संवाद

देश की 50 प्रतिशत जनता पानी के लिए परेशान, लेकिन ये चुनावी मुद्दा नहीं

इस साल 15 जनवरी से चंडीगढ़ के पास नामी सुखना झील को भरने के लिए सात ट्यूबवेल चालू किए गए। इससे लगभग एक करोड़ लीटर भूमिगत जल पानी निकाला जाएगा जोकि 14,000 परिवारों या 70,000 लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काफ़ी होगा।

सुखना झील जो भूमिगत जल खींचेगी वो साधारणतया चंडीगढ़ के सेक्टर 19, 20, 26, 28, 29 और 30 में रहने वाले लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए है। वहीं चंडीगढ़ प्रशासन भी लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रहा है। शिवालिक पहाड़ियों से झील में आने वाले पानी का संरक्षण करने में प्रशासन पूरी तरह से विफ़ल रही है। इससे ज़्यादा पागलपन नहीं हो सकता। झील को ट्यूबवेल से भरने का फ़ैसला दिखावटी मूल्य रखता है, ज़मीन का पानी कम हो रहा है। इस संकट को पूरी तरह से अनदेखा किया जा रहा है। ऐसे समय में इसका महत्व अधिक है जब केंद्रीय भू-जल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) लुधियाना, दिल्ली, फ़रीदाबाद, जयपुर और बृहत्तर मुंबई शहरों में चार मीटर तक भू-जल के स्तर की कमी की ओर इशारा कर रही है। दूसरे शहरों की भी स्थिति इससे बेहतर नहीं है। 2002 और 2011 के बीच पानी के स्तर में इन दस वर्षों में तेज़ी से गिरावट आई है।

देश के 308 जिले ऐसे हैं जो पीने के पानी की कमी की जकड़ में हैं। इसका मतलब है कि देश के लगभग 50 प्रतिशत लोग पीने के पानी की गंभीर समस्या से गुज़र रहे हैं। 

अधिकतर शहरों या नगरों में भू-जल का बेरहमी से किया जा रहा शोषण संकटपूर्ण स्थिति में है। पंजाब के औद्योगिक शहर लुधियाना को ही ले लीजिए, हर साल पानी की सूची 1.08 मीटर की दर से गिर रही है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि नई दिल्ली धूल से भरी बहुत बड़ी जगह बन जाएगी। गुरुग्राम सेज़ (SEZ ) को अपने पानी जुटाने के साधनों का इंतज़ाम अपने आप करने का निर्देश दिया गया है। अहमदाबाद, हैदराबाद, कोलकाता आदि शहरों में भी परेशानी बढ़ती जा रही है। घरेलू, औद्योगिक और बुनियादी ढांचे में लगातार बढ़ रही पानी की ज़रूरत को पूरा करने के लिए दूसरे क्षेत्रों के गहरे जल-स्त्रोतों पर कब्ज़ा किया जा रहा है।

पिछले वर्ष ही देश के कई हिस्सों में पानी के लिए त्राहिमाम मच गया था। फोटो- विनय गुप्ता

आगे आने वाले समय में बढ़ते जल-संकट को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय सरकार ने 2016-17 के बजट में एक साल के अंदर पांच लाख गाँवों में तालाब और कुएं बनाने का लक्ष्य रखा है। खेतों में तालाब बनाना, बारिश के पानी का संरक्षण करना, यह ठीक है कि भविष्य में भू-जल के स्तर को बढ़ाएगा लेकिन विभिन्न क्षेत्रों से रिपोर्ट आ रही है कि किसान कुओं या बोरवेल से ही पानी खींच कर तालाब भर रहे हैं। बिल्कुल यही चंडीगढ़ प्रशासन भी सुखना झील को भरने के लिए कर रहा है । दूसरा, पानी के रिसाव को रोकने के लिए प्लास्टिक की मोटी चादर का इस्तेमाल किया जाता है जिससे रिसाव तो रुकता है लेकिन ज़मीन में पानी नहीं भरता।

