विद्यालय प्रबंध समिति के प्रयास से स्कूल में बढ़ी बच्चों की संख्या

एसएमसी अध्यक्ष तुलसीराम पढ़े लिखे नहीं हैं, लेकिन पढ़ाई के महत्व को भलीभांति समझते, हैं इसलिए वो विद्यालय की हर मीटिंग में जाते हैं।

विद्यालय प्रबंध समिति के प्रयास से स्कूल में बढ़ी बच्चों की संख्या

रायबरेली। कभी दो शिक्षामित्रों के भरोसे चलने वाले इस पूर्व माध्यमिक विद्यालय में आज पांच अध्यापक हैं, जब से विद्यालय प्रबंध समितियों ने अपनी जिम्मेदारी समझी और स्कूलों में जाना शुरू किया वहां की तस्वीर बदल गई।

रायबरेली के सलोन ब्लॉक के परशुरामपुर ठेकाही गाँव के रहने वाले तुलसीराम पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन जब उन्हें विद्यालय प्रबंध समिति (एसएमसी) का अध्यक्ष बनाया गया तो उन्होनें अपने अधिकारों को समझा और स्कूल की अव्यवस्थाओं को दूर करने में लग गए। तुलसीराम बताते हैं, ''हम लोग तो चाहते ही हैं कि बच्चे पढ़ें, लेकिन यहां पर अध्यापक ही नहीं थे, जब से मैं एसएमसी का अध्यक्ष बना हूं हम लोग पूरी कोशिश करते हैं कि सब बच्चे पढ़े और हर दिन स्कूल आएं।"

तुलसीराम (अध्यक्ष, विद्यालय प्रबंधन समिति)

तुलसीराम पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन पढ़ाई के महत्व को भलीभांति समझते, हैं इसलिए वो विद्यालय की हर मीटिंग में जाते हैं। विद्यालय प्रबंध समितियों का गठन शिक्षा व्यवस्था का सुधारने के लिए किया गया है, इसमें 15 लोगों को चयनित किया जाता है।

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देशभर में शैक्षिक गणना करने वाली संस्था राष्ट्रीय शैक्षिक प्रबंधन सूचना प्रणाली डीआईएसई की रिपोर्ट 2014-15 के अनुसार उत्तर प्रदेश में प्राइमरी स्कूलों की संख्या 1,53,220 है और माध्यमिक स्कूलों की संख्या 31,624 है। इन सभी स्कूलों में एक-एक समिति होती है।

ग्राम प्रधान रामदेव मौर्या बताते हैं, ''विद्यालय प्रबंध समिति में 11 सदस्य ऐसे होते हैं, जिनके बच्चे स्कूल में पढ़ते हों, इसके अलावा एक लेखपाल, एनएएम, प्रधान या उसके द्वारा चयनित कोई व्यक्ति होते हैं, हेडमास्टर इसका सचिव होता है। इनका काम स्कूल की मासिक बैठकों में सम्मिलित होना और विद्यालय के लिए दी गई धनराशि को खर्च करना होता है।"

बच्चों को हर दिन स्कूल न भेजने पर नहीं मिलेगा राशन

विद्यालय प्रबंधन समिति के सदस्यों और ग्राम प्रधान ने मिलकर एक नया नियम बना लिया है, अगर कोई अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय नहीं भेजता तो उसे राशन ही नहीं मिलेगा। तुलसीराम बताते हैं, "लोग अपने बच्चों को भेजने ही नहीं चाहते हैं, प्रधान जी से मिलकर हम लोग ने बात की अगर कोई अपने बच्चे को नहीं भेजेगा तो उसे राशन ही नहीं मिलेगा। अब लोग भी समझने लगे हैं।" विद्यालय प्रबंध समितियां अगर अपने दायित्वों को समझें और स्कूलों पर ध्यान दें तो उनकी तस्वीर बदल सकती है।

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घुमंतू परिवारों के बच्चों का भी कराया एडमीशन

गाँव में कई ऐसे परिवार हैं जो घूमते रहते हैं, ऐसे में उनके बच्चे पढ़ ही नहीं पाते हैं, सदस्यों व ग्राम प्रधान ने घर-घर जाकर अभिभावकों के को समझाया कि अगर बच्चे नहीं पढ़ेंगे तो आगे नहीं बढ़ पाएंगे। अब उनमें से 10 बच्चों का नाम लिख गया है।

अब विद्यालय में हैं पांच अध्यापक

कई साल से ये विद्यालय सिर्फ दो शिक्षामित्रों के भरोसे ही चल रहा था, कई बार प्रयास करने के बाद भी नियुक्ति नहीं हो पायी। तुलसीराम बताते हैं, "हम लोग कई बार डीएम और दूसरे अधिकारियों के पास गए कई बार प्रयास किया लेकिन कुछ हो नहीं पा रहा था, लेकिन अब पांच अध्यापक आ गए हैं, अब बच्चे अच्छे से पढ़ पा रहे हैं।"

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