संकट में पाक लोकतंत्र, चुनौतियां हमारे लिए भी

संकट में पाक लोकतंत्र, चुनौतियां हमारे लिए भीप्रतीकात्मक तस्वीर।

पनामा गेट मामले में पाकिस्तान की सर्वोच्च अदालत की तरफ से आए फैसले के बाद सोशल मीडिया पर किसी ने लिखा था कि “प्रिय दुनिया........ ये एक नए पाकिस्तान की शुरुआत है।’’ प्रश्न यह उठता है कि क्या पाकिस्तान के लिए यह मामला बिल्कुल नया है, या इससे पहले भी भ्रष्टाचार के मामले सामने आ चुके हैं?

दूसरा यह कि भ्रष्टाचार पर जो भी कार्यवाहियां हुईं उनके अंतिम परिणाम किस प्रकार के रहे? इस विषय पर भी सोचना जरूरी है कि जो भी परिणाम आए उसके बाद पाकिस्तान की ‘पाॅलिटिकल डेमोक्रेसी’ या पाकिस्तान के ‘पाॅलिटिकल स्टैब्लिशमेंट’ का क्या हुआ? इस विषय पर भी विचार करना जरूरी है कि क्या इन बातों का भारत पर भी कोई प्रभाव पड़ा है या पड़ सकता है?

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28 जुलाई 2017 को पाकिस्तान की सुप्रीम अदालत ने पनामागेट मामले में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को दोषी करार दिया। पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय की पांच-सदस्यों वाली खंडपीठ ने ऐसा फैसला सुनाया कि नवाज शरीफ का राजनीतिक भविष्य अंधकारमय हो गया और पाकिस्तान के स्टैब्लिशमेंट के सामने बड़ी चुनौती पेश कर दी। पांचों जजों ने सर्वसम्मति से नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य करार दिया।

साथ ही, उन्हें पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) का अध्यक्ष पद छोड़ने के लिए भी कहा। पाकिस्तानी संविधान के अनुच्छेद 62 और 63 के आधार पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह कहते हुए सर्वसम्मत्ति से फैसला सुनाया कि नवाज शरीफ पाकिस्तानी संसद और अदालतों के प्रति ईमानदार नहीं रहे हैं, इसलिए वे प्रधानमंत्री पद पर नहीं रह सकते। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पाकिस्तान की अदालत ने नवाज शरीफ को जीवन भर के लिए प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य घोषित किया है।

अब यह बड़ा प्रश्न है कि अगला चुनाव होने तक सत्ता की बागडोर किसे सौंपी जाएगी? पाकिस्तान में पहले भी कई प्रधानमंत्रियों को पद से हटाया जा चुका है और कई प्रधानमंत्रियों ने खराब से खराब स्थितियों का सामना कर वापसी की है, लेकिन इससे पहले किसी भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार से जुड़े इस तरह के मामले में जनता और कानून का इतना दबाव नहीं पड़ा। इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नवाज शरीफ का सत्ता से बेदखल होना विशेष अर्थ रखता है।

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सवाल यह भी उठता है कि क्या यह परिवर्तन पाकिस्तान में डेमोक्रेटिक स्टैब्लिशमेंट के अनुकूल है? पाकिस्तान में एक लोकप्रिय नेता का सत्ता में न होना, दूसरे लोकतांत्रिक दल का कमजोर हैसियत में होना, क्या पाकिस्तान की सेना के लिए एक अवसर प्रदान नहीं करेगा? किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यहां दो बातों पर ध्यान देना जरूरी होगा।

प्रथम यह कि सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन की पूर्व अध्यक्ष असमा जहांगीर ने अदालती प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे ‘अस्वभाविक और अनुचित’ बताया। उनका कहना है कि जेआईटी द्वारा जमा की गई रिपोर्ट पर दोनों पक्षों की दलीलों को 3 जजों की बेंच ने सुना, लेकिन निर्णायक फैसला सुनाने के लिए 5 सदस्यों की खंडपीठ गठित की गई।

ऐसा क्यों? एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जेआईटी ने नवाज शरीफ पर एक साथ 15 मामले पुनः चलाने की सिफारिश की है। इन मामलों में तीन 1994 से 2011 के बीच के हैं जब पाकिस्तान में पीपीपी (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी) की सरकार थी और 12 जनरल परवेज मुशर्रफ के शासनकाल के हैं। पिछले मामलों पर अब कार्यवाही का क्या यह उचित वक्त है और यदि है तो परवेज मुशर्रफ पर क्यों नहीं?

