इमर्जिंग इकोनॉमी की ओर निर्णायक कदम: यूपी इन्वेस्टर्स समिट 2018

इमर्जिंग इकोनॉमी की ओर निर्णायक कदम: यूपी इन्वेस्टर्स समिट 2018यूपी इन्वेस्टर्स समिट 2018

डॉ. रहीस सिंह

प्रतिस्पर्धी वैश्विक अर्थव्यवस्था में यह मायने नहीं रखता कोई भू-राजनीतिक इकाई कितनी बड़ी है या कितनी छोटी, लेकिन यह बात महत्व रखती है कि वह प्रतियोगिता की क्षमता रखती है या नहीं, वह अपने बराबर की आर्थिक शक्तियों को पीछे धकेलने में समर्थ है या नहीं, वह उदारवादी अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक खिड़कियों व दरवाजों को खोलने में दक्ष एवं सक्षम है या नहीं और वह अपने मानव पूंजी के लिए स्पेस निर्मित करने की योग्यता व क्षमता रखती है या नहीं।

हालांकि आज के दौर में इस संदर्भ सर्वाधिक जोर यह दिया जाता है कि बाहर से निवेश कितने आए हैं या फिर निवेशों के रूप में कितनी पूंजी आकर्षित हो पा रही है या नहीं, लेकिन सही मायने में यह विकास का स्थायी और निबल रूप से फल देने वाला रास्ता नहीं है बल्कि जरूरी है कि प्रत्येक आर्थिक इकाई सरप्लस उत्पादनों के लिए घरेलू निवेशों को बढ़ाने की कोशिश करे। हालांकि अभी इस तरह राजनीतिक स्थापनाएं दिखने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं या फिर उनके सलाहकारों का आई क्यू और सीक्यू एक साथ उस स्तर पर काम नहीं कर पा रहा है, जिस पर अपने संसाधनों से ही अपेक्षित विकास किया जा सकता है। अभी इसी पैटर्न का अनुसरण करते हुए हमारी उत्तर प्रदेश सरकार भी निवेश आकर्षित करने के लिए प्रयास कर रही है। इन्हीं प्रयासों का नतीजा है कि 21 से 22 फरवरी को होने वाली यूपी इन्वेस्टर्स समिट।

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औद्योगिक विकास को गति देने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नेतृत्व वाली सरकार 21 से 22 फरवरी तक ‘यूपी इन्वेस्टर्स समिट-2018’ का आयोजन करने जा रही है। सरकार के सूत्रों के अनुसार इस समिट में 1069 विदेशी निवेशकों, जिनमें अधिकांश प्रवासी भारतीय हैं, सहित देश के सैकड़ों उद्यमियों व पूंजीपतियों को आमंत्रित किया गया है। संभावना यह है कि इसमें विभिन्न क्षेत्रों से 5 हजार से ज्यादा डेलीगेट्स शामिल होंगे और एक लाख करोड़ रुपये निवेश के रूप में आ सकता है। इसमें तीन तीन पार्टनर कंट्री नीदरलैण्ड, मॉरीशस तथा फिनलैण्ड के उद्योगपतियों से इस समिटि में शामिल होने के लिए सहमति मिल चुकी है। शेष देशों के उद्योगपतियों की सहमतियों भी धीरे-धीरे मिल रही हैं। ध्यान रहे कि सरकार ने इन्वेस्टर समिट के लिए 11 फोकस सेक्टर्स सुनिश्चित किए हैं जिनमें सिविल एविएशन, आईटी, डेयरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, टूरिज्म, एमएसएमई, इन्फ्रास्ट्रक्चर, अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत, फिल्म, हैंडलूम टैक्सटाइल्स व एग्रो एंड फूड प्रोसेसिंग शामिल हैं। इन सेक्टर्स में पूंजी निवेश कराने की जिम्मेदारी 22 विभागों को सौंपी गयी है।

निवेश के लिए पूंजी के आमंत्रण का पहला प्रयास घर से किया जाना चाहिए, सम्भवतः इसी मंत्र को लेकर सरकार विभिन्न राज्यों के प्रमुख नगरों में रोड शो कर रही है ताकि उन प्रदेशों के उद्यमियों को प्रदेश की नीतियों, प्रदेश के संभावना वाले क्षेत्रों और प्रदेश की पोटैंशियल का बताया जा सके। इन्वेस्टर्स समिट के लिए निवेशकों को आकर्षित करने के लिए यूपी का इंडस्ट्री विभाग दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरू, हैदराबाद और अहमदाबाद जैसे शहरों में रोड शो कर रहा है। सरकार का उद्देश्य था कि अहमदाबाद में रोड शो के जरिए प्रदेश सरकार फार्मा, डायमंड और टेक्सटाइल इंडस्ट्री के उद्यमियों से मुलाकात कर उद्यमियों के समक्ष प्रदेश सरकार की नई योजनाओं के बारे में बताएगी। टेक्सटाइल और फार्मा की नई नीतियों में मिलने वाली छूटों से अवगत कराएगी।

