हर मोहल्ले में है बुलावन टोली, स्कूल में बनते हैं स्टार

ये सरकारी विद्यालय 1885 का बना हुआ है, पर यहां की चार महिला शिक्षिकाओं ने विद्यालय की देखरेख और रखरखाव बहुत अच्छा किया है जिससे ये स्कूल तो पुराना है पर बच्चों की छात्र संख्या 253 है।

हर मोहल्ले में है बुलावन टोली, स्कूल में बनते हैं स्टार

बलरामपुर। इस प्राथमिक पाठशाला का हर बच्चा हर दिन स्कूल आए, इसके लिए यहां हर मोहल्ले में बच्चों की एक 'बुलावन टोली' बनाई गई है। जिस मोहल्ले के जो बच्चे स्कूल नहीं आते हैं, उन्हें ये टोली स्कूल ले जाती है। इस टोली की वजह से इस विद्यालय की उपस्थिति 90 से 95 प्रतिशत रहती है। बलरामपुर जिला मुख्यालय से सात किलोमीटर दूर प्राथमिक विद्यालय रामपुर खगईजोत प्रथम की शिक्षिकाएं खेल-खेल में पढ़ाई के कई तरीके अपनाती हैं, जिससे छोटे बच्चों की स्कूल आने में रुचि बने रहे।

विद्यालय की प्रधानाचार्या सुमन गुज्जर ने बताया, छोटे बच्चों को किताब खोलकर पढ़ने में ज्यादा रुचि नहीं रहती इसलिए उन्हें खेल-खेल में गिनती याद कराते हैं, पहाड़ा याद कराते हैं, गुणा-भाग भी, खेल-खेल में सीखते हैं। उन्होंने आगे बताया, जिस बच्चे की उपस्थिति महीने में सबसे ज्यादा रहती है और टेस्ट में नम्बर भी अपनी कक्षा में सबसे ज्यादा आते हैं उन्हें स्टार ऑफ मंथ का सर्टीफिकेट देते हैं। जिससे देखा-देखी दूसरे बच्चे भी पढ़ाई करें और रोज स्कूल आएं। ये सरकारी विद्यालय 1885 का बना हुआ है, पर यहां की चार महिला शिक्षिकाओं ने विद्यालय की देखरेख और रखरखाव बहुत अच्छा किया है जिससे ये स्कूल तो पुराना है पर बच्चों की छात्र संख्या 253 है।

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विद्यालय की सहायक अध्यापिका अनुभा जयसवाल ने बताया, ये बच्चे एक त्रैमासिक पत्रिका भी निकालते हैं जिसमें ये अपने गाँव के बारे में, स्कूल के बारे में, कैसा रहा उनका स्कूल का पहला दिन, तीज-त्यौहार, कई तरह के चित्र बनाते हैं। शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर करने में विद्यालय प्रबंधन समिति की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस समिति को मजबूत बनाने के लिए यूनीसेफ संस्था भी काम कर रही है। इस संस्था ने लगभग दो साल पहले यूपी के छह जिले जिसमें बलरामपुर-श्रावस्ती, मिर्जापुर-सोनभद्र, बंदायू-लखनऊ में 'विद्यालय प्रबंधन समिति' को मजबूत करने का प्रयास किया।

इस विद्यालय में भी विद्यालय प्रबंधन समिति बनी है और हर महीने मीटिंग होती है। हालांकि मीटिंग में सभी सदस्य नियमित रूप से नहीं आ पाते हैं, लेकिन यहां की शिक्षिकाओं ने अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए विद्यालय के पठन-पाठन में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बच्चों को खेल-खिलौने से लेकर उनके पठन-पाठन सामग्री में किसी तरह की कोई कमी नहीं रखी गयी है। सहायक शिक्षिका राकिया सिद्दकी ने अपना अनुभव साझा किया, मुझे लगता है छोटे बच्चों का लगाव मेल शिक्षक की बजाए फीमेल शिक्षिका की तरफ ज्यादा होता है। इसलिए स्कूल में बच्चों की ज्यादा उपस्थिति की एक वजह ये भी हो सकती है। दो-तीन किलोमीटर दूर तक के बच्चे पढ़ने आते हैं। परीक्षा के बाद जो बच्चे अच्छे नम्बरों से पास होते हैं उन्हें उनके माता-पिता के सामने बुलाकर मेडल और सर्टिफिकेट दिए जाते हैं जिससे उनका उत्साह बढ़े।

स्कूल में हर शनिवार 'नो बैग डे'

विद्यालय की सहायक अध्यापिका अनुभा जयसवाल ने बताया, हर शनिवार को 'नो बैग डे' रखा है। इस दिन बच्चे पुराने और बेकार पड़े सामान से उपयोगी सामान बनाते हैं। प्लास्टिक की खाली बोतलों से गमले और कटिंग करके कई और सजावट के सामान बनाते हैं। उन्होंने कहा, इससे बच्चों की सीखने की क्षमता बढ़ती है और ये हर शनिवार कुछ न कुछ नया बनाते हैं। चार्ट पेपर में ये पौधे बनाकर उसके जड़, तना, फल, फूल सभी के बारे में लिखते हैं।

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