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दूसरी बात यह कि सुप्रीम कोर्ट ने जो जेआईटी गठित की थी उसमें मिलिट्री इंटेलिजेंस को शामिल किया था जबकि पनामा लीक का मामला पूरी तरह आर्थिक अपराध का मामला था और आर्थिक अपराध के मामले में मिलिट्री इंटेलीजेंस की जरूरत ही नहीं थी। इससे साफ संकेत मिलता है कि सेना का पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायपालिका पर भी दबाव है और न्यायालय लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास नहीं जता रही है।

तब क्या यह मान लिया जाए कि सेना और न्यायालय दोनों ही यह नहीं चाह रहे थेे कि नवाज शरीफ अब और ज्यादा दिन प्रधानमंत्री के पद पर रहें। इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि नवाज शरीफ का पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के पद पर न होना भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है। हो सकता है कि आने वाले कुछ समय में ही इसका असर दिखे विशेषकर सुरक्षा मामलों में।

दरअसल सत्ता में परिवर्तन का सीधा सा अर्थ है कि इस्लामाबाद में नए ‘खिलाड़ी’ और नए मुद्दे होंगे। न केवल रक्षा बल्कि विदेश नीति और गवर्नेंस, तीनों ही रावलपिंडी की कमान के अधीन आ जाएंगे। पाकिस्तान में विदेश नीति पर सेना का प्रभाव तो रहता ही है लेकिन अब यदि गवर्नेंस पर भी उसका प्रभाव स्थापित हो गया तो यह भारत के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।

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वैसे नवाज शरीफ का प्रधानमंत्री के पद पर बने रहना या न बने रहना, भारत के इंटरेस्ट का विषय नहीं होना चाहिए। लेकिन यदि उसका प्रभाव भारत-पाकिस्तान संबंधों पर पड़ता हो तो स्वयं ही वह भारत के इंटरेस्ट का विषय बन जाता है। दरअसल नवाज शरीफ वर्तमान पाकिस्तानी राजनीति में मौजूद नेताओं के मुकाबले भारत के प्रति एक साॅफ्ट कार्नर रखते हैं। यही वजह है कि सेना के विरोध के बावजूद भी वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शपथ ग्रहण समारोह या भारत की साॅर्क कूटनीति का हिस्सा बने। उन्होंने उफा (रूस) में भारत को सहयोग करने और मुंबई हमले के मास्टर मांइड्स के वाॅयस सैम्पल देने पर सहमति दी। यह सब न ही पाकिस्तान की सेना को पसंद था और न पाकिस्तान के कट्टरपंथ को।

नवाज शरीफ का सही अर्थों में काउंट डाउन यहीं से शुरू हो गया था। विशेष बात यह है कि नवाज शरीफ भारत के साथ संबंधों का सामान्यीकरण न कर सकें, इसके लिए सेना स्वयं आगे आ गयी और स्वयं राजनीतिक बयान भी देने लगी। यही वजह है कि पाकिस्तानी आतंकियों पर नवाज शरीफ अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं, क्योंकि सेना उनके प्रति बेहद साॅफ्ट कार्नर रखती है।

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भारत की सेना द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राइक के बाद न केवल सेना एवं कट्टरपंथी जमात नवाज शरीफ को सत्ता से बाहर करने की रणनीति पर काम करने लगी बल्कि कुछ राजनीतिक दलों ने भी इसे एक अवसर के रूप में देखना शुरू कर दिया (विशेषकर इमरान खान की तहरीक ए-इंसाफ पार्टी एवं उनके सहयोगियों ने)। फिलहाल जो भी हो रहा है वह पाकिस्तानी पाॅलिटिकल स्टैब्लिसमेंट के विरुद्ध हो रहा है इसलिए गंभीरता से यी देखने की जरूरत होगी कि पाकिस्तान में नए परिर्वतन किस प्रकार के हुए हैं और उनका पाकिस्तानी स्टैब्लिशमेंट पर क्या प्रभाव पड़ेगा और वह भारत को किस प्रकार से प्रभावित करेगा।

(लेखक राजनीतिक व आर्थिक विषयों के जानकार हैं यह उनके निजी विचार हैं।)

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