क्या नेताजी शालीनता से अखिलेश को कमान सौंपेंगे?

क्या नेताजी शालीनता से अखिलेश को कमान सौंपेंगे?अखिलेश यादव।

उत्तर प्रदेश के यदुवंशियों ने जब ताल ठोंकी तो अधिकतर लोगों ने सोचा यह नूरा कुश्ती होने जा रही है। लेकिन जब तीर चलने लगे और महारथी घायल होने लगे तो सब को यकीन होने लगा यह संघर्ष नहीं रण है। शिवपाल यादव और उनके साथी पैदल हो गए तो लगा नेता जी ही संभाल सकते हैं। नेता जी ने शिवपाल यादव को रथ और सारथी वापस दिलाए और साथ ही पार्टी की प्रदेश इकाई की कमान भी मिली अखिलेश यादव से पार्टी अध्यक्ष का पद छिन गया। शिवपाल यादव के चेहरे पर मुस्कान थी और अखिलेश यादव के सीने में ज्वालामुखी। शिवपाल यादव पहला राउंड जीत चुके थे।

नेता जी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं दिखे जब उन्होंने कहा मुख्यमंत्री का फैसला करेंगे चुने हुए विधायक। जब अखिलेश ने चारों तरफ अपनों को देखा तो शायद महाभारत के यदुवंशी अर्जुन की तरह हथियार डाल सकते थे लेकिन कृष्ण की भूमिका में आ गए रामगोपाल यादव। उनका कहना है विजय वहीं होगी जहां अखिलेश हैं यानी अखिलेश यादव अर्जुन की भूमिका में आ गए। अखिलेश ने शिवपाल यादव को फिर विरथ कर दिया और उनके अनेक साथी भी मिनिस्टर से जमीन पर आ गए। इस बार अखिलेश यादव समझौता के मूड में नहीं थे। अखिलेश यादव ने दूसरा राउंड जीत लिया था।

शह और मात का खेल चलता रहा और अन्ततः अखिलेश ने सम्भावित प्रत्याशियों की सूची नेता जी थमा दी, नेता जी ने अखिलेश औरी रामगोपाल को पार्टी से निकाल दिया। शक्ति परीक्षण का दौर चला जिसमें नेता जी का पक्ष बेहद कमजोर दिखा। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म खां ने आखिरी दम दक समझौते की उम्मीद नहीं छोड़ी और अखिलेश यादव तथा रामगोपाल यादव का निष्कासन वापस करा दिया। आज़म खां अखिलेश के खेमें में दिखाई पड़े क्योंकि अमरसिंह के प्रति अखिलेश का आक्रामक रवैया आजम खां को पसन्द आया होगा। चाहे नूराकुश्ती हो रही है लेकिन लगता है फ़ाइनल राउंड अखिलेश का ही होगा जब वह पहली जनवरी को प्रतिनिधि सभा में अपनी बात रखेंगे।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मीडिया के अनुसार समझौता के लिए अपनी शर्तों पर तैयार हैं जैसे शिवपाल यादव को प्रान्तीय अध्यक्ष पद से हटाया जाना, रामगोपाल यादव को उनके पद पर बहाली, अमर सिंह को पार्टी से बाहर करना, बाहुबलियों के टिकट काटना, अखिलेश को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाना आदि। यह सब करना मुलायम सिंह यादव के लिए अब कठिन होगा इसलिए पहली जनवरी को बुलाई गई प्रतिनिधि सभा को यदि नेता जी मान्यता दे दें और ये सारे काम जो अखिलेश यादव चाहते हैं उन्हें ही करने दें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर।

अमरसिंह और शिवपाल यादव ने सोचा नहीं होगा कि अखिलेश और रामगोपाल यादव नेता जी की बात नहीं मानेंगे। मानते भी कैसे जब पार्टी में इतना प्रबल समर्थन प्राप्त है और संगठन तथा सरकार चलाने का अनुभव भी उनके पास है। उधर मुलायम सिंह जुझारू और हठी नेता के रूप में जाने जाते हैं लेकिन अब उनमें न तो पुरानी ऊर्जा बची है और न पहले वाली प्रखर सोच अन्यथा निष्कासन करने और वापस करने के दौर न चलते। उन्होंने 5 साल पहले अखिलेश यादव के हाथ में प्रदेश की बागडोर सौंप कर एक प्रकार से यह बात स्वीकार कर ली थी। बेहतर होता यदि शालीनता से पार्टी की बागडोर भी सौंप देते और स्वयं मार्गदर्शन करते।

उत्तर प्रदेश चुनावों के सन्दर्भ में अखिलेश यादव का सोचना है कि पांच साल तक किए गए कामों की जवाबदेही उनकी बनती है इसलिए मुख्यमंत्री का चेहरा सामने रहना चाहिए। वह इसे पिता के खिलाफ़ बगावत नहीं मानते अपना दायित्व मानते हुए दिखते हैं। उन्होंने कहा भी कि चुनाव जीतकर नेता जी के सामने पेश करूंगा। मुझे लगता है नव वर्ष में राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नेता जी का आशीर्वाद लेने यदि जाएं तो सहर्ष कमान सौंप देनी चाहिए।

शिवपाल यादव और अमर सिंह को पार्टी में अपनी हैसियत पता चल गई होगी और नेता जी भी हकीकत जान गए होंगे इसलिए उन्होंने अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव के निष्कासन आदेश वापस ले लिए हैं। निष्कासन वापसी के बाद अखिलेश की लिस्ट और शर्तें मानने के अलावा नेता जी के पास कोई विकल्प नहीं बचा है। विपक्षी लोग जरूर कहेंगे नूरा कुश्ती हो रही है और यह सब नाटक था। आम आदमी के पास यह जानने का कोई उपाय नहीं कि वास्तविकता क्या है लेकिन यदि इस पूरे प्रकरण के बाद कुछ दागी चेहरे मैदान से बाहर हो जाएंगे तो इसे उपलब्धि कहा जाएगा।

sbmisra@gaonconnection.com

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