संवाद

मनरेगा से अपेक्षाएं बहुत थीं, लेकिन योजना प्रभावी नहीं रही

मनरेगा के अन्तर्गत अब गाँवों में काम नहीं चल रहा है, शायद इसलिए कि योजना प्रभावी नहीं रही। लेकिन इसका उपयोग बुन्देलखंड जैसे इलाकों में प्रभावी ढंग से किया जा सकता था जहां सचमुच काम की कमी है। यह सच है कि इसमें अनेक खामियां पाई गई थीं। इसकी आलोचना भारत के तत्कालीन ग्राम विकास मंत्री जयराम रमेश ने भी की थी। उनके अनुसार उत्तर प्रदेश में 2013-14 में केवल 24 प्रतिशत लोगों को रोजगार दिया गया और 100 दिन की गारंटी के विरुद्ध केवल 22 दिन का रोजगार दिया जा सका। समस्या केवल योजना को लागू करने की नहीं है बल्कि योजना खुद भी दोषपूर्ण है।

योजना का उद्देश्य था ग्रामीण आबादी की क्रय शक्ति बढ़ाना, मजदूरों का पलायन रोकना और उपयोगी संसाधनों का निर्माण करना। केवल 100 दिन का काम मिलता है और मजदूरी भी विलम्ब से मिलती है। मजदूरों का पलायन भी नहीं रुक सकता क्योंकि जब शहर में 300 रुपया प्रतिदिन या अधिक मजदूरी मिलती हो और पैसा रोज मिलता हो तो शहर भागना मजदूर के लिए अभी भी फायदे का सौदा है। मजदूर को मनरेगा में 150 दिनों तक 150 रुपया प्रतिदिन मिलता है तो उसकी अपेक्षा बढ़ चुकी होती है और वह बाकी के दिनों में भी 150 रुपए प्रतिदिन की उम्मीद करता है। गाँव के किसान इतनी मजदूरी नहीं दे सकते तो मजदूर कम पैसे पर काम पर जाता ही नहीं है। 

कितना अच्छा होता कि चाहे 100 रुपया प्रतिदिन मिलता परन्तु पूरे साल भर यानी 365 दिन काम मिलता तो उसे सालभर में मजदूरी मिलती 36500 रुपया। अभी 150 रुपया की दर से 150 दिन में मिलेगी 22500 रुपया। यदि 150 दिन तक मजदूरी मिल भी गई तो इससे ना तो क्रयशक्ति बढ़ेगी और ना ही कुपोषण दूर होगा। इसके विपरीत पैसे के लालच में ऐसे बच्चे भी मनरेगा में काम पर जा रहे है जिन्हें स्कूल में होना चाहिए था। ऐसा लगता है मानो हमारी सरकार गाँववालों को फावड़ा चलाने लायक ही समझती है और उनकी सन्तानों को भी इसी लायक बना रही है। दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा का कार्यक्रम केवल फावड़ा चलाने वाले करोड़ों मजदूर पैदा कर रहा है। इस योजना में केवल शारीरिक श्रम वाले कामों को रखा गया है। अब समय आ गया है कि इस अध्यादेश में बदलाव करके मानसिक श्रम वाले काम भी इसमें जोड़े जाएं। 

मनरेगा से गरीब तो खुशहाल नहीं हुए हैं उनके ग्राम प्रधान अवश्य सम्पन्न हो रहे है, कारें खरीद रहे हैं। कोई नहीं पूछेगा कि अचानक पैसा कहां से आया। मनरेगा में कुछ भी नया सीखने या करने की गुंजाइश नहीं है। मजदूरों के जीवन में कोई हुनर जुड़ने की गुंजाइश नहीं बनाई गई है। ऐसा भी नहीं कि समाज के लिए उपयोगी काम हो रहे हों। वृक्षारोपण और जल संचय के काम उपयोगी हो सकते थे परन्तु गाँव के लोगों की राय लेकर यदि किए जाते। गाँव के लोग ही बता सकते हैं क्या काम गाँव के लिए उपयोगी होंगे। उसमें शायद ग्राम प्रधान के लिए कुछ बचेगा नहीं इसलिए पुरातन काल से चले आ रहे और मालगुजारी के नक्शों में दर्ज तालाबों को ही खोद खरोंच कर तैयार कर दिया जाता है जब कि अपेक्षा थी नए तालाब खोदने की।

फावड़ा चलाने की क्षमता न रखने वाले लोग काम के अभाव में और प्रशिक्षण की कमी के कारण बेकार हो रहे हैं। गाँव के परम्परागत कारीगर जैसे बढ़ई, लोहार, राजमिस्त्री, सोनार, कुम्हार, मनिहार और माली जैसे लोगों के लिए काम नहीं है। क्या सरकार उनसे फावड़ा चलाने की अपेक्षा करती हैं। अनपढ़ मेहनतकश मजदूरों के लिए ही काम दिया गया है, शायद इसलिए कि उनका पैसा हड़पना थोड़ा आसान रहता होगा। तभी तो दिवंगत नेता राजीव गांधी ने कहा था कि एक रुपया में से केवल 15 पैसा गाँव के गरीब तक पहुंचता है। मजदूरों का जाबकार्ड प्रायः प्रधान के पास रहता है उसे अपनी हाजिरी तक का पता नहीं रहता। यदि शिक्षित बेरोजगारों को भी मनरेगा में सम्मिलित कर लिया जाता तो ना तो 85 पैसा बिचौलिए खा पाते और ना ही जाब कार्ड प्रधान के पास रहता। मनरेगा को प्रभावी बनाने के लिए इसे खेती से जोड़कर इसमें पूरी पारदर्शिता लानी होगी।