नेताओं की भाषा के निचले स्तर की शायद सीमा नहीं है

नेताओं की भाषा के निचले स्तर की शायद सीमा नहीं हैकिसी को तानाशाह कहना प्रजातंत्र में मान्य है झूठा कहना संसदीय भाषा नहीं है।

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने भारतीय जनता पार्टी को भारतीय जुमला पार्टी और उनकी ही पार्टी के नेता सतीश चन्द्र मिश्रा ने झूठ बोलो पार्टी कहा था यहां तक तो कठिनाई नहीं। लेकिन मायावती ने मोदी को दलित विरोधी बताते हुए उनके पिता की भी व्याख्या कर डाली।

उन्होंने नरेन्द्र का अर्थ बताया निगेटिव दामोदर दास का दलित और मोदी का आदमी। उन्हें यह तो पता ही होगा कि नरेन्द्र मोदी के नाम के साथ उनके पिता जी का नाम दामोदर दास जुड़ा है। व्याख्या कितनी सही है इसमें न जाकर यही कहा जा सकता है कि बाप-दादाओं तक जाने का प्रयास शायद पहली बार हुआ है।

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता राजेन्द्र चौधरी ने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को आतंकवादी कहा। आज़म खां ने अमर सिंह और दूसरे नेताओं के लिए अनेक विशेषण बोले जिनको सभी ने टीवी पर देखा होगा यह सब गरिमामयी नहीं कहा जा सकता। प्रचार के दरम्यान गुजरात के गधों की बात आई और कांग्रेस के पुराने नेता मणिशंकर अय्यर ने सांप से तुलना की इस बात का खुलासा वही कर सकते हैं जिसके लिए यह सब कहा गया लेकिन मैं समझता हूं यह प्रचार की गरिमा को घटाता ही है। इसके पहले मोदी ने बहुजन समाज पार्टी को बहनजी सम्पत्ति पार्टी कहा था और अमित शाह ने क से कांग्रेस, स से समाजवादी पार्टी और ब से बहुजन समाज पार्टी कहकर तीनों को मिलाकर ‘कसाब’ से मुक्ति की बात कही। ऐसी बातों से वोटर का कोई ज्ञान वर्धन नहीं होता बल्कि नेताओं की सोच का पता चलता है। दिग्विजय सिंह, केजरीवाल, लालू यादव की शब्दावली भी कोई ज्ञान वर्धन नहीं करती।

किसी को तानाशाह कहना प्रजातंत्र में मान्य है झूठा कहना संसदीय भाषा नहीं है। पिछली सरकार की कमजोर आर्थिक व्यवस्था से देश त्रस्त हो चुका था जिसे ठीक करने के लिए कड़कदार नेता चाहिए था। जब मोदी के आलोचक 2014 में उन्हें तानाशाह कहते थे तो भारत का नौजवानों ने इसे दुर्गुण नहीं माना। लोग इन्दिरा गांधी को इसलिए पसन्द करते थे कि उनमें निर्णय लेने की क्षमता थी, लागू करने का बूता था भले ही एक बार सचमुच की तानाशाह बन गईं थीं।

दिग्विजय सिंह जैसे लोगों ने 2014 में मोदी के लिए फेंकू, हत्यारा, मौत का सौदागर कह कर मोदी के रथ को आगे बढ़ा दिया था। ये आलोचक यह नहीं समझते कि भारत की जनता अभद्र आलोचना पसन्द नहीं करती। पिछले चुनाव में जब मोदी को साम्प्रदायिक कहा जाता रहा तो लोगों में जिज्ञासा बढ़ी ऐसे आदमी को देखने की जो साम्प्रदायिक तो है मगर जिसके शासन में 12 साल में कोई साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ। फिर भी मोदी का मनमोहन सिंह पर रेनकोट पहन कर नहाने वाला कटाक्ष ठीक नहीं था और मोदी द्वारा विदेशों में विरोधियों की आलोचना भी परम्परा के विपरीत रही है। मोदी के नारों में एक है ‘सबका साथ, सबका विकास’। इस पर भी ध्यान जाना चाहिए था क्या सह सार्थक सिद्ध हो रहा है। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने नारा दिया था ‘मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, वे कहते हैं इन्दिरा हटाओ, फैसला आप कीजिए’। शब्दबाण सही निशाने पर बैठे थे। भले ही बाद का इतिहास इसके अनुरूप नहीं रहा।

ऐसा नहीं कि सब की भाषा समान रूप से विषाक्त है। हाल के वर्षों में मुलायम सिंह यादव, नवीन पटनायक, चन्द्र बाबू नायडू द्वारा की गई आलोचना काफी शालीन रही है जबकि केजरीवाल हर किसी को चोर, लुटेरा, भ्रष्टाचारी और अपराधी कहते रहते हैं तब शिष्टाचार की बात नहीं सोचते। ममता बनर्जी की भाषा भी संयत नहीं है लेकिन वहां चुनाव नहीं हो रहे हैं।

राजनैतिक दलों को अपनी मंजिल शायद पता है लेकिन उसे हासिल करने का मार्ग कुछ भी उन्हें स्वीकार है। उनकी एक मात्र मंजिल है देश का खजाना और उसके लिए चाहिए कुर्सी। फिर उस कुर्सी के लिए कांग्रेस, जनता दल, समाजवादी और मुस्लिम लीग सब को एक साथ न आना पड़े तो भी चलेगा। महात्मा गांधी के नाम की माला जपने वालों को पता होगा कि गांधी जी ने कहा था कि मंजिल से अधिक महत्व है उसे पाने का रास्ता मार्ग। जो भी हो, देश की जनता का सामूहिक निर्णय हमेशा सही निकला है, आगे भी जनता पर भरोसा किया जा सकता है नेताओं पर नहीं।

sbmisra@gaonconnection.com

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