इस प्रधानाध्यापक से सभी को सीखना चाहिए, वेतन से खरीदा फर्नीचर और लगवाया प्रोजेक्टर

इस प्रधानाध्यापक से सभी को सीखना चाहिए, वेतन से खरीदा फर्नीचर और लगवाया प्रोजेक्टर

मल्हूपुर (प्रतापगढ़)। इस पूर्व माध्यमिक विद्यालय की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। प्रतापगढ़ जिले के इस विद्यालय में बदलाव की बयार लाए हैं यहां के प्रधानाध्यापक रमाशंकर। कुछ साल पहले विद्यालय में बच्चों के बैठने की लिए जगह तक नहीं थी। अभिभावक अपने बच्चों को इस विद्यालय में पढ़ाना नहीं चाहते थे लेकिन आज 160 से भी ज्यादा बच्चे यहां शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

प्रधानाध्यापक रमाशंकर ने स्कूल में अपनी नियुक्ति के बाद सबसे पहले बच्चों के लिए बैठने की व्यवस्था की। बच्चों के लिए बेंच और डेस्क के साथ अन्य जरूरी चीजें भी खरीदीं। इसके बाद उन्होंने अपनी तनख्वाह से ही स्मार्ट क्लास चलाने के लिए प्रोजक्टर लगवाया।

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रमाशंकर बताते हैं, "हमारी यही कोशिश रहती है कि निजी स्कूलों की तरह हमारे विद्यालय में भी बच्चों की हर छोटी-बड़ी चीजों का ध्यान रखा जा सके। इस कोशिश में अब हम कामयाब होने लगे हैं। हम लोगों ने घर-घर जाकर अभिभावकों से संपर्क करना शुरू किया है। स्कूल में बदलाव आया है तो अभिभावकों ने भी रुचि दिखानी शुरू की है।"


यहां हर हफ्ते होती है पैरेंट्स मीटिंग

अभिभावकों का स्कूल के प्रति नजरिया बदलने के लिए नियमित रूप से पैरेंट्स मीटिंग की जाती है। जो बच्चा नियमित स्कूल आता है और पढ़ने में अच्छा होता है उसे सम्मानित भी किया जाता है, जिसे देखकर अभिभावक भी खुश होते हैं। सम्मान से बच्चे भी प्रोत्साहित होते हैं और बेहतर करने का प्रयास करते हैं।

बच्चों के लिए है स्मार्ट क्लास

स्कूल में बच्चों के लिए स्मार्ट क्लास बनाई गई है जिसमें प्रोजेक्टर के जरिए पढ़ाई होती है। प्रधानाध्यापक रमाशंकर बताते हैं, "किताबों से पढ़ाई तो होती ही है लेकिन प्रोजेक्टेर के माध्यम से बच्चों को विषय समझने में आसानी होती है। उनके सामने हर टॉपिक एक सजीव रूप में होता है जिससे वे अच्छे से पढ़ते और समझते हैं। स्कूल के बच्चे गांव के अन्य लोगों को भी पढ़ाई के बारे में बताते हैं जिससे अभिभावक अपने बच्चों का एडमिशन कराने यहां आ रहे हैं।"


ग्राम प्रधान का भी मिला पूरा सहयोग

प्रधानाध्यापक की इस पहल में ग्राम प्रधान ने भी काफी मदद की है। ग्राम प्रधान नंदिनी मिश्रा ने कमरों और साइंस लैब में टाइल्स की व्यवस्था कराई और तीन शौचालय का भी निर्माण कराया है। रमाशंकर अपने स्कूल के बच्चों की कॉन्वेंट स्कूल के बच्चों के साथ प्रतियोगिता कराते हैं। स्कूल में अच्छे माहौल और अनुशासन की वजह से ही इस बार सत्र में बच्चों की संख्या 161 पहुंच गई है।

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रमाशंकर बताते हैं, "ग्राम प्रधान का भी पूरा सहयोग मिलता है, उन्हीं के सहयोग से स्कूल की बिल्डिंग और दूसरे काम आसानी से हो जाते हैं। स्टाफ और ग्राम प्रधान की मेहनत का ही नतीजा है जो आज हमारा स्कूल दूसरों से बिल्कुल अलग है।"

बच्चों को मिल रही हर सुविधा

विजय कुमार के दो बच्चे स्कूल में पढ़ते हैं। विजय बताते हैं, "पहले स्कूल की हालत किसी से छिपी नहीं थी। लेकिन अब माहौल पूरी तरह बदल चुका है। निजी विद्यालयों की तरह ही यहां बच्चों को हर सुविधा मिलती है। अब मेरे बच्चे रोजाना स्कूल जाने लगे हैं।"

दाखिले के लिए लगती है लाइन

प्रधानाध्यापक बताते हैं, "लगातार बढ़ती बच्चों की संख्या की वजह से स्कूल का परिसर छोटा पड़ने लगा है। आज हमारे विद्यालय में इतने बच्चे हो गए हैं कि उन्हें संभाल पाना मुश्किल होता है। अब हम नए बच्चों का प्रवेश लेने से मना कर देते हैं। अभिभावक कई बार आकर दाखिले के लिए कहते हैं लेकिन ज्यादा बच्चों के लिए संसाधन भी ज्यादा चाहिए होंगे।"

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