प्रधानाध्यापक ने हाथ जोड़कर की अपील, बच्चों को स्कूल भेजें

जहां एक तरफ सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के स्तर को लेकर सवाल उठ रहे हैं, प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों की संख्या कम हो रही है, वहीं बहराइच के एक प्रधानाध्यापक सरकारी स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए अनोखा तरीका अपना रहे हैं।

Chandrakant MishraChandrakant Mishra   14 Aug 2018 10:29 AM GMT

बहराइच। जहां एक तरफ सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के स्तर को लेकर सवाल उठ रहे हैं, प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों की संख्या कम हो रही है, वहीं बहराइच के एक प्रधानाध्यापक सरकारी स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए अनोखे तरीके अपना रहे हैं। विकास खंड, चित्तौरा के प्राथमिक विद्यालय सरदारपुरवा में कभी बच्चों की संख्या न के बराबर थी। स्कूल को बंद करने की स्थिति आ गयी थी लेकिन इस स्कूल के प्रधानाध्यापक की मेहनत से यहां की तस्वीर बदल गयी है।

विद्यालय के प्रधानाध्यापक ओम धर शर्मा कहते हैं, 'एक जुलाई 2011 को इस विद्यालय में मेरी नियुक्ति हुई। उस समय बच्चों की संख्या बहुत कम थी। करीब 60-70 बच्चे स्कूल आते थे। जो बच्चे पंजीकृत थे वो भी नहीं आते थे। पूछने पर पता चला कि यह गांव मुस्लिम बाहुल्य है। गांव में तीन मदरसे हैं। लोग बच्चों को वहीं भेजते हैं। मेरे सामने स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ाने की चुनौती थी।' उन्होंने आगे बताया कि वह अभिभावकों से बच्चों को स्कूल न भेजने का कारण पूछते तो लोगों का जवाब होता, क्या करेंगे स्कूल जाकर? हम तो मदरसे में ही अपने बच्चों के भेजेंगे।

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ओम धर शर्मा कहते हैं, 'मैंने उन्हें समझाया कि सिर्फ उर्दू और फ़ारसी पढ़कर आपका बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता। इसके लिए बच्चे को अंग्रेजी, गणित और विज्ञान की जानकारी होनी भी जरूरी है। मैं यह नहीं कहता कि बच्चों को मदरसे मत भेजिए बस मदरसे के साथ-साथ सरकारी स्कूल भी भेजिए।' आज उनके विद्यालय में 161 बच्चे पंजीकृत हैं। रोजाना 150 के करीब बच्चे पढ़ने आते हैं। इस समय स्कूल में मुस्लिम बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है।

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एसएमसी सदस्यों की सराहनीय भूमिका

विद्यालय प्रबंध समिति के लोगों ने भी स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ाने में काफी योगदान दिया। एसएमसी सदस्यों ने प्रधानाध्यापक के साथ मिलकर अभिभावकों को उर्दू के साथ अन्य विषयों के महत्व के बारे में बताया। एसएमसी के उपाध्यक्ष अयूब (42 वर्ष) ने बताया कि गांव में शिक्षा का स्तर बहुत कम है। लोगों को देश दुनिया के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। ग्रामीणों को यह नहीं पता कि सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के क्या फायदे हैं। ये तमाम बातें जब अभिभावकों को विस्तार से बताईं तब वे बच्चों को स्कूल भेजने पर राजी हुए।

अभिभावकों को मनाना इतना आसान नहीं था। कुछ लोग अपने बच्चों को किसी भी कीमत पर सरकारी स्कूल भेजने के लिए राजी नहीं थे। ऐसे लोगों को बहुत समझाना पड़ा। उन लोगों के सामने हाथ तक जोड़े, उन्हें शिक्षा का महत्व समझाया, तब वे राजी हुए।
ओम धर शर्मा, प्रधानाध्यापक

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सांस्कृतिक आयोजनों ने किया प्रभावित

विद्यालय की सहायक अध्यापिका विभा सिंह ने बताया कि स्कूल में पढ़ाई के साथ साथ सांस्कृतिक गतिविधियों का भी आयोजन किया जाता है जिससे बच्चे का पूरा विकास हो सके। खेलकूद प्रतियोगिया, नृत्य और गायन प्रतियोगिता, मेहंदी प्रतियोगिता जैसी प्रतियोगिताओं के आयोजन भी होते हैं। यह सब देख कर भी अभिभावक प्रभावित हुए। उनके मन में आया कि ये बातें उनके बच्चों को भी आनी चाहिए। इस वजह से भी बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

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मदरसे से ज्यादा यहां पढ़ाई में लगता है मन

गांव के ज्यादातर अभिभावकों ने अब अपने बच्चे का नाम मदरसे से कटवाकर इस सरकारी विद्यालय में लिखवा दिया है। बच्चों को भी यहां की पढ़ाई ज्यादा पसंद आ रही है। कक्षा पांच के छात्र आज़ाद ने बताया कि पहले वह मदरसे में जाते थे। वहां बस उर्दू और फ़ारसी पढ़ाई जाती थी। वहां मन नहीं लगता था। आज़ाद को अंग्रेजी और गणित ज्यादा पसंद है। आजाद अब बस रविवार को मदरसे जाते हैं लेकिन स्कूल वह रोज आते हैं। कक्षा चार की छात्रा सीमा भी स्कूल जाकर बेहद खुश है। सीमा ने बताया कि स्कूल में सभी विषय पढ़ाए जाते हैं। खेलने को भी मिलता है। समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने को मिलता है।

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