मनमोहन सिंह के सवालों का जवाब तो खोजना होगा

मनमोहन सिंह के सवालों का जवाब तो खोजना होगासाभार: इंटरनेट

देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विषय में यह कहना कि देखो सवाल कौन पूछ रहा है, सवालों से पलायन है। यह सच है कि उनके कार्यकाल में घोटालों की झड़ी लग गई थी और उन्हें मौनमोहन कहा जाने लगा था लेकिन उन्होंने गुरुवार को राज्य सभा में नोटबन्दी पर बहस के दौरान बहुत ही सटीक सवाल पूछा। सवाल है कि दुनिया में एक देश बता दो जहां जनता को बैंकों में जमा पैसा निकालने की मनाही हो। आप कालाधन निकालने के लिए नोटबन्दी करें या जो भी उपाय खोजें लेकिन बैंकों में जो सफ़ेद धन जमा है उसे निकालने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

मेरे स्कूल में मजदूर काम कर रहे हैं उन्हें मजदूरी का पैसा देना है। स्कूल का क्लर्क दो दिन तक कुम्हरावां, जिला लखनऊ के बैंक आफ़ इंडिया मे पूरे दिन लाइन में खड़ा रहा, बैंक मैनेजर ने अलाउ भी लिख दिया लेकिन पैसा नहीं निकाल पाया। तीसरे दिन जाता फिर चौथे दिन जाता कभी तो मिल ही जाएगा लेकिन इस प्रक्रिया में कितने दिन बरबाद हो रहे हैं इसका कोई हिसाब नहीं। आप कह सकते हैं चेक से भुगतान कर दों लेकिन उन मजदूरों के पास खाता नहीं है इसलिए उन्हें पैसा नहीं मिल पाएगा। मैं त्याग, बलिदान और पीड़ा सहने के उपदेशों से सहमत नहीं हूं क्योंकि यह युद्ध काल नहीं है।

सदन और उसके बाहर चल रही बहस नोटबन्दी की आलोचना नहीं बल्कि उसके लागू करने के तरीके और जनता को हो रही असुविधाओं को लेकर है। अब सरकार को कुछ समझ आई है कि नोट बदलने से सामान्य बैंकिंग का काम प्रभावित नहीं होना चाहिए था। यदि यह काम पहले कर दिया होता तो सड़कों पर इतनी बड़ी लाइनें नहीं बनतीं। एक तरफ़ सरकार ने नोट रफा-दफा करने के मौके और समय दिया दूसरी तरफ बैंकों का जो काम है वह बिगाड़ दिया। नोट बदलते समय जमा और निकासी एक साथ करने से काम की गति और भी मन्द हुई।

अभी तक तो हमारा देश दूर दराज़ के गाँवों में रहने वाला देश है और उन्हें भी नोटबन्दी का दर्द झेलना पड़ रहा है। पत्रकारों ने शहरों में सड़कों की तस्वीरें खींचकर दिखाईं लेकिन गाँवों का दर्द नहीं दिखाया। उन्हें यह बता दिया गया कि तुम चैन की नींद सो पाओगे और अमीर रोएंगे। यह सच्चाई नहीं है। रोएगा हमेशा गरीब ही। कैशलेस अर्थतंत्र के लिए अभी हमारा देश तैयार नहीं था और न है। समय बताएगा कि आपातकाल को लेकर जो खुशफ़हमी इन्दिरा गांधी को थी कहीं उसी प्रकार की सोच वर्तमान नेतृत्व का तो नहीं है।

आम आदमी को इसमें सन्देह नहीं कि मोदी के इरादे नेक हैं लेकिन स्वयं मोदी जी को यह सोचना है कि जिस मशीनरी ने कालेधन को जन्म दिया उसी से कालाधन मारने में आसानी नहीं होगी। ये वही बैंक हैं जिन्होंने विदेशों को पैसा भेजने में बड़े-बड़े धोखेबाजों की मदद की है, माल्या जैसों को बिना गारेन्टर अनेकानेक उधार दिए हैं। बैंक ऑफ बड़ौदा का एक प्रकरण पिछले साल ही सुर्खियों में रहा था। बिना बैंकों की मदद के विदेशी कालाधन जन्म ही नहीं ले सकता था। बड़ी संख्या में नए नोट जनता तक नहीं पहुंचे लेकिन ठगों और आतंकवादियों तक पहुंच चुके हैं। यह कैसे हुआ पता लगाना चाहिए। राम ने लक्ष्मण को रावण के पास भेजा था राजनीति के मंत्र जानने के लिए। यदि मनमोहन सिंह जैसे लोग विरोध पक्ष में हैं तो आर्थिक उदारीकरण को लागू करने और ईमानदार अर्थव्यवस्था काम चलाने में उनकी मदद लेने में अन्तर नहीं पड़ना चाहिए। यदि ज्ञानी लोगों के साथ सामान्य चर्चा और गोष्ठी की गई होती तो ऑपरेशनल भूलें नहीं होतीं।

sbmisra@gaonconnection.com

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