संवाद

प्रजातंत्र में भटकता तंत्र

व्यवस्था की सबसे बड़ी व्यथा है कि वह व्यस्थापित नहीं हो पाती, एक तरफ जहां हर ओर शोर-शराबों के बीच जनहित से जुड़े मुद्दों को कही ठंड़े बक्से में समेट दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर मुद्दों का राजनीतिकरण कर उसकी महत्ता को भंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है।

पर विश्व के सबसे बड़े प्रजातंत्र में जहां प्रजा और तंत्र के बीच समावर्ती मेल-मिलाप की परिकल्पना की जानी चाहिए वहां ना तो कोई तंत्र है और ना प्रजा! इन सब के बीच अगर हम किसी को जि़म्मेदार करार दे तो वो भी खुद प्रजा ही है। बात लगभग दो साल पहले की है जब देश की आबोहवा में एक नाम को सरकार के तौर पर या यूं कहे भारत का भाग्यविधाता के तर्ज पर रखा गया तब ही किसी को सोचना चाहिए था आखिर एक इंसान की बदौलत इतना बड़ा तंत्र कैसे चलेगा? किसी  को पूछना चाहिए था कि आख़िर वो कौन सा मॉडल है जिससे देश के कायाकल्प होने की संभावनाएं थी।

ख़ैर ऐसा वादा पहली बार किसी पार्टी या गठबंधन ने नहीं किया पर इस बार की बात हर बार के धोखों को पाटने जैसी लगी थी तभी तो कहीं जा कर महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखण्ड के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर जैसी जगहों पर भी परचम लहरा गया। ना विचारधारा की परवाह ना मान-मरियादाओं का सम्मान, भूख बस सत्ता की नर्म कुर्सियों पर जमने जमाने की है चाहे वो पीडीपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन कर खुद पर साम्प्रदायिक होने का धब्बा कायम करना हो या बिहार में जंगलराज और विकास पुरुष का साथ आना ये सब राजनीति के बदलते सुर हैं। 

देश में अब संसद का मतलब है राजनीतिक अखाड़ा, जहां हर सदस्य अपने प्रतिद्वंदी को किसी तरह परस्त कर ये दिखा दे कि उसकी सरकार ने एक अंतराल में भारत के इतिहास ही बदल दिया है। बीते दो सत्रों में जिस तरह से सरकार और उसका रवैया रहा उस तरह से तो शायद ही भविष्यदृष्टा कही जाने वाली सरकार देश के भविष्य को संवार सकेगी। हाल फिलहाल के दिनों में योजनाओं की भरमार के साथ-साथ जिस तरह से धार्मिक असमानता को हवा मिली हैं शायद वो सत्ता दल के सम्प्रादायिक होने का परिणाम सिद्ध करती हो।

अब चाहे वो जाट आन्दोलन हो या राम मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद का हो या माता कही जाने वाली गाय पर जमकर एक दूसरे की कौमों पर पानी पी-पी कर कोसना हो, हर तरफ तंत्र का खुला मजाक उड़ाया जा रहा है। ऐसे परिवेश में आखिर जनता सवाल पूछे तो किससे? विश्वास करे तो किसकी मंशा पर करे वरना हरियाणा के जाटों की तरह घोषणा पत्र में आश्वासन दे कर दंगाइयों को न्योता देने का जोखिम भी इसी जनता को उठाना पड़ेगा!

बात स्पष्ट है अगर सरकार को बीते कुछ दिनों पर मरहम पट्टी लगनी है तो कम से कम अब साथ मिलकर एक-दूसरे की बात समझ कर बिना किसी राजनीतिक फ़ायदे के जनहित मुद्दों को लागू करें नहीं तो प्रजातंत्र की यही ताकत जिसने उसे अर्श से फर्श तक पहुंचाया उसकी दावेदारी अगले चुनाव तक मिट्टी में मिला देगी। जिस तरह से हर माहौल को राजनीति से जोड़ कर आपस में लड़ने का सामान बना लिया जाता है उससे नुकसान सत्ता पक्ष का भी है और विपक्ष का भी। अलबत्ता ये बात अलग है कि जवाबदेही में सत्ता पक्ष को खड़ा होना होता है पर विपक्ष का ये दायित्व होता है कि अपनी मर्यादा कायम रखते हुए सरकार को काम करने दे।

बीते दिनों संस्थाओं का बड़ा जोर-शोर से राजनीतिक लीपा-पोती की गई। किसी को कांग्रेसियों का गढ़ बताया गया किसी को वामदलों का अड्डा। और इन्ही सब के बीच देशद्रोह, राष्ट्र विरोधी जैसे आरोप भी लगे, सत्यता का पता मुझे भी नहीं है पर हां कही ना कही ये भी सही है कि विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी का दुरूपयोग भी किया गया है कहीं भारत विरोधी नारे लगे तो कोई दल उन्हें समझने या पूछने नहीं गया की आखिर ये सब कैसे हुआ? या ये पूछने की कोशिश नहीं की कि आखिर जिस संस्थान में ऐसी परिस्थिति बन गई उसका जि़म्मेदार कौन है? बल्कि इन सब से इतर हर बात को दंगों से या पकिस्तान से जोड़ कर जितना हो सके उसे साम्प्रदायिक बना देने की होड़ मची है।

गांधी हो या पटेल या फिर किसी भी विचारधारा के समर्थक या फिर किसी धर्म के अनुयायी हर विचार और धर्म आपस का समझौता सिखाता है ना की आन्दोलन और दंगों में जलाकर शहर के शहर बर्बाद कर दे! कोई उनका दर्द भी जा कर सुने की कूटनीति के खेल में जिस तरह से सरहदें बेबस हो जाती हैं, बच्चे अनाथ हो कर बदला लेने की मानसिकता को बढ़ाते है शायद ये प्रजातंत्र का आयाम नहीं है।

(लेखक के अपने विचार हैं।)