क्या भ्रष्टाचारियों पर अदालती निर्णय लगा पाएगा नकेल?

क्या भ्रष्टाचारियों पर अदालती निर्णय लगा पाएगा नकेल?आय से अधिक संपत्ति मामले में आया अदालती निर्णय क्या भ्रष्ट नेताओं को काबू में कर पाएगा?

कल्पना शर्मा

आय से अधिक संपत्ति मामले में आया अदालती निर्णय क्या भ्रष्ट नेताओं को काबू में कर पाएगा? वहीँ तमिलनाडु की शशिकला मुख्यमंत्री बनते-बनते सलाखों के पीछे पहुंच गईं। ऑल इंडिया अन्ना द्रविड मुनेत्र कड़गम की स्वर्गीय नेता जे जयललिता की खासमखास रही वीके शशिकला के भविष्य में तब से ही मीडिया और तमिलनाडु के लोगों को अटकलें लगाने पर मजबूर कर दिया जब जयललिता का निधन 5 दिसंबर, 2016 को हुआ था।

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अटकलों का दौर 14 फरवरी को खत्म हुआ। इसी दिन सर्वोच्च न्यायालय ने दो दशक पुराने आय से अधिक संपत्ति मामले में जयललिता, शशिकला और उनके दो रिश्तेदारों, वीएन सुधाकरण और जे इलावरसी को दोषी करार दिया।

मीडिया पूरी तरह से राजनीतिक घटनाक्रम के कवरेज में ही लगा रहा और यह बताता रहा कि कैसे शशिकला ने विधायकों को एक रिसोर्ट में रखा हुआ है। इसकी वजह से आय से अधिक संपत्ति का मामला चर्चा में पीछे रहा। हालांकि, सर्वोच्च अदालत के फैसले की टाइमिंग को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं लेकिन इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि यह एक अहम फैसला है।

इस मामले में सितंबर, 2014 में ट्रायल कोर्ट का निर्णय आया था। इसमें इन सभी लोगों को दोषी करार दिया गया था। इस फैसले को 11 मई, 2015 को कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पलट दिया था। इसी फैसले के खिलाफ अपील उच्चतम न्यायालय में दायर की गई थी। सर्वोच्च अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को पूरी तरह से बरकरार रखा। अदालत ने यह कहा कि भले ही मुख्य अभियुक्त जयललिता की मृत्यु हो गई है लेकिन शशिकला समेत बाकी के तीन अभियुक्तों को चार साल की कैद काटनी होगी और दस करोड़ रुपए बतौर जुर्माना देना होगा।

न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष और अमिताव रॉय ने 570 पन्नों को जो फैसला दिया है, उसमें इस बात का विस्तार से उल्लेख है कि कैसे आय से अधिक की संपत्तियों को छुपाया जाता है। इसमें उन सबूतों का जिक्र किया गया है जिनके आधार पर ट्रायल जज जॉन माइकल डिकुन्हा इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि जयललिता ने आय से अधिक की अपनी संपत्तियों को छुपाने के लिए शशिकला और उनके रिश्तेदारों का इस्तेमाल किया। तरीका कोई नया नहीं था।

भारत में भ्रष्ट तरीके से अर्जित संपत्ति को छुपाने के लिये लोग ऐसा ही करते आए हैं। इस मामले में 34 कंपनियों को एक ही पते पर पंजीकृत कराया गया था। 10 को एक दिन और छह को एक और दूसरी तारीख पर पंजीकृत कराया गया था। इन कंपनियों के लिए 50 बैंक खाते खोले गए थे। इनमें से 47 एक ही बैंक में थे। इन कंपनियों का एक ही काम था। वो यह कि ये सभी कंपनियां जानबूझकर कम कीमत लगाई गई संपत्तियों को खरीद रही थीं। एक खाते से दूसरे खाते में पैसे भेजे जा रहे थे। बैंकों से कर्ज लेकर उन्हें देनदारी में तब भी दिखाया जा रहा था जब कर्ज का पैसा भी बैंकों ने जारी नहीं किया था। जितने खुलेआम तरीके से ये काम किए जा रहे थे, उससे यही लगता था कि इसमें शामिल लोगों को इस बात यकीन था कि कभी पकड़े नहीं जाएंगे।

जून, 1996 में यह मुकदमा सुब्रमण्यम स्वामी ने दायर किया था। लंबे समय बाद ही सही लेकिन इस मामले में जो निर्णय आया है, वह एक परंपरा स्थापित करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के जज सीआर कुमारस्वामी के निर्णय को यह कहते हुए खारिज किया कि सबूतों की गलत व्याख्या की गई और संपत्ति के हिसाब लगाने की पद्धति गड़बड़ थी।

ट्रायल कोर्ट ने 1 जुलाई, 1991 से लेकर 30 अप्रैल, 1996 तक जयललिता की संपत्तियों की जांच की थी। सबूतों के आधार पर अदालत में यह बात स्थापित हुई कि जयललिता की संपत्ति 2.01 करोड़ रुपए से बढ़कर 64.44 करोड़ रुपए हो गई। स्वभाविक तौर पर यह आय से अधिक का मामला दिखता है। ट्रायल कोर्ट ने सभी तथ्यों की बारीक और न्यायपूर्ण जांच के बाद जो निर्णय दिया था, उसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा माना जाना बेहद अहम है। यह एक ऐसा उदाहरण है जिससे पता चलता है कि ताकतवर लोगों के खिलाफ अदालतें कार्रवाई कर सकती हैं।

ट्रायल कोर्ट के इकलौते जज ने दबावों के आगे नहीं झुकने का रास्ता चुना। इस जज ने जो निर्णय दिया है, उसे पढ़ा जाना चाहिए। मामले को तमिलनाडु से हटाकर कर्नाटक भेजने का भी लाभ मिला। इस निर्णय में इस बात को भी बताया गया है कि आखिर क्यों जनसेवकों को मिले उपहारों को आय के स्रोत के तौर पर नहीं दिखाया जा सकता। जयललिता ने ऐसा करने की कोशिश की थी। निर्णय में इसे अप्रत्यक्ष घूसखोरी बताया गया है। निर्णय में यह भी कहा गया है कि ऐसे उपहारों की घोषणा कर देने भर से इसे कानूनन आय नहीं कहा जा सकता।

इस सवाल का जवाब मिलना अभी बाकी है कि क्या यह निर्णय जनसेवकों को भ्रष्टाचार में लिप्त होने से रोक पाएगा। इस निर्णय से यह बात स्थापित होती है कि भ्रष्टचार निरोधक कानून के कठोर प्रावधान या अन्य कानून तब ही प्रभावी होंगे जब भ्रष्टाचारियों के खिलाफ इन कानूनों के इस्तेमाल करने वाले नागरिक सक्षम होंगे। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जितनी जटिल कानूनी प्रक्रिया भारत में है और जितना अधिक वक्त अंतिम निर्णय आने में लगता है, उससे भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों की लड़ने की क्षमता कुंद पड़ जाती है।

(लेखक इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली की सलाहकार संपादक हैं। यह इनके निजी विचार हैं।)

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