इससे जिस उद्देश्य के लिए तालाब बनाए गए हैं उसकी पूर्ति नहीं होती। हिंदुस्तान टाइम्स में 27 फ़रवरी के एक लेख में शशि शेखर हमें बताते हैं कि पानी का संकट कितना गंभीर होता जा रहा है। 2016 के संसद में उठाए प्रश्न के उत्तर में उस समय के जल और स्वास्थ्य राज्यमंत्री राम कृपाल यादव ने कहा था कि देश के 308 जिले ऐसे हैं जो पीने के पानी की कमी की जकड़ में हैं। इसका मतलब है कि देश के लगभग 50 प्रतिशत लोग पीने के पानी की गंभीर समस्या से गुज़र रहे हैं। वो आगे कहते हैं कि आरटीआई के जवाब के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने चार साल पहले ये माना कि दस वर्षों में 4020 जल साधन सूख चुके हैं।

अकेले बांदा जिले में 33,000 हैंडपंप में से 35 प्रतिशत हैंडपंप सूख चुके हैं। दुख की बात ये है कि तब भी जल संरक्षण चुनावी मुद्दा नहीं है। गाँवों के खाली होने का बुनियादी कारण पानी की कमी है। पानी की भारी कमी ही बड़ी संख्या में हो रहे पलायन का कारण है। हाल ही में बैंगलोर यात्रा के दौरान मुझे ये बताया गया कि शहर से 35 किलोमीटर दूर स्थित गाँव में पानी की भारी कमी के कारण ग्रामीण लोगों के पास पलायन कर शहर में आने के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं था। केवल कर्नाटक ही तीन साल से सूखे का सामना नहीं कर रहा है बल्कि यह पूरे देश की समस्या है जो जनसंख्या में बदलाव ला रहा है। देश की 50 प्रतिशत जनसंख्या के साथ, जिसका मतलब है 60 करोड़ लोगों की भीड़ 2030 तक शहरों में बढ़ जाएगी, हर घर में पानी मुहैया कराना बहुत बड़ा उद्देश्य होगा जिसमें व्यापार और उद्योग की रोज़मर्रा ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ किया गया है।

यह कार्य बहुत बड़ा रूप धारण कर चुका है ये जानते हुए कि अधिकतर साधन प्रदूषित हो चुके हैं और बड़ी छोटी नदियां गंदे नालों में परिवर्तित हो चुकी हैं। हाल ही में एनजीटी के बयान के अनुसार इतने बड़े स्तर पर निवेश और समस्या के बावजूद एक बूंद भी गंगा का पानी साफ़ नहीं किया गया है, हालांकि पूर्वानुमान आशा से बहुत दूर है। सीजीडबल्यूबी द्वारा बनाई गई एटलस के हिसाब से भारत की जल प्रणाली पूरे देश के 42 मुख्य पानी के स्रोतों में पानी की स्थिति को दर्शाता है। जब कि ये पता है कि खेती में सिंचाई के लिए भू-जल की मांग तेज़ी से बढ़ रही है, ज़्यादातर पानी की मांग उसकी आपूर्ति से आगे निकल जाती है, खेती का तरीका उपलब्ध पानी के हिसाब से नहीं बनाया गया। पानी की तलाश किसान को मजबूर कर रही है कि जलदायी स्तर को गहरे से गहरा खोदा जाए। पिछले कुछ वर्षों में पंजाब जो कि अन्न का भंडार कहा जाता है, के किसानों ने सैंट्रीफ्यूगल पंप से गहरे सबमर्सिबल पंप लगाने शुरू कर दिए हैं। तेज़ी से घटते भू-जल स्तर का नासा के उपग्रह चित्रों से पता चलता है कि अगले पांच से सात वर्षों में पानी का स्तर कम हो जाएगा।

तब भी कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं द्वारा कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई जा रही और ना ही उनकी ओर से किसानों पर कम पानी की फ़सल उगाने का दबाव डाला जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश , हरियाणा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और अब मध्यप्रदेश राज्य भी पानी की चिंताजनक गिरावट का सामना कर रहे हैं। गाँव हो या शहर देश को पानी बचाओ अभियान चलाने की ज़रूरत है। वरना देर या सबेर पानी का झगड़ा आपस में शहरों में और शहरों के अंदर कानून व्यवस्था कायम करने में एक बड़ी समस्या बन जाएगा।

(लेखक प्रख्यात खाद्य एवं निवेश नीति विश्लेषक हैं, ये उनके निज़ी विचार हैं।)