चित्रकूट के इस स्कूल में प्रधानाध्यापक की कोशिशों से आया बदलाव, खूबसूरत परिसर के लिए पूरे जनपद में है अलग पहचान

खूबसूरत बिल्डिंग, चारों ओर सफाई, अलग-अलग शौचालय, खूबसूरत पौधों से सजी फुलवारी और उसमें खिलते खूबसूरत फूल… कुछ ऐसी तस्वीर है जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर विकासखंड चित्रकूट के पूर्व प्राथमिक विद्यालय कोल गदहिया की

चित्रकूट के इस स्कूल में प्रधानाध्यापक की कोशिशों से आया बदलाव, खूबसूरत परिसर के लिए पूरे जनपद में है अलग पहचान

चित्रकूट। खूबसूरत बिल्डिंग, चारों ओर सफाई, अलग-अलग शौचालय, खूबसूरत पौधों से सजी फुलवारी और उसमें खिलते खूबसूरत फूल… कुछ ऐसी तस्वीर है जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर विकासखंड चित्रकूट के पूर्व प्राथमिक विद्यालय कोल गदहिया की। कई बार तो यहां पास से गुजरने वाले लोग भी समझ नहीं पाते हैं कि यह सरकारी स्कूल है।

यह सब संभव हो सका है प्रधानाध्यापक और गांव के प्रधान की कोशिशों से। 2013 में जब अशर्फीलाल ने यह स्कूल जॉइन किया था तो बदहाली के सिवा कुछ नहीं था। बच्चे भी गिने-चुने ही आते थे। उस समय 80 बच्चे पंजीकृत थे। अशर्फीलाल बताते हैं, 'उस वक्त हालात बेहद खराब थे। तब मैंने बाकी साथियों को एकजुट किया और बदलाव की कोशिश शुरू की। सबसे पहले मैंने स्कूल की चारदीवारी का निर्माण कराया।

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सुंदर पेड़-पौधों से फुलवारी तैयार करवाई। स्कूल की दीवारों पर स्वच्छता के स्लोगन लिखवाए। अब हमारा स्कूल किसी पार्क सरीखा नजर आता है। छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अगल शौचालय का निर्माण भी कराया गया है। वॉशरूम में टाइल्स लगवाए गए हैं। पूरे परिसर में स्वच्छता पर खासा जोर दिया जाता है।'

पहले विद्यालय में बच्चों की संख्या कभी बहुत कम थी, लेकिन आज 135 बच्चे पंजीकृत हैं। एसएमसी अध्यक्ष छेदी लाल ने बताया, 'मैंने प्रधान और अन्य सदस्यों के साथ मिलकर अभिभावकों से संपर्क किया। उन्हें पढ़ाई के महत्व के बारे में समझाया। लगातार कोशिश का असर लोगों में दिखने लगा। हम बच्चों पर पूरा ध्यान देते हैं। अगर कोई छात्र स्कूल नहीं आता है तो अगले दिन परिजनों से मिलकर स्कूल न आने का कारण पूछते हैं।'

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लगा है वर्षा जल संचयन संयंत्र

विद्यालय में सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। वर्षा जल को संरक्षित करने के लिए विद्यालय परिसर में वर्षा जल संरक्षण सिस्टम बनाया गया है। पूरे परिसर को रोजना साफ किया जाता है।

ग्राम प्रधान रमेश कुमार (28वर्ष) ने बताया, "मेरे गांव के ज्यादातर लोग मजदूरी करते हैं और अशिक्षित हैं। मेरा मानना है कि अगर गांव की स्थिति बदलनी है तो सभी को शिक्षित होना होगा। मैं चाहता हूं कि मेरे गांव का हर बच्चा पढ़ा लिखा हो। विद्यालय की सुंदरता के लिए मैंने अपने कोटे से बहुत काम कराया है। हमारे स्कूल की तारीफ जिलाधिकारी और सीडीओ भी कर चुके हैं। हमारे लिए यह गर्व की बात है।"

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आठवीं के छात्र नीरज ने बताया, " पहले मैं दूसरे विद्यालय में पढ़ता था, लेकिन वहां अच्छी पढ़ाई नहीं होती थी। मेर पिता जी ने इस विद्यायल और प्रधानाध्यापक के बारे में सुना था। उन्होंने मेरा नाम यहां लिखवा दिया। यहां का परिसर बहुत अच्छा है। पढ़ाई भी बहुत अच्छी होती है।"

प्रधानाध्यापक अशर्फीलाल ने बताया, "छात्र-छात्राओं के अलग शौचालय के साथ दिव्यांग बच्चों के लिए स्कूल में अलग से शौचालय का निर्माण कराया गया है। बच्चों के हाथ धोने के लिए वॉश बेसिन लगाया गया है, जिससे उन्हें कोई तकलीफ न हो।"

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