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बापू का प्रिय भजन सुना होगा, अब सुनिए उसके अमर रचयिता की कहानी

बापू का प्रिय भजन सुना होगा, अब सुनिए उसके अमर रचयिता की कहानी

क्या एक गीत किसी की जिंदगी का आधार बन सकता है, खासकर मोहनदास करमचंद गांधी जैसे महान व्यक्तित्व के जीवन का? आज बापू का मनपसंद भजन "वैष्णव जन" उनका पर्याय बन चुका है। पर कौन है इस गीत का रचयिता?

आजादी के बाद पैदा हुए हर शख्स ने अपने बचपन में ही "वैष्णव जन" की धुन जरूर सुनी होगी। गांधी जी और यह गीत लगभग साथ-साथ चलते हैं, एक की चर्चा हो और दूसरे का ख्याल न आए ऐसा हो ही नहीं सकता। फिर सवाल वही है, कौन है इस अमर गीत को रचने वाला? इस सवाल का जवाब देती है एक डॉक्युमेंट्री "गांधीज़ सॉन्ग", जो इस गीत के लेखक और 15वीं सदी के गुजरात में रहने वाले महान दार्शनिक कवि नरसिंह मेहता का परिचय हमसे कराती है।


नरसिंह मेहता की गिनती उन महान कवियों में होती है जिन्होंने वैष्णव कविता के लेखन की शुरूआत की। उन्होंने सैकड़ों गीत और छंद लिखे जिनमें दार्शनिक गहराई भी उतनी है जितनी काव्यात्मक ऊंचाई। वैष्णव जन नरसिंह मेहता के उन भजनों में से है जो उनके दर्शन को परिभाषित करता है, इसीलिए वह आज तक लोकप्रिय है और प्रासंगिक भी। यह भजन अपनी रचना के चार सदी बाद भी गांधी जी की प्रेरणा बना, उनकी दैनिक प्रार्थना का अभिन्न अंग बना। यह वह गीत है जो साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारत के स्वतंत्रतासंग्राम का सूत्रधार बना।

इस गीत ने निसंदेह गांधी जी के जीवन को बहुत हद तक प्रभावित किया। उनके सिद्धांत और विश्वास इसी गीत पर आधारित हैं: दूसरों की पीड़ा को समझो, अपने मन में अभिमान न आने दो, हर व्यक्ति को और हर वस्तु को बराबर समझो, लालच और लालसा का त्याग करो, सत्य बोलो, दूसरे की संपत्ति पर अधिकार मत जताओ इत्यादि।

पर बापू के जरिए लोकमानस में पुन: प्रतिष्ठित होने के कई दशक बाद इसी गीत ने वरिष्ठ पत्रकार मयंक छाया को मानसिक संबल प्रदान किया। बौद्ध धर्म गुरू दलाई लामा की जीवनी लिखने वाले मयंक छाया उस समय अमेरिका में मुश्किल दौर से गुजर रहे थे।

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इस गीत ने उन्हें प्रेरित किया और वह विशेषज्ञों की एक टीम लेकर गुजरात के लिए निकल पड़े, नरसिंह मेहता के जीवन को दर्ज करने के लिए। मयंक छाया ने नरसिंह मेहता पर एक डॉक्युमेंट्री लिखी जो वैष्णव जन के उस महान लेखक को जनमानस में फिर से स्थापित करने का एक सुंदर प्रयास है। मयंक इस डॉक्युमेंट्री के निर्माता, निर्देशक भी हैं।

लेकिन यह डॉक्युमेंट्री महज इस गीत, इसके लेखक या गांधी जी पर इसके प्रभाव के बारे में ही नहीं है। यह उन मूल्यों पर प्रकाश डालती है जो नरसिंह मेहता और महात्मा गांधी के समय में प्रचलित थे। यह डॉक्युमेंट्री उन तमाम मुद्दों को भी छूती है जिनका जिक्र इस गीत में हुआ और उन अमूर्त प्रभावों की भी व्याख्या करती है जिनकी वजह से यह गीत रचा गया होगा।

कई प्रख्यात गांधीवादी विद्वान और विशेषज्ञ एक घंटे से अधिक लंबी इस डॉक्युमेंट्री का हिस्सा हैं। इन्होंने इस गीत पर अपने विचार साझा किए हैं। इनमें से अधिकतर का कहना है कि यह गीत आज के जीवन की तमाम समस्याओं का समाधान सुझाता है।

मयंक छाया का यह प्रयास सार्थक पत्रकारिता और गंभीर शोध का परिणाम है। उन्होंने एक ऐसे विषय की ओर हमारा ध्यान खींचा है जिसकी तरफ दर्शक आसानी से आकर्षित नहीं होते। गांधीज़ सॉन्ग नाम की यह डॉक्युमेंट्री अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है और उनके मन-मस्तिष्क पर उन मूल्यों, संस्कारों और आदर्शों की छाप छोड़ जाती है जिन्होंने गांधी जी को प्रभावित किया था।

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