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21 और 22 फरवरी 2018 को होने वाली इन्वेस्टर्स समिट में राज्य सरकार ने दोसे ढाई लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के निवेश की उम्मीद जताई है। अभी तक आयोजित हुए चार रोड शो में प्रदेश सरकार को लाखों करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव मिल चुके हैं। इसमें सबसे ज्यादा मुम्बई में हुए रोड शो में राज्य सरकार को प्रस्ताव मिले हैं। यूपी इनवेस्टर्स समिट रोड शो कोलकाता 7 जनवरी को सीआईआई द्वारा आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य 35000 करोड रुपये के प्रस्ताव प्राप्त करना था। यहां लगभग 25 इन्टरप्रेन्योर्स ने बी-2-जी मीटिंग में हिस्सा लिया। सबसे बड़ा निवेश होने का वादा श्रेया इन्फ्रा की तरफ से मिला जिसने अगले दो वर्षों में 25000 करोड़ रुपये का निवेश करने वचन दिया है।

कम्पनी बीओटी आधार पर शहरी इन्फ्रास्ट्रक्चर का अपग्रेडेशन एवं रोड निर्माण का काम करेगी। 2000 का निवेश बुंदेलखण्ड के मेगा सोलर प्लांट में अगले दो वर्षों में होगा। अहमदाबाद में रोड शो 18 जनवरी को हुआ ताकि यूपी को बिजनेस-फ्रेंडली निवेश गंतव्य बनाया जा सके। यहां की जिम्मेदारी उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा की थी। इवेंट ने 14 प्रमुख बिंदुओं पर फोकस किया जिसमें फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी, एमएसएमई, टैक्सटाइल, डेयरी और लॉजिस्टिक्स प्रमुख हैं। इससे पहले इंडस्ट्री डिपार्टमेंट दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद और मुम्बई में रोड शो कर चुका है। इस दौरान दिल्ली में 27 हजार करोड़ रुपये, बेंगलुरु में 6 हजार करोड़ रुपये, हैदराबाद में 11,500 करोड़ रुपये और मुम्बई 1.25 लाख करोड़ रुपये निवेश का वादा प्राप्त हुआ है। यदि उत्तर सरकार इतना या इससे ज्यादा निवेश आकर्षित करने में सफल हो जाती है, तो उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को अवश्य ही पंख लग जाएंगे।

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इन्वेस्टर्स समिट सफल हो इसके लिए मुख्यमंत्री ने हर जिले में उद्योगों की स्थापना को ध्यान में रखकर तैयारी का निर्देश दिया है। इसके लिए लैंडबैंक की जरूरत होगी। सभी कलेक्टरों को इस संबंध में निर्देश दिए जा चुके हैं। वार रूम की एक टीम कलेक्टरों से समन्वय कर लैंडबैंक की जानकारी अपडेट कर रही है। यही टीम औद्योगिक विकास प्राधिकरणों के लैंडबैंक की सूचना जुटाने के साथ उनके द्वारा इसे बढ़ाने के काम की भी मॉॅनीटरिंग करेगी। एक टीम यह पता लगा रही है कि कौन सा जिला किन-किन सेक्र्टर्स के लिए उपयुक्त है।

टीम जिले वार प्रोजेक्ट प्रोफाइल तैयार करेगी। इसमें संबंधित प्रोजेक्ट पर नई निवेश नीति के तहतकिस-किस तरह की सहूलियतें मिल सकती हैं, इसकी भी जानकारी होगी। निवेशकों को ये प्रोजेक्ट प्रोफाइल उपलब्ध कराए जाएंगे। वार रूम में फैसेलिटेशन डेस्क बनाया गया है। इसमें उद्योग बंधु अर्नेस्ट व यंग के अधिकारी जिम्मेदारी संभालेंगे। यह टीम किसी इन्वेस्टर के आते ही पता करेगी कि वह किस सेक्टर में निवेश करना चाहते हैं। आगे की प्रक्रिया इसके बाद यथाशीघ्र क्रियान्वित होगा। अर्थात सम्बंधित विभाग के अधिकारी, जिले के कलेक्टर व जरूरत हो तो आईआईडीसी व मुख्य सचिव से भी समय लेकर मुलाकात कराने का काम करेगी।

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कुल मिलाकर 21-22 फरवरी को होने वाली इन्वेस्टर्स समिट के लिए सरकार को 2.53 लाख करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव मिले हैं और ये योगी सरकार की बड़ी सफलता की प्रतीक मानी जा सकते हैं। मुख्यमंत्री योगी के इस प्रयास की सराहना इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि उत्तर प्रदेश मानव संसाधन की दृष्टि से देश का नाभिक है। यहां 19.98 करोड़ यानि समग्र भारत की लगभग 16.5 प्रतिशत आबादी निवास करती है।

