संवाद

काले धन के बंटवारे में सिर फुटौव्वल भी होती है

पुराने जमाने में चोर नकब लगाते थे या डकैत डाका डालते थे और गाँव के बाहर एकान्त में लूटे गए धन का बंटवारा करते थे। बंटवारे के दरम्यान अनेक बार आपस में झगड़ा हो जाता था और आपस में मार काट भी कर देते थे, कभी कभी पकड़े भी जाते थे । आजकल जमाना बदल गया है। तमाम अधिकारी और कर्मचारी भ्रष्ट तरीकों से धन इकट्ठा करते हैं, उस पर सरकार को न टैक्स देते हैं और न उसे सार्वजनिक करते हैं। यह काला धन कहलाता हैं । बड़ी मात्रा में यह काला धन कई बार विदेशी बैंकों में जमा किया जाता है। मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए एसआईटी का गठन किया और 600 से अधिक ऐसे खाताधारकों के नाम अदालत में पेश किए। उसके बाद क्या हुआ यह प्रकाश में नहीं आया।

विदेशों से धन वापस देश में लाने की देरी के कारण काफी फहत हुई है क्योंकि एनडीए के कुछ नेताओं ने अति उत्साह में कह दिया था कि यदि काला धन वापस आ जाए तो प्रत्येक भारतीय के खाते में कई कई लाख रुपया जमा हो जाएगा। अब विरोधियों को ताना सुनाने का अच्छा मौका मिल गया। मोदी सरकार ने विदेशों में जमा काले धन के साथ ही स्वदेशी कालेधन पर भी प्रहार करने का निर्णय लिया है। काला धन स्वदेशी हो अथवा विदेशी, उसे सामने तो आना ही चाहिए। विदेशी कालाधन वहां की बैंकों में जमा कर दिया गया है लेकिन स्वदेशी कालाधन अलग अलग रूपों में अलग अलग जगहों पर दुबक कर बैठा है। पुराने जमाने में सोना चांदी के रूप में जमीन के अन्दर बिठा दिया जाता था, जमीन के अन्दर गड़े धन को राजा का डर नहीं रहता परन्तु डकैतों और चोरों का डर रहता है ।

हजारों मन्दिरों, मस्जिदों और गिरिजाघरों में अकूत सम्पदा मौजूद है वह भी काले धन की श्रेणी में आएगी। कहते हैं अंग्रेजों के डर से राजाओं ने अरबों खरबों रुपया पद्मनाभ मन्दिर में जमा कर दिया था जो आज भी विद्यमान है। यह भगवान का चढ़ावा नहीं है बल्कि जनता का पैसा है भगवान के संरक्षण में है। क्या इसका उपयोग जनकल्याण के लिए नहीं किया जाना चाहिए ? यही बात दूसरे धर्मस्थानों की सम्पदा पर लागू होगी ।

आजकल सर्वाधिक काला धन जमीन जायदाद के रूप में रहता है। कई बार बेनामी सम्पत्ति के रूप में। यही कारण है कि पिछले 40 साल में गाँवों की जमीन के दाम 400 गुना बढ़ गए हैं जब कि सोने के दाम केवल 150 गुना ही बढ़े हैं। जहां कालेधन का प्रवेश नहीं है वहां महंगाई भी नहीं है जैसे मजदूरी इसी अवधि में करीब 70 गुना और गेहूं करीब 30 गुना बढ़ा है। स्पष्ट है जहां काले धन की पैठ थी वहां महंगाई अधिक बढ़ी ।

गाँवों में अर्जित धन काला धन नहीं है क्योंकि खेती की आमदनी पर टैक्स नहीं बनता और अधिकतर किसान आयकर सीमा से अधिक कमाते भी नहीं। परन्तु राजनेता और अधिकारी रिश्वत और कमीशन के रूप में जो धन लेते हैं उस पर टैक्स नहीं देते इसलिए वह काला है। कभी कभी इन्कम टैक्स विभाग द्वारा कालेधन वालों से पूछा जाता है कि ज्ञात श्रोतों से अधिक धन आया कहां से परन्तु जांच पड़ताल की प्रक्रिया चुस्त नहीं है। जब पहली बार खुलासा होता है तो मीडिया में खूब धूम धड़ाका होता है परन्तु जब प्रकरण का निस्तारण होता है तो पता नहीं चलता कैसे हुआ ।

अभी तक टैक्स चोरी पर आर्थिक दंड भरने से काम चल जामा था । वैसे कुछ लोगों को सजाएं भी हुई हैं। एक केन्द्रीय मंत्री थे हिमाचल के रहने वाल सुखराम जिन्होंने अपने रजाई गद्दों और तकियों में करेन्सी नोट भर रखे थे क्योंकि तब विदेशों में धन जमा करना आसान नहीं था। कार्यपालिका और न्यायपालिका के अनेक लोग काले धन के लालच में पड़ चुके हैं और दंड भी झेला है। वास्तव में कालाधन रोकने के लिए पहले भ्रष्टाचार रोकना होगा जिसके लिए शासन प्रशासन द्वारा आदर्श स्थापित हो जिससे नीचे के लोग प्रेरित हों। यह आसान नहीं जब नेताओं में दौलत की भूख असीमित है।