संविधान नहीं इंदिरा गांधी की देन है सेक्लुयर शब्द

संविधान नहीं इंदिरा गांधी की देन है सेक्लुयर शब्दभारत के अलावा दुनिया में कहीं भी सर्वधर्म सम्भाव नहीं है।

भारतीय राजनीति में जिन शब्दों का बिना सोचे समझे प्रयोग होता है वे हैं सेक्युलरवाद, धर्मनिरपेक्षता या पंथ निरपेक्षता। भारतीय मूल के धर्मों में यह बात समाहित है कि ईश्वर एक है और लोग विविध ढंग से ये कहते हैं। भारत के बाहर कहीं भी सभी धर्मों का बराबर आदर नहीं होता। इंग्लैंड में ईसाई धर्म का अपमान करने पर ही ईश निंदा की सजा मिलती है, इस्लामिक देशों में अपने बैग में हनुमान जी की मूर्ति या अन्य देवी देवता की मूर्ति अपने घर में नहीं रख सकते, लेकिन इस्लाम या इस्लामिक धर्मग्रन्थों का अपमान की क्या सजा है सब जानते हैं। भारत में भी कितने लोग हैं जो सचमुच सभी धर्मों को एक समान मानते हैं।

कुछ लोग सेक्युलरवाद को पंथनिरपेक्षता, धर्मनिरपेक्षता अथवा सर्वधर्म सम्भाव के बराबर मानते हैं परन्तु ऐसा है नहीं। भारत के अलावा दुनिया में कहीं भी सर्वधर्म सम्भाव नहीं है इंग्लैंड और अमेरिका में भी नहीं। भारत के संविधान निर्माताओं ने सेक्युलर शब्द नहीं डाला था। यह शब्द इंदिरागांधी की देन है।

कितना अच्छा होता कि दुनिया में हर जगह मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरुद्वारा और बौद्ध मठ बनाने की खुले दिल से इजाजत होती जैसे भारत में है। कितना अच्छा होता कि अफगानिस्तान में महात्मा बुद्ध की दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति न टूटती और कोणार्क तथा खजुराहो की मुर्तियां खंडित न की गई होतीं। कुछ लोग कहेंगे कि वहां सेक्युलर व्यवस्था होती तो यह सब नहीं होता। कुछ लोग सेक्युलरवाद को पंथनिरपेक्षता, धर्मनिरपेक्षता अथवा सर्वधर्म सम्भाव के बराबर मानते हैं परन्तु ऐसा है नहीं। भारत के अलावा दुनिया में कहीं भी सर्वधर्म सम्भाव नहीं है इंग्लैंड और अमेरिका में भी नहीं। भारत के संविधान निर्माताओं ने सेक्युलर शब्द नहीं डाला था। यह शब्द इंदिरागांधी की देन है।

वैसे हमारे नेताओं को सेक्युलर शब्द बहुत पसन्द है। ऐसा लगता है शायद वे इस शब्द का अर्थ जानने की ज़हमत नहीं करते। वेब्स्टर डिक्शनरी के अनुसार सेकुलरवाद ऐसे विचारों की व्यवस्था है जो हर प्रकार के धर्म या पूजा पद्धति को रिजेक्ट करती है। सम्भव है नेहरू जी व्यक्तिगत जीवन में सेक्युलर रहे हों क्योंकि उनके समय से ही यह शब्द हमारे देश में काफी चलन में आया। लेकिन हमारा देश तो दुनिया भर की तमाम पूजापद्धतियों को स्वीकार करता रहा है किसी को रिजेक्ट नहीं किया इसलिए कभी भी सेक्युलर नहीं रहा और न शायद कभी रहेगा। केवल साम्यवादी विचारधारा ही सेक्युलर हो सकती है।

हमारे नेताओं को सेक्युलर शब्द बहुत पसन्द है। ऐसा लगता है शायद वे इस शब्द का अर्थ जानने की ज़हमत नहीं करते। वेब्स्टर डिक्शनरी के अनुसार सेकुलरवाद ऐसे विचारों की व्यवस्था है जो हर प्रकार के धर्म या पूजा पद्धति को रिजेक्ट करती है। सम्भव है नेहरू जी व्यक्तिगत जीवन में सेक्युलर रहे हों क्योंकि उनके समय से ही यह शब्द हमारे देश में काफी चलन में आया।

