अगर हर अध्यापक ऐसा कदम उठाए तो बदल सकती हैं सरकारी स्कूलों की तस्वीर

नई-नई नौकरी लगे तो हर कोई यही सोचता है कि आराम कि नौकरी मिले, लेकिन यहां तो इसका बिलकुल उलटा हो रहा था। एक अध्यापक पूरी तनख्वाह बच्चों और स्कूल पर ही खर्च कर रहा है।

Divendra SinghDivendra Singh   29 Jun 2018 5:14 AM GMT

अगर हर अध्यापक ऐसा कदम उठाए तो बदल सकती हैं सरकारी स्कूलों की तस्वीर

बाराबंकी। सरकारी प्राइमरी स्कूलों का नाम आते ही हमारे सामने एक जर्जर बिल्डिंग उजाड़ स्कूल की तस्वीर सामने आती है। जहां ना सुविधाएं होती है ना अच्छी पढ़ाई। लेकिन ये प्राथमिक विद्यालय आपकी सोच बदल बदल देगा। कॉन्वेंट स्कूलों को मात देता ये स्कूल दूसरे सरकारी स्कूलों के लिए नजीर बन गया है।

बाराबंकी से लगभग 20 किमी हरख ब्लॉक के गुलरिहा के इस प्राथमिक स्कूल में ऐसा बहुत कुछ होता है जो इसे एकदम खास बनाता है। यहां लैपटॉप, टीवी और डीवीडी प्लेयर से पढ़ाई होती है। छोटे बच्चे लैपटॉप से कविताएं और एबीसीडी सीखते हैं तो बड़े बच्चे इसी लैपटॉप से अपने ज्ञान को बढ़ाते हैं। हालांकि ये स्कूल हमेशा से ऐसा नहीं था। स्कूल की ये आबोहवा बदली है यहां के प्रधानाध्यापक सुशील कुमार ने।


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नई-नई नौकरी लगे तो हर कोई यही सोचता है कि आराम कि नौकरी मिले, लेकिन यहां तो इसका बिलकुल उलटा हो रहा था। एक अध्यापक पूरी तनख्वाह बच्चों और स्कूल पर ही खर्च कर रहा है। सरकारी स्कूल का नाम सुनते ही ज़ेहन में बस एक ही बात आती है, अरे वही न जहां पर पढ़ाई नहीं होती, वहां तो बच्चे कभी आते ही नहीं, टीचर भी बस खानापूर्ति करके चले जाते हैं। और जहां पर न कोई सुविधाएं होती हैं न ही पढ़ाई।

सुशील कुमार ने इस स्कूल का कायाकल्प अपनी दम पर ही किया है। शुरू-शुरू में जहां गिनती के बच्चे स्कूल आते थे वहीं अब हर क्लास बच्चों से भरी होती है। लगभग सभी प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा एक से लेकर पांचवीं तक पढ़ाई होती है। लेकिन, यहां केजी की भी कक्षा लगती है। बच्चों को पढ़ाई के साथ हैंडीक्राफ्ट और मिट्टी के गुलदस्ते, मूर्तियां और पेंटिंग बनाना भी सिखाया जाता है।

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स्कूल में तय वक्त पर बच्चों को साफ सुथरा मिड-डे मील मिलता है। जिसके लिए तीन रसोइए हैं। खास बात ये हैं ये खाना बनाने वाली महिलाएं भी स्कूल के किचन का काम निपटाने के बाद बच्चों को पढ़ाती हैं। सुशील कुमार बताते हैं हम लोगों को इस तरह से पढ़ाते देख खाना बनाने वाली संगीता समेत दूसरे स्टॉफ ने भी पढ़ाना शुरू कर दिया। इससे स्कूल में स्टॉफ की कमी भी नहीं खलती है। गुलरिहा के स्कूल के स्टॉफ से जिले में बैठे अधिकारी भी काफी खुश हैं।


साल 2007 में जब सुशील ने स्कूल ज्वाइन किया तो पहले दिन सुशील ने देखा स्कूल की बिल्डिंग के नाम पर एक जर्जर-सा कमरा, स्कूल मैदान के नाम पर गोबर और गांव भर के घरों से निकले कूड़े करकट से पटा हुआ एक मैदान। और हां बच्चों के नाम पर भी बस कुछ बच्चें। लेकिन सुशील के दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था। हर रोज अपने घर लखपेड़ाबाग से स्कूल आते समय रास्ते में जैदपुर के निजी स्कूल में बच्चों की भीड़ को देखकर सुशील को यही लगता जब यहां इतने बच्चे हो सकते हैं तो मेरे यहां क्यों नहीं। मुझे ही कुछ करना होगा।

सुशील कुमार बताते हैं, "स्कूल जाते ही सबसे पहले जब मैंने मैदान साफ करने की शुरूआत की तो गाँव वालों ने विरोध किया ये तो स्कूल की जमीन नहीं है, लेकिन समझाने पर मान गए।"

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कई दिनों तक सफाई करने के बाद सुशील की मेहनत रंग लायी और शायद गांव के लोगों को भी समझ आ गया कि उनके भले के लिए ही सब कुछ हो रहा है तो उन्होंने गंदगी फैलाना कम कर दिया। कुछ दिनों में ही गांव के लोग उनकी मदद को भी आगे आए और अपने घर से बांस वगैरह लाकर स्कूल के चारों तरफ चारदीवारी बना दी।


स्कूल को हरा भरा बनाने के लिए छुट्टी के दिन भी जाते हैं स्कूल

सुशील ने विद्यालय परिसर में ढ़ेर सारे पेड़ पौधे लगाए हैं, जिसकी सुरक्षा और पानी देने के लिए सुशील गर्मी की छुट्टी में अपने घर से कई किमी दूर स्कूल तक जाते हैं।

स्कूल की छत और दीवार बन गई बच्चों की किताब

स्कूल की दीवारों और छतों पर अंग्रेजी और हिंदी के अक्षरों की पेंटिंग बनायी गयी है, जिससे बच्चों को सीखने में और आसानी होती है। स्कूल के नाम से डरने वाले बच्चों के आंखों में अभी सपने दिखने लगे हैं कोई टीचर बनना चाहता है तो कोई पुलिस में जाना चाहता है।

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अब स्कूल में बच्चों के हर दिन की शुरुआत प्रार्थना के साथ ही उस दिन की ताज़ा खबरों के साथ होती है, एक बच्चा उस दिन की बड़ी ख़बरों को पढ़कर सभी को सुनाता है। स्कूल में लगी फुलवारी को बच्चे ही संभालते हैं, कब कौन से पौधे में फूल आएगा, किसे कब पानी देना है बच्चे सब जानते हैं। यहां बच्चे छुट्टी में भी स्कूल नहीं छोड़ना चाहते हैं।

प्रयासों ने दिलाया उन्हें राष्ट्रपति से सम्मान

शून्य नवाचार शिक्षा में तकनीकी के माध्यम से बच्चों को हाईटेक शिक्षा देने के लिए शिक्षक दिवस पर उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने राष्ट्रीय आईसीटी पुरस्कार 2016 से सम्मानित किया गया।

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