जबकि इसका भारत के जीडीपी में लगभग साढ़े आठ प्रतिशत ही हिस्सा है। अब तक की प्रदेश की जो स्थिति है उसमें उसकी अर्थव्यवस्था में मुख्य रूप से तृतीयक क्षेत्र का वर्चस्व है जबकि दूसरे स्थान पर प्राथमिक। सही बात तो यह है कि ये दोनों ही क्षेत्र इस समय रोजगार पैदा करने में अक्षम हैं। इसलिए प्रदेश सरकार को यह देखने की जरूरत है कि प्रदेश की आर्थिक विकास की दर ही न बढ़े या जीडीपी का आकार मौद्रिक मूल्यों में ही न बढ़े, बल्कि लोगों की दीगर जिंदगी में भी कुछ अच्छा हो।

इसके लिए जरूरी है कि प्रदेश के उन क्षेत्रों में निवेश हो, जो प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनें साथ ही मानव संसाधनों के अवशोषण के स्पेस उत्पन्न करें। यूपी इनवेस्टर्स समिट के निष्कर्ष तक पहुंचने से कई माह पहले ही बुनियादी रूपरेखा औद्योगिक नीति के जरिए तय कर चुकी थी। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश औद्योगिक निवेश एवं रोजगार प्रोत्साहन नीति 2017, भारतीय एशियाई तथा वैश्विक स्तर पर आर्थिक गतिशीलता को देखते हुए राज्य की निहित शक्तियों का लाभ उठाने के साथ-साथ नई शक्तियों का विकास करते हुए अपनी अंतर्निहित कमजोरियों से निपटने का खाका तय कर लिया था।

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सरकार ने नीति बनाते समय यह सुनिश्चित किया था कि उसका लक्ष्य वर्तमान उद्योगों को स्थिरता प्रदान करने एवं अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के साथ-साथ औद्योगिक क्षेत्र में नए अंतरराष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय निवेश को आकर्षित करने एवं समझने के लिए एक ढांचा तैयार करने का है ताकि उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित किया जा सके।

इससे न केवल रोजगार सृजित होगा बल्कि प्रदेश के स्थायी समेकित तथा संतुलित आर्थिक विकास को बल भी मिलेगा। इस औद्योगिक नीति में जिन प्रमुख बिंदुओं पर फोकस किया गया है, वे हैं -प्रदेश में पूंजी निवेश को बढ़ाना; उद्योगों को गुणवत्तायुक्त अवस्थापना उपलब्ध कराना; व्यापार अनुकूल वातावरण बनाने के लिए व्यवसाय करने की सहजता को बढ़ावा देना; कुशल व अकुशल श्रमिकों के लिए अधिकतम प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार तथा स्व-रोजगार के अवसर सृजित करना; रोजगार की योग्यता एवं सशक्तिकरण सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश के कार्यबल को कुशल बनाना; सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को अग्र-सक्रिय सहायता प्रदान करना और युवाओं में नवाचार की भावना को बढ़ाना एवं उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करना। इस दिशा में उत्तर प्रदेश सरकार का जोर यह होगा कि मेक इन इण्डिया की तर्ज पर ‘मेक इन यूपी’को प्रोत्साहन दिया जाए और मेक इन इण्डिया का लाभ उठाया जाए। लेकिन अगर गम्भीरता से अध्ययन करें तो उत्तर प्रदेश जैसे विशाल आबादी या बाजार की भाषा में कहें तो विशाल बाजार वाले राज्य में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के आने के बाद मेक इन यूपी नीति की बजाय मेक फाॅर यूपी को ज्यादा तरजीह देनी चाहिए।

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जहां तक अधिसंरचनात्मक विकास की बात है तो सरकार इस दिशा में विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईज़ेड) की स्थापना को तरजीह दे रही है। उल्लेखनीय है केन्द्र सरकार द्वारा स्थापित नोएडा विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) तथा राज्य सरकार द्वारा स्थापित मुरादाबाद एसईजेड के अतिरिक्त, राज्य में कुल 19 एसईजेड अधिसूचित किए गए हैं। प्रदेश सरकार का उदेश्य एसईज़ेड योजना के अन्तर्गत सरलीकृत रुप मेंस्वीकृतियां प्रदान करना, विश्व-स्तरीय अवस्थापना प्रदान करना एवं निवेश को आकर्षित करने के लिए एक स्थिर वित्तीय व्यवस्था उपलब्ध करना है। मेक इन यूपी विभाग, विनिर्माण को बढ़ावा देने, रोजगार उत्पन्न करने, जीवन मानकों को बढ़ाने एवं राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय रुझानो के अनुरूप निरन्तर विकास करने के उद्देश्य से उद्योग एवं सेक्टर विशिष्टराज्य निवेश एवं विनिर्माण क्षेत्र (एसआईएमज़डे) को चिन्हित तथा सृजित करेगा।

