सभी स्वस्थ हो जाएं तो कौन खरीदेगा दवाएं?

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एक वैज्ञानिक होने के तौर पर मैं समझता हूं कि परंपरागत हर्बल ज्ञान का वैज्ञानिक प्रमाणन जरूरी है ताकि हम ये हकीकत समझ पाएं कि किस जड़ी-बूटी से कौन सा रोग वाकई में ठीक होता है और ऐसा कैसे संभव हो पाता है? लेकिन हमें यह भी सोचना जरूरी है कि आखिर क्यों 2, 3 या 4 खास जड़ी-बूटियों को मिलाकर पारंपरिक वैद्य दवाएं बनाते हैं? आखिर इन खास जड़ी-बूटियों का आपसी सामंजस्य भी रोग निवारण के लिए महत्वपूर्ण होता होगा। जानकारों के अनुसार ऐसे फॉर्मूले जिनमें एक से ज्यादा जड़ी-बूटियों का समावेश हो या जिनमें पौधे के एक से अधिक अंगों का इस्तेमाल होता हो तो वो ना सिर्फ रोग निवारण करते है, बल्कि शरीर को किसी अन्य नुकसान से भी बचाते हैं और मजे की बात यह है कि वैज्ञानिक प्रमाणन प्रक्रिया के दौरान इस बात का कतई ख्याल नहीं रखा जाता है क्योंकि आधुनिक विज्ञान का एक मात्र उद्देश्य पूरे नुस्खे में से कोई एक ऐसा रसायन (मार्कर कंपाउंड) खोज निकालना जो रोग को दूर भगाने में या उसे दुरुस्त करने में सक्षम है। मेरा मानना है कि दुनियाभर के तमाम वैज्ञानिकों को बजाय मार्कर कंपाउंड खोजने के, सीधे-सीधे हर्बल दवाओं के असर को खोजने के लिए रोगियों पर ही हर्बल जानकारों के साथ मिलकर प्रयोग करने चाहिए और इस प्रक्रिया में उन्हीं फॉर्मूलों का इस्तेमाल हो जिन्हें ये जानकार वर्षों से रोगियों को देते आ रहे हों, ताकि इसके दुष्परिणामों को लेकर रोगी में भय ना हो। टेस्ट ट्यूब, प्रयोगशाला, चूहों या बंदरों पर प्रयोग कर दवाओं के असर को खोजना काफी हद तक सिर्फ वक्त, पैसों और टैलंट की बर्बादी है।

मेरी नजर से पारंपरिक नुस्खों का जस के तस परीक्षण ना करना, मार्कर कंपाउंड के पीछे भागना आदि फार्मा कंपनियों की एक सोची समझी रणनीति है क्योंकि प्रक्रिया को जितना उलझा दिया जाए वह उनके बाज़ारीकरण और शीर्षता पर बने रहने में मददगार होता है और यदि कंपनियां मार्कर कंपाउंड्स निकाल लेती हैं तो उसे कृत्रिम रूप से तैयार कर सस्ती उत्पादन दर के साथ ज्यादा से ज्यादा पैसा बाज़ार से खींचा जा सकता है। औषधीय पौधों में सिर्फ एक नहीं, हजारों रसायन और उनके समूह पाए जाते हैं और कौन जाने, कौन सा रसायन प्रभावी गुणों वाला होता इसलिए मार्कर कंपाउंड शोध पर वैसे ही प्रश्नवाचक चिन्ह लग जाता है।

एस्परिन से बेहतर उदाहरण क्या होगा, एस्परिन टेबलेट्स में मार्कर कंपाउंड के नाम पर सेलिसिलिक एसिड होता है जिसे सबसे पहले व्हाइट विल्लो ट्री नामक पेड़ से प्राप्त किया गया। सेलिसिलिक एसिड को कृत्रिम तौर पर तैयार किया गया और एस्परिन नामक औषधि बाजार में लाई गई। दर्द निवारक गुणों के लिए मशहूर इस दवा के सेवन के बाद कई रोगियों को पेट में गड़बड़ी और अनेक को पेट में छालों की समस्याओं से जूझना पड़ा। जबकि व्हाइट विल्लो ट्री की छाल का काढ़ा कई हर्बल जानकार दर्द निवारण के लिए सदियों से देते आएं हैं और रोगियों को कभी किसी तरह की शिकायत नहीं हुई। क्या निष्कर्ष निकालेंगे आप? दरअसल छाल के काढ़े में वो भी रसायन हैं जो छालों की रोकथाम के लिए कारगर माने गए हैं और कई रसायन ऐसे भी है जो पेट दर्द और दस्त रोकने आदि लिए महत्वपूर्ण हैं।  

 जब ऐसे परिणाम हमारे समक्ष हैं तो हमे क्यों बाधित किया जाता है कि हम कृत्रिम रसायनों पर आधारित दवाओं का सेवन करें? उसका सीधा जवाब यह है कि पूरी जड़ी-बूटियों को लेकर दवा बनाने से फार्मा कंपनियों का कमाई का एक बड़ा हिस्सा बिल्कुल कम हो जाता है, और यह भी देखा गया है कि पूर्ण रूप से और सही जड़ी-बूटियों को लेकर बनाई गई औषधियों से रोगी के एक से ज्यादा रोगों पर एक साथ काबू पाया जा सकता है। जड़ी-बूटियों को आसानी उगाया जा सकता है और ये लगभग मुफ्त की तरह उगती हुई दिखाई भी देती हैं और इन दवाओं के अचूक असर की वजह से रोगी काफी लंबे वक्त स्वस्थ रहता है। इस तरह की हालातों में फार्मा कंपनियों के उत्पाद सिर्फ एक ही बार बिक पाएंगे और जब सब स्वस्थ हो जाएं तो फिर इन्हें खरीदेगा कौन?

फार्मा कंपनियां ज्यादातर रोगों में आराम के लिए दवाएं तैयार करती हैं, सिर्फ आराम, इलाज नहीं। जिसका मूल यह है कि आप अक्सर अपने डॉक्टर से मुलाकात करते रहेंगे, दवाओं की लगातार बिक्री जारी रहेगी, स्वास्थ्य अक्सर बेडौल या बिगड़ता ही रहेगा और इस तरह बाज़ारीकरण जारी रहेगा। 

(लेखक हर्बल जानकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं।)

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