स्कूल न आने पर घर से बच्चों को बुलाकर लाते हैं एसएमसी सदस्य और शिक्षक

तजवापुर विकास खंड के यादवपुर गाँव स्थित प्राथमिक विद्यालय में हेड टीचर लाए बदलाव की बयार, स्कूल की है अपनी लाइब्रेरी, यूट्यूब से करते हैं पढ़ाई...

बहराइच। ये प्राथमिक विद्यालय बाकी सरकारी स्कूलों से कुछ अलग है। इतना अलग कि कई गाँव के बच्चे इस स्कूल में आने लगे हैं, यहां की तस्वीर बदलने का श्रेय यहां के प्रधानाध्यापक को जाता है। यही नहीं अब पंद्रह दिनों में विद्यालय प्रबंधन समिति के सदस्यों के साथ स्कूल के सभी टीचर गाँव का भ्रमण भी करते हैं।

तजवापुर विकास खंड के यादवपुर के प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक राजेश कुमार बताते हैं, "2011 में मैं जब इस स्कूल में आया, तब यहां की हालत बहुत खराब थी। स्कूल की इमारत जर्जर हो चुकी थी। चारदीवारी भी नहीं थी। बच्चे खेलते-खेलते सड़क पर आ जाते थे, जिससे दुर्घटना की आशंका बनी रहती थी। मैंने अपने प्रयास से सबसे पहले स्कूल की इमारत को ठीक कराया। पूरे स्कूल में ऑयल पेंट लगवाया गया।"


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इस विद्यालय की सूरत बदलने में टिकोरा मोड़ चौकी प्रभारी, ब्रह्मानंद सिंह की बड़ी भूमिका रही। उन्होंने हमारे विद्यालय को गोद लिया। आज उनकी मदद से स्कूल की तस्वीर बदल पाने में कामयाबी मिली है। "हमारे विद्यालय की पढ़ाई इतनी अच्छी है कि कई गाँव बच्चे अब इस स्कूल में आने लगे हैं। इस सत्र में करीब 30 बच्चे प्राइवेट स्कूल से यहां पढ़ने आए हैं। यह संख्या आने वाले दिनों में और बढ़ेगी। विद्यालय प्रबंधन समिति के लोग इस काम में काफी सहयोग करते हैं, जिसका नतीजा है कि आज विद्यालय में 306 बच्चे पंजीकृत हैं। इस संख्या को और बढ़ाने के लिए कोशिश लगातार जारी है, "राजेश कुमार ने बताया।

टाई-बेल्ट और आईकार्ड लगाकर आते हैं स्कूल

स्कूल में कक्षा पांचवीं की छात्रा काजल मौर्या बताती हैं, "मैं एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ती थी, लेकिन वहां अच्छी पढ़ाई नहीं होती थी। मेरे पड़ोस में रहने वाले बच्चे इस स्कूल में पढ़ते थे। वे हमेशा यहां की पढ़ाई की तारीफ करते थे। मेरे मम्मी-पापा को जब इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने पता लगाया और फिर मेरा दाखिला इस स्कूल में करा दिया। प्राइवेट स्कूल के बच्चों की तरह इस स्कूल के हर बच्चे का अपना आई कार्ड है। प्राइवेट स्कूल की तरह यहां भी बच्चे टाई बेल्ट लगाकर आते हैं।"

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हमारे स्कूल का हर बच्चा टाई और बेल्ट लगाकर आता है। हमने अपने प्रयास से पैसा जुटाकर बच्चों को टाई-बेल्ट मुहैया कराई। अच्छी यूनिफॉर्म का भी अपना एक असर होता है। हमारा यह प्रयास सफल रहा। गाँव के घर-घर जाकर बच्चों और उनके परिवारीजनों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया जाता है।
राजेश कुमार, हेड टीचर

हर तरफ हरियाली, स्वच्छ शौचालय


विद्यालय में प्रवेश करते ही हर तरफ हरियाली देखने को मिलती है। स्कूल में कई प्रकार के पेड़-पौधे लगाए गए हैं, जो स्कूल की खूबसूरती की और बढ़ाते हैं। गांव का सफाई कर्मी रोज यहां आता है और पूरे विद्यालय की साफ-सफाई करता है। खास करके शौचालयों की विशेष सफाई की जाती है।

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हर शनिवार लगती है 'बाल सभा'

स्कूल में प्रत्येक शनिवार को बाल सभा का आयोजन किया जाता है। इसमें तरह-तरह के सांस्क्रतिक कार्यक्रम होते हैं। नृत्य, कहानी, कविता, चुटकुले, पेटिंग के माध्यम से बच्चों में छिपी प्रतिभा को बाहर लाने का प्रयास किया जाता है। बाल सभा में भाग लेने के लिए हर बच्चा शनिवार का बेसब्री से इंतजार करता है।

80 प्रतिशत रहती है उपस्थिति

यादवपुर गाँव में साक्षरता दर बहुत कम है। इस स्कूल में 306 बच्चे पंजीकृत हैं और रोजाना करीब 290-295 बच्चे स्कूल आते हैं। इस प्राथमिक स्कूल में चार कक्षाएं संचालित होती हैं। बच्चों की उपस्थिति को लेकर स्कूल के सभी टीचर बहुत सतर्क रहते हैं। जो बच्चा बिना बताए दो दिन लगातार स्कूल नहीं आता टीचर उसके घर जाकर न आने की वजह पूछते हैं। सही जवाब जानने के बाद ही लौटते हैं।

खुद की है लाइब्रेरी, यूट्यूब से सीखते हैं कविता

स्कूल में बच्चों के लिए एक लाइब्रेरी बनाई गई है, जहां कहानियों, महापुरुषों की जीवनी से संबंधित किताबें रखी गई हैं। इसके साथ ही इस स्कूल में एक एलईडी स्क्रीन भी है, जिसमें बच्चे यूट्यूब कि मदद से कविता सीखते हैं। स्कूल के ज्यादतर बच्चों को दर्जनों कविताएं याद हैं।

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