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पर्यावरण और देश के लिए पटाखों से करें तौबा

पर्यावरण और देश के लिए पटाखों से करें तौबाफोटो साभार: इंटरनेट

दीपावली और होली हमारे देश के सबसे बड़े त्योहार हैं और दोनों ही पर्यावरण विदारक हैं। दीपावली पर ध्वनि और वायु प्रदूषण से बचने के तीन तरीके हैं, हम देशभक्ति का परिचय दें और चाइनीज़ पटाखे खरीदें ही नहीं अथवा प्रान्तीय सरकारें वायु और ध्वनि प्रदूषण से बचने के लिए पटाखे दगाने पर रोक लगा दे अथवा मोदी सरकार चाहे तो पटाखों पर प्रतिबंध लगाकर पटाखों का आयात बन्द कर दे। चीन ने धमकी दी है कि पटाखों पर प्रतिबंध लगाने से द्विपक्षीय व्यापार पर बुरा असर पड़ेगा। बाजार का एक चक्कर लगाएं तो लगता है कॉम्पिटीशन होने वाला है कि ध्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण का सिरमौर कौन सा शहर रहेगा। किस शहर में पटाखों से आग लगेगी और कहां धुआं से किसी का दम घुटेगा। प्रतिबंध लगाने से वोट जाने का डर है, कोई सरकार जोखिम नहीं उठाएगी।

हमें ध्यान रखना चाहिए कि पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध हमारी संस्कृति से है और इसे बचाने के लिए भारतीय संस्कृति को बचाना होगा। स्वाधीनता आन्दोलन के समय जब विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई थी तो किसी ने अपना नफा नुकसान नहीं सोचा था। अब तो प्रदूषण अपनी सीमाएं पारकर चुका है, मिट्टी के कटान की गति तेज हुई है, कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि हो रही है, पर्वतीय क्षेत्र अस्थिर हैं, रोगाणुओं और विषाणुओं की निरन्तर वृद्धि से बीमारियां बढ़ रही है, मानव का अस्तित्व ही संकट में है। अब आजादी का नहीं अस्तित्व का सवाल है। हम त्योहारों पर पर्यावरण को हानि कभी-कभी पहुंचाते हैं लेकिन दैनिक जीवन में बराबर हानि पहुंचाते रहते हूं, इतिहास से भी नहीं सीखते।

प्राचीन सभ्यताओं के विलुप्त होने में मिट्टी, वन, जलप्रबन्धन, सिंचाई, मृदाअपक्षय आदि की बड़ी भूमिका रही है। मध्यपूर्व की बेबीलोन सभ्यता के समय सिंचाई की नहरों का जाल बिछा था, हरियाली, खुशहाली और सम्पन्नता थी। वहां की नहरें बालू मिट्टी से इसलिए भर गईं कि ऊंचे भागों में जंगलों का अत्यधिक कटान और इसके फलस्वरूप हजारों साल में बनी मिट्टी कुछ वर्षों में बह गई। इस प्रकार सीरिया, ईराक, लेबनान और तुर्की की भूमि और जलवायु की दुर्दशा के लिए स्वयं मनुष्य उत्तरदायी है। मध्ययुग में स्पेन एक समुद्री महाशक्ति बन गया था परन्तु जहाजों के बनाने में स्पेनवासियों ने इतने जंगल काट डाले कि स्पेन वीरान हो गया।

दुनिया के अनेक लोगों का मानना रहा है कि इस धरती पर जो कुछ नेमत परमेश्वर ने बक्शी है वह इंसान के लिए है, परमेश्वर का आदेश है कि इस धरती का शोषण करो क्योंकि केवल एक ही जीवन मिला है, सुख भोगने के लिए। इसके विपरीत हमारे मनीषियों का मानना था कि पृथ्वी पर हमें बार-बार आना है अतः इसे संजोकर रखना है। यही कारण है कि पर्यावरण बिगाड़ने में घनी आबादी और निर्धनता के बावजूद हमारे देश की बहुत कम भूमिका रही है। अपनी आवश्यकताओं को सीमित करते हुए जीवन यापन करने की भारतीय अवधारणा पर्यावरण संरक्षण में अत्यधिक सहायक हो सकती है। इतिहास का यही सन्देश है कि जो सभ्यताएं प्रकृति का संरक्षण करेंगी वही भविष्य में फलें फूलेंगी।

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