावित कर रहे हैं तो समझ आता है कि क्यों किसान अपनी आमदनी दोगुनी होने के सरकार के वायदे पर भरोसा नहीं कर पा रहा है। नीति आयोग मुख्यत: कृषि में सार्वजनिक निवेश का प्रस्ताव कर रही है। इसका अवश्य स्वागत है। खासकर ऐसे समय में जब मनरेगा की सालाना लागत कृषि से कहीं ज़्यादा है पर किसानों की आमदनी को दोगुना करने का ये तरीका ग़लत होगा। आखिरकार शहर में बने बढ़िया आठ लेन वाले हाईवे, पुल और सुपर बाज़ारों का मतलब ये नहीं है कि नए शहरीकरण की इमारतें, नौकरी पेशा की आमदनी की क्षतिपूर्ति हैं। इसी तरह ये सोच लेना ग़लत है कि सिंचाई की सुविधा देना, तकनीकी और बाज़ार किसान की आय की क्षतिपूर्ति है।

यह स्पष्ट है कि नीति आयोग, नाबार्ड और कृषि विश्वविद्यालयों का उद्देश्य है किसानों की आय बढ़ाना और जिसकी सख़्त ज़रूरत है फ़सल की पैदावार बढ़ाना। फ़सल की पैदावार बढ़ाना ही किसानों की आय बढ़ाने का रास्ता है। ऐसा माना जाता है कि जितनी अधिक फ़सल की पैदावार होगी उतनी ही अधिक किसान की आय होगी। मेरे हिसाब से ये सोच ग़लत है।

पंजाब को ही लें जो देश का अन्न भंडार माना जाता है। पंजाब में 98 प्रतिशत सिंचाई की सुनिश्चित व्यवस्था है जोकि दुनिया की सबसे अधिक है। यहां तक कि अमेरिका में भी केवल 12 प्रतिशत अपने किसानों को सुनिश्चित सिंचाई की व्यवस्था है। आइए अब फ़सल की पैदावार को देखते हैं। पंजाब में गेहूँ की पैदावार 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है जोकि अमेरिका को मिला कर दुनिया की सबसे अधिक पैदावार है। चावल की खेती में पंजाब की पैदावार 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है जोकि चीन की सबसे अधिक पैदावार 67 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के समानतम है। इतनी ऊंची गेहूं और चावल की पैदावार और 98 प्रतिशत उपजाऊ ज़मीन, सुनिश्चित सिंचाई व्यवस्था के साथ पंजाब का किसान समृद्ध होना चाहिए।

दुख की बात है कि सबसे अधिक पैदावार और दुनिया की सबसे अधिक सिंचाई की ज़मीन होते हुए भी पंजाब में किसान के लिए आत्महत्या मज़ाक बन गई है।

शायद ही कोई दिन होगा जब पंजाब में किसान की आत्महत्या की ख़बर न हो। क्या इसका मतलब ये नहीं है कि किसानों की आय बढ़ाने की नीति बनाने वालों की नीति में भारी कमियां हैं? ये मुख्यत: इसलिए कि हर आपदा व्यापार का मौका बन जाती है। चल रहा कृषि संकट भी निवेश करने वालों के लिए व्यापार का मौका बन गया है – फ़र्टीलाईज़र , पेस्टीसाइड , बीज और औज़ार बनाने वालों के लिए अधिक पैसा बनाने का मौका। ग़लत नहीं है , लेकिन मैं नीति बनाने वालों से ये आशा करता हूं कि कृषि संबंधी कंपनियों के लाभ से ऊपर उठकर नीति बनाई जाएं।

शायद यही कारण है कि वो किसान जो आत्महत्या कर रहा है वो ये उम्मीद खो बैठा है कि अगले पाँच वर्षों में उसकी आय दोगुनी होगी। वे अगले पांच वर्षों का इंतज़ार नहीं कर पाए।

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके निज़ी विचार हैं।)

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