अधिसंरचनात्मक दृष्टि से उत्तर प्रदेश सरकार का लक्ष्य, लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे जैसे प्रमुख एक्सप्रेस-वे तथा राज्य के प्रमुख मार्गं के नेटवर्क के आसपास आधुनिक उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप सबसे उन्नत बुनियादी ढांचे एवं उच्चतम सुविधाओं से सम्पन्न क्षेत्रों का निर्माण करना अर्थात नोएडा एवं गे्रटर नोएडा की तर्ज पर लखनऊ-कानपुर, कानपुर-इलाहाबाद तथा वाराणसी-इलाहाबाद क्षेत्र का विकास कर इन क्षेत्रों में औद्योगिक एवं निवेश क्षेत्रों तथा निजी औद्योगिक पार्कों को बढ़ावा देना। विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए ईडीएफसी के साथ-साथ औरैया-इटावा-कानपुर क्लस्टर, इलाहाबाद-वाराणसी क्लस्टर एवं आगरा-अलीगढ़ क्लस्टर सहित तीन एकीकृत विनिर्माण क्लस्टर (आईएमसी) को चिह्नितकिया गया है। औद्योगिक इकाइयों को निर्बाध कनेक्टिविटी तथा विश्व स्तर की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से डब्लूडीएफसी एवं ईडीएफसी लिंक के निकट दादरी-नोएडा-गाजियाबाद निवेश क्षेत्र को रणनीतिक रूप से विकसित किये जाने की योजना है।

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प्रदेश सरकार की दीर्घकालिक रणनीति होगी कि वायु, जल, सड़क एवं रेल नेटवर्क का एक संपर्क जाल (कनेक्टिविटी वेब) बनाया जाये, जो कि प्रदेश के उद्योगों तथा विनिर्माण इकाइयोंको, बिना किसी परेशानी के परिवहन के विभिन्न साधनोंके उपयोग से भारत एवं विदेशी बाजारोंमें उनके उत्पाद को पहुंचाने में, सहायता प्रदान करें। सड़क मार्ग विद्यमान लखनऊ आगरा एक्सप्रेस-वे, आगरा एवं लखनऊ को जोड़ता है तथा प्रस्तावित पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे, लखनऊ से गाजीपुर को जोडे़गा। प्रदेश सरकार की भविष्य में एक ऐसे सड़क गलियारे के निर्माण की मंशा है, जो मथुरा, काशी,झाँसी एवं गोरखपुर को जोड़ेगा जिससे सम्पूर्ण प्रदेश सड़क मार्ग से जुड़ जाएगा।

राज्य में 4 लेन एवं 6 लेन राजमार्गों का घना नेटवर्क भी है। सम्पूर्ण प्रदेश को आपस मेंबेहतर रूप से जोड़नेके लिए प्रदेश सरकार, पूरे राज्य मेंअधिक गुणवत्ता वाले 4 लेन तथा 6 लेन राजमार्गों को विकसित करेगी। यह नीति राज्य के बुनकरों एवं अन्य पारंपरिक कारीगरोंके औद्योगिक उत्पादों को बाजारों तक आसानी से पहुंचाना सुगम बनाएगी। मेगा निवेशों को प्रोत्साहन मेगा परियोजनाओं की स्थापना से गणक प्रभाव पड़ता है जो कि रोज़गार के निर्माण एवं समावेशी विकास के लिए आवश्यक हैं। राज्य में बडे़ उद्योगों का विकास एसएमई क्षेत्र में सहायक कम्पनियों को भी आकर्षित करता है, जिससे सकारात्मक प्रभाव पडत़ा हैं। प्रदेश सरकार इस दिशा में भी ठोस कदम उठाने की कोशिश कर रही है।

बहरहाल सरकार की भावी विकास की योजनाओं पर उंगली नहीं उठायी जा सकती, क्योंकि यह उत्तर प्रदेश कायापलट में बहुत हद तक समर्थ प्रतीत होती हैं। लैकिन ऐसा अवश्य लगता है कि नीतियों का निर्माण करने वाले अधिकारियों ने एक परम्परागत खाके के ऊपर ही पेंसिल फेराई है। आज का दौर आत्म निर्भरता और स्वनिवेश का है। प्रदेश में बहुत अधिक निवेश आने की उम्मीदें बहुत नहीं हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश के विकास का मूल आधार दो स्तम्भों पर टिकाने की जरूरत है। प्रथम अपने संसाधनों पर विकास का कार्यक्रम और ‘मेक इन यूपी’ की बजाय‘मेक फॉर द यूपी’ पर फोकस।

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