हमारे देश में अनादि काल से अनेक मत मतान्तर रहे हैं और लोगों ने सब का सम्मान किया है। सभी को अपने ढंग से पूजा करने की आजादी थी और इसलिए हमारी व्यवस्था सेक्युलर नहीं थी यानी किसी भी पूजा पद्धति के प्रति हमारे मन में न तो दुराग्रह रहा और न किसी के प्रति पक्षपात की भावना।

सही माने में सेक्युलरवाद में पंथिक विचारों के लिए कोई स्थान नहीं होता और जब पंथ ही नहीं होंगे तो पंथनिरपेक्षता कैसी। पंथनिरपेक्षता यह मानती है कि ईश्वर अनेक रूपों में हो सकता है और उसकी प्राप्ति के लिए एक से अधिक पूजापद्धतियां सम्भव हैं। ऐसी सहनशीलता वहीं सम्भव है जहां मत-मतान्तर का सम्मान होता रहा हो और जहां इंसानियत का लम्बे समय तक विकास हुआ हो। भारत ने विदेशी धर्मों तक के लिए अपना दरवाजा खुला रखा, उनकी पूजा विधियों और पूजा स्थानों का सम्मान किया।

कई बार लोग कुछ इंसानों को इसलिए बर्दाश्त नहीं करते क्योंकि वे दूसरे ढ़ग से पूजा करते हैं, दूसरी पोशाक पहनते हैं आैर दूसरी भाषा बोलते हैं। विभाजन के समय लाहौर की आबादी ग्यारह लाख थी, जिसमें 5 लाख हिन्दू, 5 लाख मुसलमान ओर लगभग एक लाख सिख थे। विस्तार के लिए पियर एलिएट और काॅलिंस की पुस्ताक 'फ्रीडम ऐट मिडनाइट' का सन्दर्भ लिया जा सकता है। तो फिर कहां गई लाहौर की हिन्दू और सिख आबादी। अपने ही देश में कश्मीर घाटी में मात्र 2 प्रतिशत हिन्दू थे जिनका रहना भी सम्भव नहीं हो सका। क्या ऐसी जगहों पर कभी सर्वधर्म सम्भाव पनप सकता है। पश्चिमी देशों में मतान्तर को सहज स्वीकार नहीं किया गया। सुकरात को जहर पीना पड़ा, गैलिलियो को प्रताडि़त होना पड़ा और ईसा मसीह को शूली पर चढ़ना पड़ा। ऐसी विचारधाराओं से विकसित पंथ में अपने से अलग पूजा पद्धतियों को सम्भाव से कैसे देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए इंग्लैंड में धर्मनिन्दा अर्थात ब्लेस्फैमी की सजा तभी मिलती है जब कोई व्यक्ति ईसाई धर्म को अपमानित करता है। किसी मन्दिर अथवा मस्जिद को अपमानित करे तो उस पर यह कानून लागू नहीं होता। इंग्लैंड में ना तो सेक्युलरवाद है और ना सर्वधर्म सम्भाव अथवा पंथनिरपेक्षता है। अधिकांश ईसाई बहुल देशों में यही स्थिति है।

सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता, सर्वोपकार, विश्वबन्धुत्व जैसे गुणों का समावेश होने के कारण भारतीय चिन्तन कभी भी संकीर्ण नहीं हो सकता। जब एक भारतवासी कहता है 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' तो हिन्दू, मुसलमान, ईसाई सहित सभी उसमें सम्मिलित रहते हैं। जब वसुधैव कुटुम्बकम की बात कही जाती है तो कोई भी व्यक्ति उस कुटुम्ब से बाहर नहीं रहता। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय सोच में इंसान और इंसान में भेद नहीं है। प्राचीन भारतीय मानसिकता समन्वयवादी है इसीलिए कहीं भी भारतीय जाते हैं सहअस्तित्व में कठिनाई नहीं आती।

इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत सेक्युलर नहीं है क्योंकि यहां बहुत से पंथ और पूजा पद्धतियां हैं। किसी राज्य अथवा सरकार के लिए पंथनिरपेक्षता एक वांछनीय व्यवस्था है। राज्यों से अपेक्षा रहती है कि वे या तो आस्था के विषयों में किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप न करें अथवा सभी के प्रति सम्भाव रखते हुए सबके साथ एक जैसा व्यवहार करें। राजनेता अपनी सुविधानुसार किसी को सेक्युलर और किसी दूसरे को कम्युनल कह सकते हैं।

sbmisra@gaonconnection.com

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